स्मृति शेष - श्री पूर्णाशंकर पण्ड्या , शिक्षा, समाजसेवा व रचनात्मक कर्मयोग का आदर्श संगम


वो पीढ़ी अब लुप्तप्रायः ही होती जा रही है जिसमें ऐसे-ऐसे जीवट व्यक्तित्व भरे मेधा-प्रज्ञा सम्पन्न भारी-भरकम लोग हुआ करते थे जिनके लिए निष्ठा, कर्त्तव्यपरायणता और समर्पण भाव ही सब कुछ था, और समाज की हरसंभव सेवा ही लक्ष्य, कल्याणकारी दिशा-दृष्टि का प्रवाह ही उनके कर्मयोग की ख़ासियत।
नौकरी को केवल पैसा कमाने और इससे जुड़े ट्यूशनी धंधों तथा अन्य काम-धंधों से पैसा जमा करते हुए टाईमपास करने की नीति और नीयत दोनों से परे रहकर अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व को ही समाजोन्मुखी कर देने और ताजिन्दगी बनाए रखने का माद्दा रखने वाली ऐसी ही विभूतियों में एक नाम उभर कर सामने आता है श्री पूर्णाशंकर पण्ड्या।
बहुआयामी व्यक्तित्व
बांसवाड़ा जिले के छोटे से किन्तु प्राचीन ब्रह्मा मन्दिर की वजह से देश-दुनिया में अपनी पहचान रखने वाले छींच गांव के निवासी श्री पूर्णाशंकर पण्ड्या का व्यक्तित्व शैक्षिक परिधियों तक ही सीमित नहीं रहकर बहुआयामी रहा।
बंधी-बंधायी चन्द घण्टों की नौकरी और मासिक तनख्वाहभोगी टीचर मात्र न होकर वे गुरु के रूप में अपनी प्रवृत्तियों के माध्यम से नई पीढ़ी के उत्थान के लिए सदैव समर्पित रहे। पारदर्शी और हृदयस्पर्शी व्यक्तित्व ऐसा कि उनकी सरलता, सहजता और सादगी का हर कोई कायल रहा। एक बार जो उनके सम्पर्क में आया, हमेशा के लिए उनका मुरीद हो गया।
निरहंकारी जीवन दृष्टि
ठेठ देहाती व्यक्तित्व के धनी और जमीन से जुड़े श्री पण्ड्या के जीवन में कोई क्षण ऐसा नहीं रहा जब उनमें अहंकार का छोटा सा कतरा भी कभी देखा गया हो। सामान्य शिक्षक से लेकर शिक्षा विभाग के शीर्ष अधिकारी तक के पूरे सफर के दौरान् उनका समग्र व्यक्तित्व किसी प्रेरक महापुरुष से कम नहीं था।
आज जहां पूरी दुनिया पैसों और भौतिक विलासिता के पीछे भाग रही है, जाने किन-किन बड़े-बड़े लोगों, अफसरों और अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे नेताओं की जी हूजूरी करती रहती है फिर भी आत्मतोष प्राप्त नहीं कर पाती लेकिन पण्ड्याजी इसके अपवाद थे।
निष्काम कर्मयोग सर्वोपरि
आज के भाग्यविधाताओं की तरह उन्होंने नेताओं की चापलूसी, जयगान और परिक्रमा का सुकून पाने की सम सामयिक बुराई कभी नहीं पाली। वे अपने कर्मयोग से ही सरोकार रखते थे। न उन्होंने कभी तबादला रुकवाने के लिए कहीं कोई समझौता किया, न किसी ओर गलत सिफारिश को माना। जो सच्चा और अच्छा है उसका साथ, जो बुरा है उसे दूर से सलाम। जिस समय जो जिम्मेदारी सौंपी गई, निभाते चले गए।
राजधर्म का परिपालन
इस दृष्टि से निरपेक्ष, तटस्थ और ईमानदार शिक्षाविद् तथा पक्षपातहीन अधिकारी के रूप में उन्होंने राजधर्म का पालन किया। उन्होंने पूरी जिन्दगी ईमानदारी के साथ कर्मयोग का निर्वाह किया और यह दर्शा दिया कि वास्तव में विद्या विनय भी देती है और स्थितप्रज्ञता भी। आत्म आनंद भी देती है और शाश्वत शांति भी।
