
हम लोग बहुत बड़े-बड़े लोगों के साथ रहा करते हैं, खूब सारे बड़े लोगों को करीब से जानते-पहचानते हैं, बड़ों-बड़ों के लिए काम करते हैं, मगर एक भी ऎसा नहीं दिखता, जिसे पूर्ण इंसान माना जा सके। ये औरों के इशारों पर चलने वाले कठपुतले हैं या हवाओं की दिशा में इधर-उधर डोलते रहने वाले बिजूके, अथवा पालतु जानवरों, गुलामों और भिखारियों की तरह जीने वाले, किसी के काम न आने वाले दिखावटी। न स्वाभिमान दिखता है, न जमीर या खुद्दारी। सौ फीसदी सत्य है यह कहावत - नाम बड़े और दर्शन खोटे। सवेरे-सवेरे मुँह देख लो, तो न केवल दिन, बल्कि रात, और कई-कई बार सप्ताह और पखवाड़े तक खराब हो जाए।
हमारे पुरखे अक्सर कहते रहे हैं कि उनके नक्शे कदम पर चलो, उनका अनुकरण करो, उनके उपदेशों पर अमल करो। पर कोई ऎसा कहाँ मिलता है जिसे रॉल मॉडल मानकर चला जा सके। पैकिंग बेहद लुभावनी, आकर्षक और चाहने योग्य तो होती है, पर थोड़े दिनों बाद माल खोटा, सडान्ध भरा और बेकार निकलता है, असली चेहरा सामने आ जाता है और तब लगता है कि कोई ऎसा दिखता ही नहीं कि जिसका अनुकरण किया जा सके, जिसके विचारों पर चलकर जीवन को सँवारा और सुखमय बनाया जा सके।
अब सब तरफ गड्डमड्ड और उल्टा-पुल्टा हो गया है। पता ही नहीं चलता है कि कौन किसका आदमी है? बहुत सारे लोग अंशकालीन पत्नियों की तरह किसी न किसी आदमी के साथ रहते रहे हैं। उनके पालतु होने का गर्व और गौरव जताते रहते हैं। जब तक स्वार्थ सधता है, अपने मूर्ख और नाकारा उल्लू सीधे होते रहते हैं, तब तक साथ निभाते हैं, जिनकी खाते-पीते हैं उनकी बजाते हैं। और जब पूरा का पूरा रस निचोड़ा जा चुका होता है, काम बन जाते हैं, लाभ की भावी संभावनाओं की आकस्मिक मौत हो जाती है, तब किसी दूसरे आका को अपना आदमी बना लिया करते हैं।
बहुत से लोग यही कर रहे हैं। पौरुष और प्रतिभाओं का जन्मजात अभाव पाले हुए ये निर्वीर्य और बेदम-बदहवास बेचारें करें भी तो क्या, उनकी भी भारी मजबूरी है। न करें तो भूखों मरने की नौबत ही आ जाए। इसलिए औरों को भरमाते हुए लल्लो-चप्पो करते हुए, कोई न कोई लॉलीपाप दिखाते हुए चिपके रहते हैं और मुफतिया मौज उड़ाते रहते हैं।
इस मामले में आदमियों से ज्यादा अब मदारी, जमूरे और तमाशबीन हो गए हैं। तुच्छ ऎषणाआें में मरे जा रहे लोग तो बन्दर-भालुओं की तरह इन मदारियों के इशारों पर नाच-नाचकर मुख्य धारा में बने रहने का सुख पाने को ही जीवन की उपलब्धि मानकर चल रहे हैं।
हमारे यहाँ न हूटिंग करने वालों की कोई कमी है, न तालियां बजाने वालों की। कोई एक पहल कर देता है फिर सारे तालियां पीटने लगते हैं। इन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं कि आखिर तालियां क्यों बजायी जा रही हैं। खाने-पीने और भीड़ जमा करने के लिए लाई गई भेड़ों को इससे क्या। कुछ मिल जाए तो दिन सुधर जाए, शाम और रात की महफिल तक का इंतजाम हो जाए, कल की कोई परवाह नहीं, कल किसने देखा।
एक आम आदमी जितना सरल, निष्कपट और भोला होता है उसके विलोमानुपात में जो जितना बड़ा होता है वह उतना ही नाकारा, धूर्त-मक्कार, चालबाज, झाँसेबाज और झूठा होता है। हो भी क्यों न, भीड़ जिसका हमेशा मिथ्या जयगान करती है, उपकृत और कृतज्ञ भेड़-बकरियां और गधे-उल्लू जिनकी परिक्रमाओं और यशोगान से काँव-काँव करते हुए दुनिया को भरमाते रहते हैं, ऎसे में सत्य और विश्वास रह ही कहाँ जाता है।
