पुरातन परम्पराएँ ही दे सकती हैं जीवन का आनन्द


भारतीय संस्कृति और परंपराओं में जो कुछ भी कहा गया है, पुरातन काल से अपनाया जाता रहा है, उन सभी के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक आधार होता है जिसे हमारे ऋषि-मुनियों ने गहन अनुसंधान के बाद ही जगत के समक्ष रखा है। इसमें कहीं कोई शंका नहीं होनी चाहिए। जीवन को स्वस्थ, सुखी और समृद्ध बनाना चाहें तो इन पुरातन परंपराओं को आत्मसात करना जरूरी है।
हम सभी को एक बात यह अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि श्रुति परंपरा से हमारे समाज में बुजुर्गों से जो कुछ बातें सीखने मिलती हैं उनका प्रभाव शास्त्रों से भी बढ़ कर शत-प्रतिशत कारगर होता है। आज हम इसे स्वीकारें या न स्वीकारें, यह अपनी इच्छा है।
हम न भी स्वीकारें तब भी प्रकृति का कहर हमें सीख और सबक दोनों ही देने में समर्थ है। कोरोना की वजह से आए सामाजिक एवं परिवेशीय जीवन में बदलाव जैसी स्थितियां हर युग में आती रहती हैं, फिर भी हम प्रकृति के संकेतों को न समझ पाएं तो इससे बड़ी मूर्खता और प्रमाद और क्या होगा।
हमारी स्पष्ट सोच होनी चाहिए कि जो ज्ञान परम्परा पूर्वजों और बुजुर्गों तथा अनुभवों से प्राप्त होता है उसके बारे में अपने सम्पर्कितों, संगी-साथियों और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना ही चाहिए, यह हमारा धर्म भी है और फर्ज भी। अपनाएं या न अपनाएं, यह उनकी इच्छा पर निर्भर है।
शाश्वत सत्य और मूल्यों का पीढ़ी दर पीढ़ी संवहन होता रहना जरूरी है, अपने इस ज्ञान दान के धर्म को निभाने में विश्वास रखें। अपने ज्ञान और अनुभव वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के लिए हैं इसलिए इनकी जानकारी सार्वजनीन करने में किसी भी प्रकार की कंजूसी नहीं करनी चाहिए।
हमारी रोजमर्रा की जिन्दगी में कई सारी बातें ऎसी हैं जिन्हें पुरातन परंपराओं से जोड़कर हम स्वस्थ, सुखी और समृद्ध जीवन प्राप्त कर सकते हैं। जीवन और परिवेश की विभिन्न समस्याओं और अभावों से मुक्ति पाकर आनंद के साथ जीवनयापन कर सकते हैं। इनमें से कुछ अहम् विषयों पर चर्चा यहाँ की जा रही है।
उपहारों के प्रयोग से बचें
खान-पान में पवित्रता और पुरुषार्थ होने के साथ ही जीवन में यदि स्वस्थ और सुखी रहना चाहते हैं तो अपने शरीर के सीधे संपर्क में आने वाले तमाम प्रकार के वस्त्र (खासकर अंतः वस्त्र) स्वयं के पैसों से खरीदे हुए ही पहनने चाहिएं। इसी प्रकार हाथ रूमाल भी खुद का खरीदा हुआ ही उपयोग में लाएं। इन वस्त्रों को किसी से उपहार में न लें और न उपहार में लिए गए इन वस्त्रों का उपयोग करें। ऎसा करने से शरीर पर कुप्रभाव पड़ता है तथा प्रेम संबंधों या आत्मीय संबंधों में कोई न कोई बाधा आती है, पारस्परिक प्रेम में कमी आती है। वहीं शरीर की आरोग्यता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
