वागड़ में लोक जागरण के पुरोधा


स्मृति शेष - स्वतंत्रता संग्राम के लोकनायक श्री कुरीचन्द जैन
वागड़ अंचल में स्वतंत्रता संग्राम और लोक जागरण का अपना खास इतिहास रहा है। इस अंचल के दोनों जिलों (बांसवाड़ा और डूंगरपुर) में शहरों, कस्बों से लेकर ठेठ गांवों तक आज़ादी का शंखनाद करने वाले स्वतंत्रता सेनानियों और समाजसेवियों की सुदीर्घ परम्परा रही है जिसने यहां के लोगों को शिक्षा और लोक जागरण का पैगाम दिया और आजादी की सुगंध का अहसास कराया।
इन्हीं में डूंगरपुर के श्री कुरीचन्द जैन वह शखि़्सयत रहे हैं जिनका जनता से गहरा लगाव रहा और आंचलिक विकास में अपनी महत्वपूर्ण भागीदारी निभाते हुए जो यादें छोड़ी, वे इतिहास के सुनहरे पन्नों में समायी हैं। आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा और चेतना जगाने तथा ग्राम्यांचलों में स्वतंत्रता संग्राम की गतिविधियों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने वाले सेनानी कुरीचन्द जैन ने माणिक्यलाल वर्मा, मोहनलाल सुखाड़िया, हरिदेव जोशी, भोगीलाल पण्ड्या, गौरीशंकर उपाध्याय और प्रमुख सेनानियों के साथ रहकर आजादी की जंग में योगदान दिया।
14 सितम्बर सन् 1914 ईस्वी को तत्कालीन डूंगरपुर रियासत में एक साधारण परिवार में पिता श्री दीपचन्द के घर माता मीठी बाई की कोख से जन्मे श्री जैन महत्त्वांकाक्षी बालक थे जो समाज के लिए कुछ कर गुजरने का ज़ज़्बा रखते थे। बचपन से ही शिक्षा प्राप्ति के साथ-साथ अपने पिता की कपड़े एवं बर्तन की दुकान पर भी उनका सहयोग बना रहता। भरे-पूरे परिवार में भाई कारीलाल जैन और तीन बहिनें सूरज बाई, लक्ष्मी बाई एवं मोतीबाई के साथ गुजारे गए बचपन ने उन्हें फौलादी बनने में मदद की। कुरीचन्द ने 1932 में विज्ञान विषय के साथ हाईस्कूल तथा इसके बाद 1934 में महाराणा कॉलेज उदयपुर से भौतिकी, रसायन और गणित विषय में इंटरमीडिएट की।
सन् 1933-34 में वे मोहनलाल सुखाड़िया के सम्पर्क में आए। यहां वे इस कदर अन्तरंग हो गए कि दोनों एक साथ रहने लगे। इसके बाद डूंगरपुर रियासत की ओर से उन्हें आगे की शिक्षा-दीक्षा के लिए बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी भेजा गया जहां उन्होंने इंजीनियरिंग में प्रवेश पाया लेकिन डूंगरपुर में पिता के निधन तथा कारोबार एवं गृह संचालन का आकस्मिक भार आ पड़ने से उन्हें इंजीनियरिंग की पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर डूंगरपुर आना पड़ा। डूंगरपुर आकर उन्होंने कपड़े एवं बर्तन के पैतृक धन्धे को संभाला।
सन् 1937 में स्व. भोगीलाल पण्ड्या के साथ रहकर राजस्थान सेवा संघ का आधार तय किया। इसी दौरान् गांधी जयन्ती कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए आजीवन खादी पहनने की शपथ ली। सन् 1942 में हरिजन सेवा, हरिजनोद्धार आदि का बीड़ा उठाया और इनके लिए शैक्षिक चेतना जगाने पाठशालाओं की स्थापना की।
डूंगरपुर की नई बस्ती आवासीय योजना को उन्हीं की देन माना जाता है। व्यवसायियों में भी लोकप्रियता का शिखर छूने वाले जैन ने वस्त्र व्यापारियों के संगठन को ऊर्जा दी। श्री कुरीचन्द जैन प्रजामण्डल, राजस्थान सेवा संघ व महावीर इन्टरनेशनल डूंगरपुर के संस्थापक सदस्य, प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सदस्य तथा स्वतंत्रता आन्दोलन के खादीधारी कार्यकत्र्ता रहे हैं ।
सन् 1951 से 1958 तक डूंगरपुर नगरपालिका अध्यक्ष पद को गौरवान्वित करने वाले कुरीचन्द जैन आज़ादी से पहले भी सन् 1948 से 1951 तक डूंगरपुर नगरपालिका के मनोनीत प्रेसीडेन्ट रहे।आम आदमी और इलाके के विकास का स्वप्न संजोने वाले श्री जैन दूरदर्शी विकास द्रष्टा थे जिन्होंने शहर और ग्राम्य विकास के कई-कई विकास कार्यों की नींव रखी।
जिला बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में बड़े गांवों में रात्रि को रोशनी की व्यवस्था करने, ग्राम्यांचलों के लोगों को अखबार से रूबरू कराने और शाला भवनों के निर्माण के साथ ही धम्बोला एवं कनबा में आयुर्वेदिक औषधालय स्थापित करने में उनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण रही है। वे सन् 1952 से 1956 तक राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सदस्य, प्रदेश छानबीन समिति और प्रदेश इलेक्शन ट्रिब्यूनल के सदस्य रहे।
उन्होंने भले ही शासन से स्वतंत्रता सेनानी का ताम्रपत्र व पेंशन आदि कुछ भी प्राप्त नहीं किया, लेकिन जन-मन में स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उनकी याद युगों तक बनी रहेगी। अपना सम्पूर्ण जीवन देश को समर्पित करने वाले जैन ने सिद्धान्तों और आदर्शों से ओत-प्रोत जीवन जीया।
हर दिल अजीज और विकास के लिए समर्पित कुरीचन्द जैन अपनी इन्हीं खूबियों की वजह से हर वर्ग, जाति और सम्प्रदाय के लोगों के लिए ‘भाई साहब’ के रूप में लोकप्रिय रहे। आम लोगों में उनके प्रति आत्मीय श्रद्धा और आदर भाव हर हमेशा झलकता रहा। श्री कुरीचन्द जैन ने 89 वर्ष की आयु में 27 दिसम्बर 2002, शुक्रवार को अंतिम साँस ली। इसके अगले दिन शनिवार को डूंगरपुर में उनका अंतिम संस्कार किया गया।
यद्यपि श्री जैन आज हमारे बीच नहीं हैं किन्तु समाज सेवा, विकास, समाज सुधार और स्वतंत्रता संग्राम के लोकनायक के विचार आज भी जन-जन के लिए प्रेरणा और सम्बल का माध्यम बने हुए हैं। स्व. कुरीचन्द जैन के प्रति कृतज्ञ वागड़वासियों की ओर से हार्दिक श्रद्धान्जलि।
