बहुत जरूरी हो चला है ठूँठों का खात्मा


सब जगह धींगामस्ती और अवरोधक के रूप में जहां-तहां अड़े, खड़े और जगह रोक कर बैठे हुए अवधिपारों की जबर्दस्त भरमार है जो कि अपने भूत पर इतराते हुए उसे आज भी वर्तमान मानकर अपना अस्तित्व सिद्ध करने की हरचन्द कोशिशों में जुटे हुए हैं।
कोई पूर्व के रूप में अपने आपको दिखा रहा है तो कोई भूतपूर्व के रूप में अपनी सम्मानजनक और गरिमामय मौजूदगी के लिए हर पल आतुर दिख रहा है।
इसे ठूंठों की मजबूरी कहें या भस्मीभूत होने तक वर्तमान बने रहने की सनक, पर सच यही है कि इस देश में कबाड़ और कबाड़ियों का वर्चस्व पसरा हुआ है। इन सारे एक्सपायर्ड नाकारा और अशक्त ठूंठों का अंतिम संस्कार किए बिना न समाज का भला हो सकता है, न देश का।
अपने आस-पास और अपने इलाकों में भी ऐसे खूब सारे ठूंठ विद्यमान हैं जिनका अग्निदाह करना वर्तमान की सबसे बड़ी जरूरत है।
इनके साथ उन मूर्खों को भी ठिकाने लगाना जरूरी है जो इन ठूंठों से कुछ पा जाने की उम्मीद या भ्रम में अमरबेल की तरह इनसे आलिंगनबद्ध हैं अथवा आस-पास पसरे रहकर अपने आपको इनका ख़ास साबित करने की मुहिम में जी भर कर ठूंठों के गुह्यांगों को चाटने को ही अपनी जिन्दगी का चरम लक्ष्य मान बैठे हैं।
देश में हरियाली लाने के लिए जरूरी है कि इन ठूंठों को अस्तित्वहीन करने का काम युद्धस्तर पर अभियान चलाकर किया जाए और नए पेड़-पौधों को मौका मिले ताकि हरियाली के साथ रंग-बिरंगे पादपों, फूलों और फलों का सुनहरा मंजर हर किसी को सुकून प्रदान कर सके।
