साहित्यिक यात्रा में वापस
साहित्य
8 min read

नाकारा हो जाते हैं खुद को सर्वज्ञ मानने वाले

Deepak Acharya
Deepak Acharya
November 8, 2021
नाकारा हो जाते हैं खुद को सर्वज्ञ मानने वाले

हम सभी लोग जिन्दगी भर विद्यार्थी के रूप में रहते हैं और रहना भी चाहिए। सीखने-सिखाने और अनुकरण करने की कोई आयु निर्धारित नहीं है, पूरी जिन्दगी इंसान कुछ न कुछ किसी न किसी से सीखता ही है। जीवन के अंतिम क्षण तक भी ज्ञान पाया जा सकता है। हो सकता है यह ज्ञान मृत्यु के आसन्न रहने पर प्राप्त होने के उपरान्त भी उपयोग में नहीं आ पाए लेकिन इसका लाभ हमें अगले जन्म में प्राप्त हो सकता है क्याेंकि शरीर परिवर्तन के बावजूद अर्जित ज्ञान सूक्ष्म रूप में संग्रहित रहता है और इसका लाभ हमें प्राप्त होता है। इसे ही मौलिक प्रतिभा कहा जा सकता है। इस मौलिक प्रतिभा और हुनर को आधार मानकर यदि हम आगे बढ़ें तो हमारे जीवन में तरक्की और बहुविध सफलता का रास्ता और अधिक तीव्रतर हो सकता है। इसलिए इंसान को अंतिम समय तक ज्ञान, अनुभव और हुनर पाने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए।

मगर सभी लोग ऎसा नहीं कर पाते हैं। उनके सामने उनका अहंकार आड़े आता है जो उन्हें इसकी इजाजत नहीं देता, उन्हें रोक लेता है और इस कारण से बहुत सारे लोगों को यह भ्रम हो जाता है कि उन्हें अब कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं है, वे दुनिया के उन लोगों में शुमार हो चुके हैं जिन पर सर्वज्ञ होने का बहुत बड़ा भ्रम भूत-पिशाच की तरह हावी हो गया है। इसलिए इनमें सर्वज्ञता के अहंकार से पहले तक जो भी ज्ञान संचित था उसका स्तर वही रहता है, इस ज्ञान मंजूषा पर हमेशा के लिए ताला लग जाता है और यह ताला उनकी मृत्यु तक भी यों ही लगा रहता है।

इसलिए इन लोगों की जिन्दगी में ज्ञानार्जन, अनुभवों की प्राप्ति और कौशल हुनर निखार की सारी संभावनाएं समाप्त हो जाती हैं और इनके दिमाग पर बड़ा सा अदृश्य ढक्कन लग जाता है जो फिर कभी नहीं खुलता। आजकल यह स्थिति बड़े-बड़े लोगों में हो गई है। बहुत से लोग हैं जिन्हें अपने से संबंधित विषयों तक की जानकारी का अभाव है लेकिन दुनिया के तमाम विषयों में महारत हासिल होने और सर्वज्ञ हो जाने का भ्रम पीछा छोड़ नहीं रहा।

पाश की तरह से बँधे हुए हैं और तिस पर खासियत ये कि ये उन लोगों को उपदेश झाड़ते हैं, राय देते हैं जो इनसे कई गुना विद्वान, अनुभवी और हुनरमंद हैं। कुछ प्रजातियां ऎसी ही हो गई हैं जिन्हें हर मामले में अपने आपके दक्ष और सर्वज्ञ होने का अहंकार घेरे हुए है। समाज और देश का दुर्भाग्य ही है कि ऎसे लोग आते जा रहे हैं जिन्हें भ्रमों के शहंशाहों के रूप में स्वीकारा जा रहा है।

ज्ञान प्राप्ति का क्रम जब तक बना रहता है तभी तक आदमी ऊर्जित और उत्साही बना रह सकता है। एक बार पूर्णता का बोध हो जाने के बाद ज्ञान, अनुभव और हुनर प्राप्ति के सभी रास्ते बंद हो जाते हैं जो बाद में लाख कोशिशों के बावजूद नहीं खुलते।इसका दूसरा प्रभाव यह पड़ता है कि जीवन में पूर्णता का भ्रम हो जाने के बाद वार्धक्य की यात्रा आरंभ हो जाती है और यह तब तक पीछा नहीं छोड़ती जब तक शरीर, मन-बुद्धि और सभी विलक्षणताओं, प्रतिष्ठा और संचित ज्ञान का पूर्ण क्षरण न कर डाले।

बहुत सारे लोग हैं जो लम्बे समय तक काम करते हुए अपने आपको ज्ञानी, अनुभवी एवं महान सिद्ध करते रहते हैं और खुद को इस प्रकार पेश किया करते हैं जैसे कि इनकी तरह कोई और हो ही नहीं सकता। दुनिया की अंतिम विरासत ही हैं और इसलिए इस अमूल्य धरोहर को सभी स्थानों पर सम्मान प्राप्त होता रहे, आगे बढ़ते रहें और दूसरे लोग इन्हें ससम्मान पालकियों में उठाए रखें, आतिथ्य देते रहें और खास मानकर पूजते रहें।

दुनिया के सारे नाकाराओं की ईमानदारी से गिनती की जाए तो यह बात साफ तौर पर सामने आ ही जाएगी कि ये ही वे लोग हैं जो अपने आपको सर्वज्ञ समझ बैठे हैं और जब से इन्हें सर्वज्ञ और दूसरों के मुकाबले ज्ञानी, अनुभवी और हुनरमंद होने का फोबिया लगा है तभी से ये किसी काम के नहीं रहे।

दुनिया ऎसे लोगों से भरी पड़ी है। इनका दूसरा पक्ष यह भी है कि हमेशा कृत्रिम धीर गंभीरता ओढ़े रखने की वजह से उदासी भी इनकी हमसफर हो जाती है और इसका नुकसान इन्हें हमेशा होता है। जीवन का आनंद पाने के इच्छुक लोगों के लिए यह जरूरी है कि वे हमेशा सीखने के लिए तैयार रहें और अंतिम क्षण तक सीखते रहें।