
जिसको जो राह अच्छी लगे, उस तरफ चलना चाहिए। हर इंसान अपनी राह खुद ही तय करता है और उसी पर चलते हुए पूरा जीवन निकाल देता है। वह कौन सा मार्ग तय करता है और किस तरह उस मार्ग पर अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ता रहता है, यह उसका अपना वैयक्तिक सोच और कर्म है, इसे दूसरों के अनुरूप चलाया नहीं जा सकता।
सभी को अपनी-अपनी राह चलते रहना चाहिए। किसी एक को दूसरे से यह शिकायत नहीं होनी चाहिए कि वह राह बदले या कि जो राह उसने अपना रखी है या सोच रहा है, वह गलत है। सही और गलत का निर्णय इंसान की अन्तरात्मा करती है अथवा फिर समुदाय।
इस मामले में अन्तरआत्मा का फैसला सर्वोपरि होता है क्योंकि समुदाय में अब सामाजिकता, सामूहिक विकास और आत्म सुधार जैसे भावों का पलायन होता जा रहा है। कोई किसी बुरे को बुरा कहने की हिम्मत नहीं रखता। और किसी अच्छे और सच्चे को सज्जन स्वीकार करना कोई नहीं चाहता।
यहाँ मक्कारी, धूर्तता और स्वार्थों ने ऎसा चक्कर चला रखा है कि कुछ फीसदी को छोड़कर दूसरे लोग राम की भी जय और रावण की भी जय बोलने में विश्वास रखते हैं।
इनका न कोई सिद्धान्त है न लाज-शरम। जहां कहीं स्वार्थ सधता है वहाँ दौड़े-दौड़े चले जाते हैं, जहाँ मुफत का माल-मावा और मलाई मिल जाए, बिना कुछ काम-धाम किए वांछित प्राप्ति होती रहे, तो पालतुओं या जरखरीद गुलाकों की तरह चक्कर काटते रहते हैं।
समाज की वर्तमान अवदशा का यही सबसे बड़ा कारण है कि सज्जनों को प्रोत्साहन व आदर-सम्मान प्राप्त नहीं है तथा दुर्जनों की हरकतों और धींगामस्ती को रोकने-टोकने या तिरस्कृत करने वाला कोई नहीं है।
इस कारण से सज्जन प्रताड़ित हो रहे हैं और दुर्जनों की भीड़ आत्म सम्मानित और गौरवशाली होने का अनुभव करते हुए धींगामस्ती मचाते हुए वह सब कुछ पा रही है जिसके लायक वह है ही नहीं।
अपात्र इंसान यदि पात्रता रखने वालों से अधिक पाने लग जाए, टाईमपास कामचलाऊ और कामधकाऊ के रूप में कुछ दिन-महीने और साल गुजार दे तो उसका रुतबा इतना अधिक बढ़ जाता है कि वह अपने अहंकारों के पैराशूट में उ़ड़ता हुआ पूरी धरती को अपना साम्राज्य मान लिया करता है और अपने सिवा सारे के सारे धरतीवासियों को अपना मातहत, नौकर-चाकर और सेवादार।
कुछ फीसदी लोगों के साथ यही हो रहा है। पूर्वजन्म के किसी भाग्य से या कि किसी न किसी की दया-अनुकंपा, सेवा-चाकरी या कृपा से, अथवा अपने आपको सर्वस्व प्रकार के समर्पित कर देने के फलस्वरूप लुच्चे-टुच्चे और लफंगे, अपात्र और ऎसे-ऎसे नाकारा लोग आज यहाँ-वहाँ देखे जा रहे हैं जिनकी शक्लें देखकर घिन आती है और स्वभाव तथा व्यवहार देखकर लगता है कि इंसान को क्या होता जा रहा है।
कहाँ तो हमारे कर्मयोगी पूर्वज और कहाँ आज के ये लोग? आमतौर पर संसार भर के लोगों को मोटे तौर पर दो-चार भागों में विभक्त किया जा सकता है। एक वे हैं जो नैतिक मूल्यों के आधार पर सिद्धान्तों के साथ जिन्दगी जीते हैं और पूरा जीवन पारदर्शिता के साथ जीते हुए सेवा, परोपकार, माधुर्य और संवेदनशीलता के साथ समाज और मातृभूमि के लिए जीने का प्रयास करते हैं।