जैसे ऊपर वाले होते हैं वैसे ही नीचे वाले अपने आप होते चले जाते हैं। दोष किसे दें, जब सभी को सब कुछ आत्म स्वीकार्य है। यहाँ इंसानी जिस्म में हम आदमी नहीं ठेलागाड़ी, कियोस्क, दुकान और मॉल देखने के आदी हो गए हैं इसलिए हमारे जीवन का हर पल लाभ-हानि की गणित पर ही चलता है। जहाँ हमें वैध-अवैध लाभ दिखता है वहाँ मक्खियों की तरह भिनभिनाने लगते हैं और जहाँ हमें कुछ भी प्राप्त होने की उम्मीद नहीं होती, वहाँ से कोसों दूर भागते नज़र आते हैं।
जब हमारी दृष्टि में ही विकार आ गया है तब कोई सा चश्मा क्या करे? जो जितना बड़ा आदमी है उसे अच्छी तरह पता है कि भेड़ों की रेवड़ को क्या अच्छा लगता है, किस दिशा में ले जाना है। बड़ों के बारे में समझदारों का साफ मानना है कि ये केवल और केवल दिखने-दिखाने के लिए ही बड़े हैं अन्यथा वे औरों के सामने किस तरह छोटे हो जाते हैं यह सुन लें तो चूहे-बिल्लियाँ तक शरमा जाएं।
वह समय चला गया जब इंसान समाज और क्षेत्र के लिए जीता था और क्षेत्रवासियों के लिए इतना कुछ करके जाता था कि लोग दशकों बाद भी उसके कामों को भुला नहीं पाते। अब कुछ ऎसा रहा ही नहीं। वह खुद के लिए ही पूरी जिन्दगी दाँव पर लगाए रखता है, ऎसे में बेचारा समाज और क्षेत्र के लिए करे भी तो क्या। उसे भी तो अपने से बड़ों के लिए वह सब कुछ करना पड़ता है जो हम उनके लिए करते रहे हैं।
यह पूरी की पूरी श्रृंखला है जिसे जीवों की खाद्य श्रृंखला का ही एक विकृत रूप माना जा सकता है। बड़ो के बारे में जानकारों का सीधा सा पैमाना यह रहा है कि जो-जो बड़े हैं, उन्हें वे ही लोग याद आते हैं जो उनके लिए सेवा-चाकरी और समर्पण के सारे रास्ते खुले रखते हैं और कहीं कोई शर्म नहीं रखते। तभी इनमें भेद समाप्त होकर अभेदावस्था और अटूट आत्मीय रिश्तों का प्रादुर्भाव होता है। और बड़े लोग इन्हीं का काम करते हैं।
इस मामले में पूरी दुनिया दो भागों में विभक्त दिखती है। एक तरफ बड़े और उनके अनुचर हैं और दूसरी तरफ आम आदमियों का समुदाय। यही कारण है कि सज्जन, सच्चे और निष्ठावान इंसान बड़े लोगों की बजाय ईश्वरीय सत्ता पर भरोसा करते हैं और उन्हें भगवान पर अडिग श्रद्धा और विश्वास ताजिन्दगी बना रहता है।
बहुत बड़ी संख्या में लोग भविष्य में पड़ सकने वाले कामों के लिए बड़े लोगों पर आश्रित रहते हैं, उनकी जी-हुजूरी करते रहते हैं, बटरिंग करने के सारे जतन करते हैं लेकिन उनका भ्रम तब टूट जाता है जब बड़े आदमी किसी काम नहीं आते। बड़े लोगों से अधिक स्वाद और आनंद तो मिर्ची बड़े, दही बड़े और आलू बड़े तक दे जाते हैं।
निष्कर्ष यह कि ईश्वरीय सत्ता और अपनी प्रतिभा, नैष्ठिक कर्मयोग तथा शुचिता पर भरोसा रखें, कामयाबी अपने आप अपनी ओर खिंचती चली आएगी। बड़े लोगों की असलियत भरे रहस्य को जो एक बार समझ जाता है उसके इहलोक और परलोक दोनों सुधर जाते हैं, फिर वह सांसारिक प्रपंचों और मायावी बड़े लोगों से भरे पड़े भवसागर से तर जाता है।

