राष्ट्रीय कलंक ही हैं छद्म और बहुरूपिये बुद्धिजीवी


असली बौद्धिक सम्पदा से सम्पन्न व्यक्ति बिना किसी के कहे चुपचाप समाज और देश के काम आता रहता है, उसकी उपयोगिता सदैव बनी रहती है। वह मौन साधक की तरह अपने से संबंधित रचनात्मक कर्मयोग में रमा रहता है। जबकि ढोंगी और स्वार्थी लोग तथाकथित बुद्धिजीवी, छद्म आदर्शवादी, उपदेशक और अद्वितीय-अन्यतम अनुकरणीय व्यक्तित्व का चौला पहनकर पब्लिसिटी, पद-प्रतिष्ठा, पैसों और वैभव को पाने के लिए दिन-रात भिखारियों की तरह व्यवहार करते हुए अपने खोटे सिक्के और अवधिपार चवन्नियां चलाने को ही समाजसेवा और देश हित मानकर ताजिन्दगी किसी न किसी के दास, सप्लायर या षोडशांग समर्पित होकर मृत्यु पर्यन्त पराश्रित, परजीवी और अशक्त-लाचार बने रहते हैं।
हराम का पैसा, मुफतिया खान-पान और प्रतिष्ठा पाने वाले बुद्धिजीवियों से किसी भी तरह की अपेक्षा समाज और राष्ट्र को नहीं करनी चाहिए। ये बुद्धिजीवी तब तक मरे-अधमरे और नीम बेहोशी में पड़े रहते हैं जब तक कि उनका सीधा स्वार्थ सामने न हो। इस मामले में बुद्धिजीवी तटस्थ रहकर अपने उल्लू सीधे करते हैं। इन्हें बुद्धिजीवी न कहकर बुद्धिबेचक वृहन्नलाओं की श्रेणी में रखा जाना चाहिए जो कि भीखमंगों की तरह किसी की शवयात्रा में भी नाच सकते हैं, प्रशस्तिगान और परिक्रमाएं कर सकते हैं और शादी के प्रोसेशन में भी।
यदि कहीं डीएनए टैस्ट की ऑन डिमाण्ड सुविधा उपलब्ध हो जाए तो आधे से अधिक बुद्धिजीवी वर्णसंकर निकलेंगे, यह पक्के दावे से कह सकता हूं क्योंकि शुद्ध बीज और शुद्ध रक्त का जीवात्मा संवेदनहीन और तटस्थ रह ही नहीं सकता, उसके भीतर की आत्मा से लेकर लहू तक ज्वार लाने के लिए आतुर रहते हैं। ये बुद्धिजीवी श्वानों से भी बदतर हैं। श्वान वफादार भी होते हैं पर ये बुद्धिजीवी तभी तक पिल्लों की तरह तभी तक साथ रहते हैं जब तक मुफ्त का खाना-पीना और हराम का पैसा मिलता रहे।
अपनी पूरी जिन्दगी में एक औसत बुद्धिजीवी 10 हजार से अधिक पाप करता है और सौ से अधिक गॉड फादर्स, गॉड मदर्स, गॉड ब्रदर्स और गॉड लवर्स-लवरियों के पिछवाड़े सूंघने, चाटने और उनकी विष्ठा का भक्षण करने में ही लगा रहता है। कोई खुलेआम करता है, कोई चुपके-चुपके। समाज और देश का जितना नुकसान इन श्वान ब्राण्ड लपके बुद्धिजीवियों ने किया है उतना किसी ने नहीं।
