भागवत कथाओं के नाम पर उत्सवी धूमधड़ाके औचित्यहीन....


जिन क्षेत्रों में गौवंश कुपोषित, दुःखी और प्रताड़ित रहता है, गौहत्या होती है, वहां रहने वालों की भगवान कभी नहीं सुनता। इसका पूरा का पूरा पाप क्षेत्र के बाबाओं, धार्मिक संस्थाओं के तमाम पदाधिकारियों और सदस्यों, संत-महंतों, पुजारियों, कर्मकाण्डियों, कथावाचकों सहित सभी के खाते में जुड़ जाता है। इन इलाकों में भागवत कथाओं, सत्संग और प्रवचनों के धंधे पाखण्ड के सिवा कुछ नहीं।
सच तो यह है कि जहाँ गौवंश भूखा-प्यासा, प्रताड़ित और दुःखी रहता है वहाँ भागवत कथाओं और सत्संग के नाम पर उत्सवी आयोजन, भण्डारे और अनुष्ठानों का कोई औचित्य नहीं।
ऐसे आयोजकों और आयोजनों में हिस्सा लेने वाले तथाकथित भक्तों और अंधश्रद्धालुओं तथा इनके माध्यम से अपनी चवन्नियां चलाते हुए प्रतिष्ठा, धनसंग्रह तथा धर्म के नाम पर उत्सवी मनोरंजन करने-कराने वालों से भगवान रुष्ट रहता है।
ऐसे पाखण्डों को भगवान धर्मविरूद्ध मानता है। यही कारण है कि भागवत कथाओं का फोबिया दर्शाने वाले क्षेत्रों में कोई सुधार नहीं देखा जाता।
मजे की बात तो यह भी है कि इन कथाओं और उत्सवी आयोजनों में शामिल होने वाली भीड़ एक ही तरह के लोगों की होती है जिन्हें अपने मनोरंजन व क्षणिक आत्मतृप्ति के लिए साल भर कोई न कोई आयोजन चाहिए होता है। ये ही लोग हर बार जमा होते रहते हैं जहां ऐसे आयोजन होते रहें।
क्षेत्र में धर्म-अध्यात्म के लिए स्थायी और दीर्घकालीन काम कहीं नहीं हो पा रहा। और हम सारे के सारे लोग उत्सवी आयोजनों से अपनी पब्लिसिटी, सम्मान और अभिनंदन में भिड़े हुए हैं। भक्तांं और बाबाओं, कथावाचकों का यह गठजोड़ धर्म के नाम पर पाखण्ड फैला रहा है।
भागवत ग्रंथ अपने आप में भगवान का साक्षात् श्रीविग्रह है ऐसे में भागवत कथाएं ज्ञान यज्ञ हैं। इनमें विभिन्न प्रसंगों पर झांकियों और नौटंकियों का कोई स्थान नहीं।
इसी प्रकार आज हम भागवत कथाओं का आयोजन कर रहे हैं लेकिन न कहीं सम्पूर्ण भागवत पूर्ण हो रही है न भागवत का मूल पारायण साथ में। भागवत के नाम पर दूसरी-तीसरी बातें ज्यादा घुस आयी हैं।
लोग इस भ्रम मेंं भागवत कथाएं कराने में रुचि लेते हैं कि उनके पितरों का मोक्ष हो जाएगा। जबकि इसके लिए भागवत कथाओं में न तो मूल पारायण विधिवत होता है, न मोक्ष के निमित्त जप और विधिविधान से कोई अनुष्ठान। ऐसे में भागवत के नाम पर लोगों को मूर्ख बनाने का धंधा चल निकला है।
भागवत कथाओं का आश्चर्यजनक पहलू यह भी है कि जो लोग भागवत कथाएं करते-कराते हैं, उनके कथावाचक अधिकांशतया फिक्स होते हैं। कोई नया कथाकवाचक वे स्वीकार कर ही नहीं पाते।
कथावाचकों, बाबाओं और मठाधीशों से लेकर कथा आयोजकों तक का गहरा गठबंधन ही ऐसा है कि बार-बार एक ही तरह के कथावाचक आते-जाते रहते हैं। किसी अन्य को अवसर देना चाहते ही नहीं। सबने अपने-अपने क्षेत्रों में जबर्दस्त घुसपैठ बना रखी है।
भागवत के सिवा खूब सारी कथाएं हैं मगर इनमें कोई रुचि नहीं ली जाती क्योंकि उनके फेवरेट कथावाचक या बाबाजी केवल भागवत के ही मर्मज्ञ होते हैं। इसलिए महा मजबूरी है।
इस लेख का उद्देश्य किसी की भावनाओं को आहत करना नहीं है बल्कि धर्म के मूल मर्म और भागवत कथाओं के सम सामयिक प्रवाह और नग्न सत्य से परिचित कराना मात्र है।
(नोट - उन सभी धंधेबाजों से हार्दिक क्षमायाचना सहित, जो भागवत कथाओं के माध्यम से उत्सवी और मनोरंजनात्मक आयोजनों में रमे रहकर धर्म-अध्यात्म के प्रचार-प्रसार में अपने सम्पूर्ण जीवन को समर्पित किए हुए हैं। )
