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साहित्य
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बच के रहें इन दैत्यों और दैत्याओं से

Deepak Acharya
Deepak Acharya
August 16, 2023
बच के रहें इन दैत्यों और दैत्याओं से

आदमी जैसा आया है, जो है, वैसा ही रहता है। निरंतर कठोर परिश्रम से प्राप्त उपलब्धियों वाले पुरुषार्थी आदमी जहाँ रहते है वहीं स्वर्ग बना लेते हैं। उनके लिए स्थान का कोई ख़ास महत्त्व नहीं होता। इनके लिए उनका अपना निश्छल एवं अनवरत कर्मयोग प्रत्येक स्थान पर भारी रहता है और इसकी गंध बरसों बाद तक महसूस की जाती रहती है।

सच्चे कर्मवीर देश, काल व परिस्थितियों से ऊपर उठकर काम करते हैं। इनके पास मौलिक हुनर के साथ ईश्वरीय कृपा भी अटूट होती है। फिर इनके लोक मंगलकारी कार्यो व सद्भावी व्यक्तित्व की वजह से सभी की दुआएं भी खूब मिलती रहती हैं। असल मे ये ही इनकी पूंजी होती है।

इन बहुआयामी ऊर्जाओं के ही फलस्वरूप ऐसे लोगों के लिए अनवरत रचनात्मक कर्म करते रहना ही जीवन का लक्ष्य बना रहता है। इन दृढ संकल्पों के बीच न स्थान विशेष इन्हें प्रभावित कर पाता है, न समय। और न ही स्थान विशेष। ये जहाँ रहते हैं वहाँ हर परिस्थिति में खुद ढल जाते हैं व प्रसन्नता के साथ तमाम कठिनाइयों को चुनौती के रूप में स्वीकार भी कर लेते हैं।

इन सभी प्रकार की परिस्थितियों में समन्वय बनाये रखने वाले लोग समता भाव, सहिष्णुता, धैर्यवान, परहित और निरंहकारी रहते हैं। ये लोग बडे़ ओहदों पर होने के बावजूद छोटी जगह पर रहें अथवा छोटे ओहदों को धारण करते हुए बड़ी जगह पर रहें, ये स्थान विशेष की हवाओं की नेकचलनी या बदचलनी से अप्रभावित रहते हैं क्योंकि इन्हे अपनी मर्यादाओं की परिधि का मान हमेशा बना रहता है।

यह असीम आत्मतुष्टि ही इन्हें हमेशा आनन्ददायी और स्फूर्तिमान बनाये रखती है। इसके विपरीत काफी संख्या में ऐसे-ऐसे अनचाहे लोग पैदा हो गए हैं जो अधजल गगरी बने हुए जहाँ-तहाँ छलकते रहकर अपने होने का प्रमाण दर्शाते रहते हैं।

इनके जीवन में न मर्यादा रहती है न समत्व या दूसरों के प्रति संवेदनशीलता या परोपकार का भाव। ऐसे लोग अपनी उच्चाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। इनमें बड़े ओहदेधारी किसी छोटे स्थान पर लगा दिए जाएं तो इनका हर दिन असंतोष के साथ उगता है।

ऐसे में ये न खुद के काम ढंग से कर पाते है न औरों के। किसी छोटे स्थान विशेष में समृद्धि या आकर्षण का कोई केन्द्र हो तब अपवाद कहा जा सकता है वरना ये रोजाना कुढ़ते रहकर दिन काटते रहते हैं।

दूसरी अवस्था में इस किस्म के आदमी अपनी हैसियत से ज्यादा ओहदा पा जाएं अथवा किसी बड़े स्थान विशेष में लगा दिए जाए तब इनकी असलियत कुछ और ही हो जाती है। बडे़ स्थलों पर पहुंचकर ये लोग अपने आपको बहुत बड़ा लाट साहब या वीआईपी-वीवीआईपी महसूस करने लग जाते हैं और अपने चारों तरफ हमेशा इस इन्द्रजाल का आभामण्डल बुनते रहते हैं।

