होली व्यंग्य - खुशियाँ मनाओ, वे आपकी हो ली हैं


बुरा न मानो होली है
बाहर जब हो ली है, हो ली है, की लगातार आवाजें सुनाई देती हैं तब मस्तिष्क कौंध जाता है। आखिर कौन किसकी हो ली है। होली है या कोई किसी की हो ली है। खैर हमें क्या कोई किसी की भी क्यों न हो लें, अपनी बला से। हम तो उनकी ही बात करते हैं जो अपनी हो ली है, कहलाती हैं। यों तो अब तक अपनी कोई भी हो ली नहीं है मगर भ्रम पालते रहे हैं।
यह भ्रम ही है जो जवाँ रखता है। स्कूल/दफ्तर की लावण्यमूर्तियों की नजाकत को भाँप कर कि वे अपनी हो ली हैं। होली और इनके साथ, इसका भी अपना अलग ही मजा है। इकतरफा प्रतिष्ठा का अपना अलग ही आनन्द है जो जब मन करे मुग्ध कर देने में समर्थ है। यों तो स्कूल/दफ्तरों मे काम करने वाली ज्यादातर वे किसी न किसी की हो ली होती हैं पर जो छूट गई होती हैं उनके लिए होली कुँवारी ही रहेगी क्या? हाय राम ! उनको तो कुँवारा नहीं रहना चाहिए। क्या जरूरी है विवाह के झमेले में पड़ना।
उनके लिये तो यों भी क्या होली और क्या दीवाली? युद्ध के मोर्चे पर रखे भण्डार की तरह बारूदी शोलों को उगलने का दम रखने वाली ये जहाँ दीवाली की जीती-जागती रोशनियों का उदाहरण हैं वहीं सुघड़ देह यष्टि वाली नाटी-मोटी, लम्बी-गोल-मटोल और फलों से लक-दक भारी भरकम वृक्षों की तरह सुपुष्ट देहांगों भरी रसीली वे रसों और रंगों से भरी बोरियों से कहाँ कम हैं।यही तो हैं जो युगों-युगों से रंभा और ऊर्वशी की परम्पराओं को निभाते हुए रंग-रस बाँटती रही हैं।
फिर आम गृहिणी और कामकाजी की होली में बड़ा अन्तर होता है। ये कामकाजी हुनर वालियों की ही इनायत है जो दफ्तर और स्कूलों में रंगत छायी रहती है, समय की पाबन्दी के लिए किसी को कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती बल्कि स्कूल/दफ्तर का समय समाप्त होने की याद दिलाने की मजबूरी होती है बेचारे चपरासी की। फिर पीरियड़ में ‘‘सर’’ गप्पे हाँकने की बजाय उनकी चिकनी-चुपड़ी बातों और आँख के इशारों की भाषा समझ ‘उनके’ काम में ही भिड़े रहते हैं।
स्कूल, आफिस का हो या घर का, काम काम ही होता है, इसमें शर्म की क्या बात है? फिर हम तो सेवा और परोपकार को सबसे बड़ा धर्म मानकर चलने वालों मे अव्वल रहे हैं। पीरियड़ लेना हो या कॉपियों के बण्डल जाँचना, बच्चे को रखना हो या और कुछ, काम का क्षितिज खूब पसरा हुआ व्यापक अर्थ खोजता रहता है।
सभी किस्मों के काम करने को तैयार रह कर ‘सर’ अपना सेवा धरम निभाने के लिए उतावले रहते हैं और स्वयं को बड़ा सौभाग्यशाली मानते हैं। फिर स्कूल या दफ्तर का वातावरण भी तो कहाँ मानने वाला है? पेंट-सूट में सज-धज कर आना, क्लीन शेव्ड, परफ्यूम की महक और खुद-ब-खुद जूते-चप्पल की पॉलिश की चमक के साथ काम-धंधे पर आना तो रूटीन बन ही जाता है। चुहलबाजी, हँसी-ठट्ठा और रसीला माहौल भी तो बड़ा सुकून देने वाला होता है।
बूढ़े अफसर, करमचारी और टीचर भी कहाँ युवा तुर्कों से पीछे रहने वाले हैं? होली का मौसम आये और रूपसियों के श्रृंगार की चर्चा न हो तो फिर बात ही क्या है? विवाहिताएं हों या परिणय बंधन की आतुरता भरी दौड़ का हिस्सा। होली के रंगों से तो दोनों को ही आखिर भीगना भीगाना पड़ता है, इसमें कहाँ आड़े आती है मुई उमर। नव विवाहिता हो या प्रौढ़ा, या फिर रिटायरमेंट के करीब ही क्यों न हो, देह या मन पर क्या फर्क पड़ता है उमर का। आखिर दिल भी वही, अंगोपांग भी वही।
समय-समय का मामूली फेर तो हो ही सकता है न, इससे भला किसी को क्या लेना-देना। वे लाल-पीली हो जाने वाली हों या दाल में काला कर देने वाली। आँखें दिखाने वाली हों या नज़रें मिलाने वाली। शहदिया होंठों वाली हों या फिर जहरीली नागिन की फुफकार वाली... शान्तचित्त और धीर-गंभीर रहने वाली हों या हमेशा बक-बक करने वाली, होली के रंगों में सब ढंक जाता है।
पतझरी हवाएँ, आम्र मोर, पीठी से रंगी पड़ी परिणय आतुर बालाओं के उफनते यौवन की महक, विवाहों की धूम और अपने विवाह की रह-रहकर आती यादें, प्रिय मिलन की आस उमड़ा कर बेचैन कर देती हैं। मुंअी नौकरी का समय भी आठ-आठ घण्टों में सिमटा रहकर विरही मन को व्यथित कर देता है। ऐसे में दफ्तरी या स्कूली रौनक ही तो बची है होली के सुर बजाने को।
मन की विरह वेदना को बरसाती ओवरकोट की तरह उतार फेंकिएं और जी खोलकर अपने हाथ धोने लग जाईयें इस तेजी से बहती रही इस प्रेम की गंगा में। तुलसीदास ने भी साँप को रस्सी मानकर अपनी उत्तमांग से मिलने का प्रयास करते वक्त यही कहा था। आज भी वे होते तो यही कहते -
प्रेम प्रेम की लूट है, लूट सके तो लूट
अंत काल पछतायेगा जब नौकरी जायेगी छूट....