जीवन माधुर्य का प्रवाह
वाणी का माधुर्य इतना कि हर बात अनुभवों के रस में पग कर बाहर निकलती, आनंद देती और मन में गहरे तक असर कर जाती। मन-वचन और कर्म में समानता उनके व्यक्तित्व का अहम् गुण था।
आयातित चमक-दमक से दूर
देश और दुनिया में इंसानियत की प्रतिमूर्ति कहे जाने वाले चन्द फीसदी बिरले लोगों में उन्हें शामिल माना जा सकता है जो पब्लिसिटी के स्टंटों और फोबिया से खुद को चमकाने और पूरी नौकरी पुरस्कारों, सम्मानों और अभिनन्दनों की दौड़ में बने रहने की सुरसाई प्यास और कुंभकर्णी भूख से कोसों दूर थे।
स्वाभिमान और सिद्धान्त अनुकरणीय
आत्मप्रचार से दूर रहने की वजह से प्रकाश में भले न आए हों मगर सच्चे इंसानों के हृदय में उनकी अमिट छाप रही है और यही वजह है कि श्री पण्ड्या को हर कोई आदर-सम्मान एवं श्रद्धा प्रदान करते हुए उनका सान्निध्य पाकर अपने आपको धन्य मानता रहा है। आज भी उनके कद्रदान उन्हें याद करते हुए भावुक हो उठते हैं। जीवन में उच्च आदर्शों और सिद्धान्तों के साथ जिये, अपने स्वाभिमान को बरकरार रखा और किसी के आगे झुके नहीं।
रचनात्मक कार्यों में अग्रणी
अस्सी पार जीवनयात्रा की स्थिति में भी श्री पूर्णाशंकर पण्ड्या सामाजिक सेवा कार्यों में हमेशा अग्रणी रहे। शिक्षा, समाजसेवा, धार्मिक गतिविधियों और जन कल्याण से लेकर इंसानियत के हर मोर्चे पर उनका योगदान किसी न किसी रूप में उल्लेखनीय एवं अमिट रहा है।
उनका नहीं रहना किसी एक व्यक्ति का महाप्रयाण नहीं है बल्कि देश के उन चुनिन्दा बुद्धिजीवियों में शुमार उस हस्ती का खोना है जिसे सच्चे अर्थों में इंसानियत की प्रतिमूर्ति कहा जा सकता है।
गुरु का मूल्यांकन शिष्यों से ही होता है। उनकी सुदीर्घ शिष्य परम्परा आज भी उनके प्रति कृतज्ञता अभिव्यक्ति करते हुए भावातिरेक होकर श्रृद्धा और आदर की धाराओं में बहने लगती है। ये आत्मीय संबंध और समर्पित दायित्व बोध ही है जिसका उदाहरण देते हुए लोग कहने लगते हैं कि अब न ऐसे गुरु रहे हैं, न शिक्षा का माहौल।
आत्मतोष और आनन्द भरी जीवनयात्रा के बीच 25 मार्च 2016, शुक्रवार शाम उन्होंने अंतिम साँस के साथ धरती को हमेशा-हमेशा के लिए विदा कह दिया। मृत्यु से दो माह पूर्व पाँव फ्रेक्चर हो जाने की वजह से उनका घर से बाहर निकलना संभव नहीं हो पा रहा था लेकिन घर बैठे ही अपने अनुभवों और मार्गदर्शन देने की श्रृंखला अंतिम समय तक जारी रही।
सच्चे, आदर्शवादी, सिद्धान्तों के पक्के, स्वाभिमानी और लोक कल्याण के स्रष्टा पूर्णाशंकर पण्ड्या को कभी भुलाया नहीं जा सकता। ऐसे बिरले लोग अब गिने-चुने ही रह गए हैं।
वागड़ रत्न स्व. पूर्णाशंकर पण्ड्या की पुण्य तिथि पर भावभीनी श्रद्धान्जलि।