बडे़ स्थान विशेष पर होने वाले ये लोग फिर उन पर भी शोषण से भरी और भारी हुकूमत करने की कोशिश करने लगते हैं जो छोटे स्थलो पर तैनात हैं और उनसे ऊँचे ओहदों पर विद्यमान हैं। ये उन्मुक्त उच्छृंखलता, स्वेच्छाचार और बेशर्मी का ताण्डव मचाने को ही जीवन का चरम् लक्ष्य मान बैठते हैं और उसी अनुरूप इनके पैशाचिक दुराचरणों की श्रृंखला दिखने लग जाती है।

बड़े ओहदों और स्थलों पर पहुंचकर अचानक बड़े हो जाने वाले ये लोग मुखौटा कल्चर का पूरा-पूरा दुरुपयोग करते हुए अपने कई-कई किरदारों में जीने लगते हैं। कभी ये संरक्षक या भाई-बहन का सम्बन्ध बनाकर नसीहत देने लगते हैं, कभी महानतम विशेषज्ञ और चिंतक के रूप में उपदेश झाड़ने लग जाते है, और कभी बॉस की भूमिका में डाँटने-डपटने या घुट्टी पिलाने।

आमतौर पर होता यही आया है कि भौगोलिक लिहाज से बड़े व अपेक्षाकृत विकसित स्थल विशेष पर पहुंचे या रह रहे बहुसंख्य ऐसे लोग अपने से निम्न क्षेत्रों के लोगों को अपने से कम ही आँकते हैं व तमाम प्रकार के जरूरी व गैर जरूरी व्यवहार भी उसी अनुरूप करते हैं। इनकी पूरी जिन्दगी अपने-अपने कर्मस्थलों पर भी मिथ्या बडप्पन दिखाते और फ्री स्टाइल धींगामस्ती और धौंस झाड़ने में ही लगी रहती है।

इनकी हरकतों, करतूतों और उन्मादी अवस्थाओं को भुगतने वाले और देखते रहने वाले भले ही इन्हें कुत्ता कमीना, रंगा सियार, लालची भेड़िया, जहरीला नाग-नागिन, सूअर, गिद्ध, चालाक लोमड़-लोमड़ी या भूत-पलीत और राक्षस कहें या कुछ और, इन्हें कोई फरक नहीं पड़ता क्योंकि ये इंसानियत की सारी मर्यादाओं को छोड़कर लूट-खसोट, भ्रष्टाचार, हरामखोरी भरा मुफतिया खान-पान, अपनी औकात से कई गुना सम्मान पाने की लालसा भरे कुकर्मों आदि में इतने रमे होते हैं कि अपने मनुष्य होने का भान भूल जाते हैं।

ऐसे लोगों को माता-पिता, पति-पत्नी, भाई-बहन से लेकर सारे रिश्ते-नातों में कोई रुचि नहीं होती है। इनका एकमेव लक्ष्य बिना मेहनत के कमाई करते हुए राजधर्म, गृहस्थ धर्म और सेवा परोपकार वाले धर्म को ताक में रखकर चोर-डकैत और तस्कर की भूमिका को प्रतिष्ठा देना ही रह जाता है।

बड़ेपन को अंगीकार करने वाले आदमियों की फितरत कहें अथवा बडे़ शहरों या महानगरों की प्रदूषित हवाओं की असर, कुछ बिरलों को छोड़ दिया जाए तो सारे के सारे इस गंदगी से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। आजकल इन असुरों की संख्या और प्रभाव में लगातार हो रही बढ़ोतरी ने मानवीय संवेदनाओं और सदाचारों का कबाड़ा कर रखा है।

ऐसे में शुचिता और मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण संस्कारों का अवलम्बन ही हमें इनसे दूर रहकर आत्म आनन्द का अहसास करा सकता है। ऐसे पिशाचों और पिशाचिनियों का समूल संहार ही आज का सर्वोपरि एवं प्राथमिक युग धर्म है।