रिटायर्ड हुए लोगों से पूछिये। इसे याद कर-करके वे अकेले में सिसकते हैं। अपने जमाने की बातों को याद कर-करके। वे लम्हें रह-रहकर याद आते हैं जब वे गंगा के तट पर रहते हुए भीगने से बच गये थे। सागर के बीच पर रहते हुए भी प्यासे बुझाने का मौका न पा सके। इसका मलाल उन्हें अभी तो है ही, मौत के बाद तक रहने वाला है।
फगुनाहटी अन्दाज में उगलते रहिये अन्तस के भाव। फिर चाहे वह अश्लील कहे जाएं या श्रृंगार में नहाये हुए। क्यों वे मानेंगी बुरा, और क्यों ऐसा तुम भी करोगे। आखिर आनन्द का अपना भी तो कोई स्थान होता है। विरह से झुलसते प्राणियों को यह रेगिस्तान में हरियाली का मजा देगा। फिर परिवर्तन भी तो सृष्टि का अपना नियम है न, आखिर किसने लगायी है पाबन्दी ऐसा नहीं करने की।
होली के दिन हों और स्कूल/दफ्तरों में वे न हों तो कौन कहेगा अपने परिसरों को पूरा? अपने आस-पास की रौनक ही छीन जायेगी। फिर एकाध ‘‘मिस’’ हो तो कहने ही क्या। रंगों-रसों के दरिया उमड़ते हैं। रंगों की बौछारें करने का ही यही तो मौसम है। फिर चाहें आप किसी भी रंग की बौछार क्यों न करें मगर हाँ रंग होने चाहिए भीतर तक आह्लादित करने वाले, बस। रं
गों की बौछार करना किस शास्त्र में गलत लिखा है? और आजकल तो हर्बल रंग भी आ गए हैं। चहारदीवारी में भी झाड़-पोंछकर जा सकते हैं, किसी को भनक तक नहीं लग पाए रंगों से होली खेलने की। और रंगों में नहाने का अवर्णनीय अविस्मरणीय आनन्द भी प्राप्त हो जाए। गंगा भी तो आखिर औरों को पावन करने के लिए ही है न? वह तो चाहती है अपने तटों को हरा-भरा, रौनकी और भीड-भाड़ भरा दिखाना। अब संकोच करें वो अलग बात है।
अब झिझक तो शुरू-शुरू में होगी ही, यह तो पुराना स्वभाव रहा है अपुन सब का।मल दीजियें गुलाल और रंग अपने ‘उस’ के गालों पर और बना दीजिये रंगीन हर किसी को, हर एक को। जिनसे झिझकते हैं या जो झिझकती हैं उनके भी मल दीजियें होली की आड़ लेकर। होली ही अचूक-अमोघ अस्त्र है उनको निकट पाने का।
करिए इनका उपयोग और कर दीजिए रंगों की बौछार स्कड़ मिसाईलों की तरह। फिर देखिये, पेट्रियाट की तरह दिखने वाली वे भी अपनी मिसाईलों का उपयोग स्कड़ को नष्ट करने में कैसे करती हैं? नष्ट कर देंगी वे तमाम अवरोधों को जो अब तक खराब होने से प्रेम विमान को उनके अँगने में उतरने नहीं दे रहे थे।
आपने अपने सहकर्मियों के साथ होली खेल भी ली तो क्या बुरा किया? फिर सहकर्म का मतलब ही क्या? आखिर आपके उनके भी तो कामकाजी स्थलों या पड़ोस में उनसे होली खेलने के लिए एकाध तो होंगी ही। फिर भला क्यों बुरा माने कोई? और फिर होली तो पर्व ही है बुरा न मानने का। सड़कों पर उछलकूद करती बच्चों की टोली भी तो आपसे यही कर रही है ... बुरा न मानो होली है......।
जब बच्चे भी इस परम और शाश्वत सत्य को मानते हैं फिर आप तो बड़े हैं, क्यों मानते हैं बुरा। बुरा है क्या यहाँ, और वह भी होली के दिन। तो लीजियें हाथों में गुलाल, थामिए पिचकारी और राकेट की तरह बढ़ चलिये उस दिशा में जिधर वे खड़ी हों...।
बुरा न मानो होली है।
