सर्वोपरि प्राथमिकता पर हो संस्कारों की पुनः प्रतिष्ठा


समाज में आज सब कुछ दिखाई देता है लेकिन जो नहीं दीख पा रहे हैं वे संस्कार ही हैं। इन्हीं की कमी से व्यक्ति व समुदाय से लेकर परिवेश और राष्ट्र तक में समस्याओं, कुटिलताओं, विदु्रपताओं और क्षुद्र ऎषणाओं के कई-कई मोहपाश अपना शिकंजा कसते जा रहे हैं।
संस्कारहीनता ही वह एकमात्र कारण है जिसने मनुष्य के उत्साह, ओज, संवेदना और स्वस्थ विकास की ललक को कहीं पीछे छोड़ कर आदमी को भोग-विलासिता का यंत्र बना दिया है। संस्कार मात्र के बीजारोपण से समाज को तमाम संकीर्णताओं और विषमताओं से मुक्ति का अहसास कराया जा सकता है।
अब जरूरी हो चला है कि विभिन्न उपलब्ध सभी माध्यम से समाज में नैतिक, आध्यात्मिक मूल्यों और संस्कारों की पुनः स्थापना के प्रयासों को सम्बल दिया जाए ताकि संस्कार सरिता का लुप्त प्रवाह पुनः सजीव व वेगवान हो सके। हम सभी का प्राथमिक दायित्व है कि खुद में, घर-परिवार, कुटुम्ब और समाज में संस्कारप्रधान जीवनी शक्ति का संचार करें, इसके लिए दृढ़ संकल्पित होकर जुटना होगा।
