खरी-खरी -> > > सोशल साईट्स पर आत्मप्रचार और चापलुसी हावी


फेसबुक हो या दूसरी सोशल साईट्स, नब्बे फीसदी लोग गुड मॉर्निंग, गुड़ नाईट, गुड नून, बधाई, शुभकामनाओं, आरआईपी, श्रद्धान्जलि, भगवान के फोटो और स्लोगन लाईक और शेयर करने में ही रमे हुए हैं।
केवल दस फीसदी लोग ही ऎसे होंगे जो मौलिक विचार रख रहे हैं, समाज और देश के लिए चिन्तन करते हुए विचारोत्तेजक लेखन कर रहे हैं।
बहुत सारे आत्मप्रचार का रस लेते हुए आत्ममुग्ध हैं, उन्हें दूसरों के बारे में सोचने, पढ़ने और लाईक-शेयर करने की कोई चिन्ता नहीं है। कई सारे लोग ज्ञानी और दीर्घ अनुभवी हैं लेकिन वे सदियों से रक्त में घुसी हुई गुलामी का परिचय देते हुए अपने ज्ञान और अनुभव से जनता को लाभान्वित करने की बजाय चापलुसी में रमे हुए हैं और उन विषयों पर समय बर्बाद कर रहे हैं जिनका आम जन से किसी प्रकार का कोई वास्ता नहीं है।
इन लोगों की स्थिति उन ऊँटों या पशुओं की तरह ही है जो खूंटे के पास बैठे हैं और उन्हें भ्रम है कि उनके आकाओं ने गले में रस्सी डाल रखी है।
सोशल साईट्स का बेहतर उपयोग तभी है जब हम समाज और देश की उन्नति और विकास के लिए वैचारिक क्रांति कर पाने में सक्षम हों, निर्भीक होकर बुराइयों-समस्याओं, भ्रष्टाचार और शोषण के खिलाफ आवाज उठाएं।
लेकिन सच यह भी है कि आवाज तभी निकलती है जब पेट में हराम का दाना-पानी न हो, पुरुषार्थ की कमाई के सहारे जिन्दा हों अन्यथा जैसा अन्न वैसा मन, और जैसा मन वैसी वाणी-व्यवहार।
दासत्व और ओढ़ी हुई खालों से बाहर निकलें और अपने विराट व्यक्तित्व को पहचानें, ईश्वर प्रदत्त प्रतिभाओं का उपयोग करें, अपने आपको आत्महीनता से बाहर निकालें, वरना नरकगमन के बाद कोई पूछने वाला भी नहीं बचेगा, और कोई जलान्जलि देने वाला भी नहीं। उत्तरक्रिया और श्राद्ध की बात तो भूल ही जाएं।
