संकल्प से संभव है सर्वस्व प्राप्ति


यह सम्पूर्ण संसार और इसकी प्रवृत्तियां दैवीय और दिव्य ऊर्जाओं की शक्ति पाकर वैचारिक तरंगों के माध्यम से संचालित होती हैं। इसीलिए कहा गया है कि पिण्ड और ब्रह्माण्ड के मध्य सीधा और सम्पूर्ण तादात्म्य शाश्वत रूप से स्थापित है।
पिण्ड जितना अधिक विशुद्ध और मौलिकता लिए हुए होता है उतना अधिक वह ब्रह्माण्ड की हलचलों के प्रति सुचालक और तरंगायित बना रहता है। यही कारण है कि बहुत सी जीवात्माएं भू लोक पर होते हुए भी ऊपर के एकाध से लेकर तमाम लोकों तक की हलचलों की थाह पा लेती हैं।
इसका कारण यह है कि जिनकी मन, बुद्धि और शरीर शुद्ध होता है उनकी आत्मा का परमात्मा की शक्तियों के बल पर निर्बाध आवागमन होने से उनमें भूत, भविष्य और वर्तमान की समस्त क्रियाओं, भावों और घटनाओं तथा दुर्घटनाओं की थाह पा लेने की क्षमता विकसित हो जाती है और इस वजह से पूर्वाभास तथा छठी इन्द्रिय के सक्रिय होने की स्थिति बन जाती है।
इसके लिए शारीरिक पवित्रता और मानसिक शुद्धि के साथ ही शरीरस्थ चक्रों का जागरण अनिवार्य होता है। ये चक्र जब तक सुषुप्त अवस्था में पड़े रहते हैं तब तक जीवात्मा पशुवत और सामान्य ही बना रहता है।
मनुष्य का लक्ष्य इन्हीं चक्रों का जागरण करते हुए योगमार्ग का आश्रय पाते हुए परमात्मा की प्राप्ति होता है। इसके लिए ब्रह्मचर्य, ज्ञान योग, कर्मयोग और भक्तियोग से लेकर अष्टांगयोग और कुण्डलिनी जागरण तक के कई प्रकार के मार्ग उपलब्ध हैं।
इन्हीं चक्रों का भेदन करते हुए जब मूलाधार से सहस्रार चक्र तक का मार्ग खुल जाता है तब शरीर दिव्य और दैवीय अवस्था को प्राप्त हो जाता है। यह स्थिति तभी प्राप्त हो पाती है जब जीव समस्त प्रकार की ऐषणाओं से मुक्त हो जाता है। इनमें तीन प्रकार की ऐषणाएं प्रमुख हैं - पुत्रेषणा, वित्तेषणा और लोकेषणा। इसका संकेत करते हुए ही कहा गया है इनसे मुक्ति पाने के लिए तीन प्रकार की ग्रंथियों से मुक्त होना जरूरी है।
मूलाधार में ब्रह्मग्रंथि, मणिपूर में विष्णु ग्रंथि तथा आज्ञाचक्र में रूद्र ग्रंथि। कोई कितना ही बड़ा साधक क्यों न हो उसकी ये ग्रंथियां तब तक नहीं खुलतीं जब तक कि इनसे संबिंंधत ऐषणाओं से पूरी तरह मुक्ति पाकर शून्यावस्था न आ जाए। पुत्र-पौत्रादि, जमीन-जायदादि, काम, पशुता और पदार्थों की विस्तारवादी भावना से मुक्त होने पर ही मूलाधार चक्र खुल सकता है। इसी प्रकार धन-सम्पत्ति की किंचित मात्र भी आशा-अपेक्षा बनी रहने पर मणिपूर चक्र की विष्णु ग्रंथि का खुलना संभव नहीं होता।
इन दोनों ही प्रकार की ऐषणाओं से सम्पूर्ण प्रकार की मुक्ति पा जाने पर आज्ञा चक्र की रूद्र ग्रंथि आती है। इसका संबंध लोकेषणा से है। व्यक्तिगत मान-सम्मान, पूजा और आदर की तनिक सी भी कामना के शेष रहने पर रूद्र ग्रंथि का खुलना संभव नहीं होता।