साफ बात यह है कि जो भी कपड़े शरीर के सीधे सम्पर्क में आते हैं वे स्वयं द्वारा ही खरीदें गए हों। इससे शरीर का आभा मण्डल और सूक्ष्म शरीर भी निर्मल रहता है। अपने वस्त्र किसी और को पहनने के लिए कभी न दें, न ही किसी और के परिधान खुद पहनें।
इसी प्रकार दूसरों के पहने हुए परिधान, आभूषण, जूते-चप्पल आदि का भी प्रयोग न करें क्योंकि इनमें कही न कहीं नकारात्मकता का समावेश रहता ही है, जो अपने शरीर के सम्पर्क में आकर अपने आभामण्डल की नकारात्मकता को बढ़ा देता है जिसका खामियाजा हमें किसी न किसी रूप में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भुगतना पड़ता है।
होना तो यह चाहिए कि हम जिन पदार्थों के अधिकाधिक समय सीधे सम्पर्क में रहते हैं, वे अपनी कमाई से खरीदे हुए ही होने चाहिएं। अपने अंतः वस्त्रों को बाहरी लोगों की नज़र से बचाकर रखें एवं इन्हें हमेशा सुरक्षित रखें।
आम तौर पर अंतः वस्त्रों पर तंत्र प्रयोग जल्दी सफल होते हैं इसलिए ज्ञात-अज्ञात शत्रु इन पर निगाह रखकर चुरा लेते हैं और फिर इन पर प्रयोग करते हुए किसी भी प्रकार से वशीकरण, आकर्षण अथवा नुकसान पहुंचाने के कर्म किए या कराए जा सकते हैं। फटे-पुराने और अनुपयोगी परिधानों को हटाने अथवा दूसरों को दें तब इससे पहले इन्हें सूंघ लें। इससे इनका कोई दुरुपयोग नहीं कर सकता।
यह माना जाता है कि हम जिन व्यक्तियों या वस्तुओं के अधिकांश समय सम्पर्क में होते हैं उन पर बाहरी नकारात्मकता का प्रभाव जल्दी और अधिक होता है। यही कारण है कि कई लोगों के मोबाईल और अन्य इलेक्ट्रॉनिक और भौतिक उपकरण बिना किसी असावधानी के क्षतिग्रस्त या खराब हो जाते हैं। यह सब बाहरी और कठोर नकारात्मक दृष्टि का ही असर है।
यों करें दरिद्री और सुखी की पहचान
इंसान का चाल-चलन ही उसके व्यक्तित्व का पैमाना होता है। किसी भी आदमी के पास कितनी धन-दौलत है, यह जानने के लिए उसकी चाल को देखें। चलते समय जो आदमी बूट, चप्पल या सैण्डिल जमीन पर घसीटते हुए आवाज करते हुए चलता है, उस व्यक्ति के पास पैसा कभी टिक नहीं सकता, चाहे वह कितना ही कमा ले, पैसा उसके हाथ से फिसलता रहता है और वह कभी भी पैसे वाला नहीं हो सकता।
इसके उलट जो लोग हाथी की चाल चलते हैं अर्थात सलीके से पाँव रखते हुए आगे बढ़ते हैं तथा जिनके चलते समय बूट-चप्पल किसी भी प्रकार से आवाज नहीं करते, उनके पास धन-दौलत और लक्ष्मी खूब रहती है। इन लोगों में गांभीर्य और धैर्य भी होता है।
जो लोग अपनी चाल में बदलाव ले आते हैं, जूते-चप्पलों को जमीन पर घिसटते हुए चलकर आवाज करने की आदत त्याग कर देते हैं उन लोगों का पिछड़ापन एक समय बाद दूर हो सकता है और पैसा उनके पास टिका रह सकता है।
यह भी तथ्य है कि जिस तकिये पर किसी का एक बार भी बैठना हो जाता है उस तकिये को सिरहाने रखने से उस रात नींद नहीं आएगी और सवेरे मन-शरीर भारी-भारी रहेगा या बुरे स्वप्न आएंगे। बुजुर्गों का यह भी कहना है कि कभी भी तकिये पर बैठना नहीं चाहिए, इससे व्यक्ति कर्जदार हो जाता है। अपनी छोटी-छोटी आदतों में सुधार लाकर हम जीवन को आनंददायी बना सकते हैं।