इनमें भी बहुतेरे लोग आध्यात्मिक जीवन धाराओं में नहाते हुए हर क्षण अपने आप में ही मगन और मस्त रहा करते हैं। इन लोगों को अपने काम और सेवा के साथ ही आध्यात्मिक सरोकारों व धार्मिक-सामाजिक प्रवाह में हाथ बँटाने से ही फुरसत नहीं हुआ करती।
आध्यात्मिक पृष्ठभूमि होने के कारण सेवाव्रती लोगों को न किसी से ईष्र्या होती है न किसी से कोई द्वेष। आत्म आनंद में ही मस्त रहने वाले लोगों का न कोई दुश्मन हो सकता है, और न ही कोई प्रतिस्पर्धी।
दूसरी तरह के लोग वे हैं जिनके लिए इंसान के रूप में पैदा होने का अर्थ ही टाईमपास जिन्दगी जीना, पराये लोगों और पैसों पर मौज करना, बिना किसी काम-धाम के पुरुषार्थहीन कमाई पर मटरगश्ती करना, जीवन भर षड़यंत्रों, खुराफातों और नकारात्मक-विध्वंसक सोच रखते हुए समाज और परिवेश में प्रदूषण फैलाना ही रह गया है।
संसार में आरंभ से ही सत् और असत् का संघर्ष चला आ रहा है। हर युग में दुष्ट, पापियों और अधम लोगों का यही रवैया रहा है। सज्जनों का दुर्भाग्य कहें या कि समाज और देश का, कि सच्चे, ईमानदार और कर्मनिष्ठ लोगों से ऎसे-ऎसे लोग शत्रुता का व्यवहार करते हैं जिन्हें अव्वल दर्जे का बेईमान, अनपढ़-गँवार, चापलुस, खुदगर्ज और कामचोर माना जाता है और समाज तथा क्षेत्र में इनके बारे में लोक धारणाएं अच्छी नहीं हुआ करती।
इस खेमे में अधिकतर वे ही लोग आते हैं जिनमें प्रतिभा, ज्ञान या हुनर का अभाव रहता है और अपनी इस कमजोरी को छिपाये रखते हुए अपने दायरों से अधिक पाने और प्रभुत्व जमाने की अँधी दौड़ में ये सभी प्रकार के समझौते कर लेने को हरदम तैयार रहा करते हैं।
सज्जनों और दुर्जनों के बीच किसी भी प्रकार की प्रतिस्पर्धा का कोई सवाल ही नहीं होना चाहिए। दोनों के मार्ग अलग-अलग हैं और उसी के अनुरूप कार्य करने की पद्धति भी। दुर्भाग्य से नाकारा लोग अपने वजूद को बनाए रखने तथा समाज में गंदगी फैलाते हुए खुद का वर्चस्व स्थापित करने के लिए सज्जनों को माध्यम बनाते रहते हैं। हैरत की बात यह कि ऎसे लोग उनसे अपनी तुलना करने लगते हैं जो कि मेधावी, सेवाव्रती और निष्ठावान कर्मयोगियों के रूप में निष्काम जीवन जीने वाले होते हैं।
इन लोगों को अच्छी तरह पता होता है कि सज्जनों से वैर लेने से ही उन्हें फायदा होता है क्योंकि सदियों से कमजोर वल्लरियां वृक्षों के सहारे ही ऊँचाई बढ़ाते हुए जिन्दा रहने और आसमान की ओर ताक-झाँक करने में समर्थ हो पाती हैं। फिर ये दुर्जन लोग तो परजीवी और पराश्रित अमरबेल की तरह हैं। कहे जाते हैं अमरबेलिया, लेकिन होते हैं मृत। न जमीर के होते हैं, न जमीन के।
इन हालातों में प्रतिस्पर्धा का कोई अर्थ नहीं है। यह सब कुछ जुड़ा हुआ है आसुरी भावों से। जो करना हो करते रहें, औरों की तरफ न देखें, न निन्दा करें। समुदाय के सामने सब कुछ खुला हुआ है। पब्लिक है सब जानती है।