इन सभी प्रकार की कामनाओं के शून्य हो जाने पर ही मूलाधार से सहस्रार चक्र तक पहुंचने का मार्ग खुलता है और जीव जीवन्मुक्ति का अनुभव कर पाता है। इस स्थिति में पिण्ड और ब्रह्माण्ड एकत्व को प्राप्त हो जाते हैं।
इन तमाम अलौकिक यात्राओं से गुजरते हुए स्थूल शरीर जहाँ विशुद्धावस्था के साथ-साथ दिव्य ऊर्जाओं और परिपुष्ट अवस्था को प्राप्त करता जाता है उसके साथ ही सूक्ष्म शरीर भी ताकतवर होता जाता है। इस स्थिति में सूक्ष्म शरीर में वह शक्ति आ जाती है कि वह सभी लोकों में विचरण का सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है और इसी से उसमें त्रिकालज्ञ होने का सामर्थ्य आ जाता है।
इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए यों तो साधक को अर्सा लग जाता है किन्तु पवित्रता के साथ भगवद् आश्रय प्राप्त कर लेने पर सब कुछ अपेक्षाकृत शीघ्र संभव हो पाता है। एक सामान्य व्यक्ति नाम और मंत्र अथवा ध्वनि के सहारे इस यात्रा को सहज प्राप्त कर सकता है। शर्त यही है कि उसका संकल्प उत्तरोत्तर बलवान होता रहना चाहिए।
शरीर की पवित्रता, मन-बुद्धि की विशुद्ध अवस्था के साथ अहंकार शून्यता के रहते हुए संकल्प की सुदृढ़ता के कारण वह स्थिति आ जाती है कि वह अपने भीतर परमात्मा के दुर्लभ तत्व का अनुभव करता हुआ परमात्मा और प्रकृति से एकाकार स्थापित कर लेता है।
यह वह अवस्था होती है जब उसकी वृत्तियां भगवदाकार हो जाती हैं और सभी प्रकार की सामर्थ्यशाली शक्तियां और अधिकार उसके सहज नियंत्रण में आ जाते हैं और दृष्टि परम मंगलकारी विधानयुक्त हो जाती है।
यों तो यह यात्रा गुरुगम्य एवं कठिन है लेकिन व्यक्ति अपने स्वयं के स्तर पर यदि अपने संकल्प को मजबूत बनाने का अभ्यास कर ले और आत्म मुग्ध होते हुए सत्, चित् आनन्द का अनुभव करने में सक्षम हो जाए तो सिद्धावस्था प्राप्त होने में देर नहीं लगती।
इन सभी बातों का सार यह है कि व्यक्ति यदि अपने संकल्प को सुदृढ़ करते हुए निरन्तर अभ्यास को अपना ले तो यही संकल्प उसकी वैचारिक तरंगों को उसकी भावनाओं के अनुरूप परमाण्वीय आकार-प्रकार में ढालते हुए उसके मन के अनुरूप सृष्टि एवं शक्ति का सृजन करते हुए वह सब कुछ संभव कर देते हैं जो अभीप्सित होने के साथ ही जीवात्मा के उद्धार एवं कल्याण का मार्ग प्रदान करने वाले हैं।
घर-परिवार, परिवेश एवं संसार में रहते हुए परिस्थितियां चाहे कैसी भी प्रतिकूल क्यों न हों, व्यक्ति मानसिक रूप से भीतरी आनन्द का अनुभव करते हुए यदि संकल्प को मजबूती देते हुए आगे बढ़ने का अभ्यास कर ले तो वह स्थिति ला सकने में समर्थ हो सकता है जो सिद्ध और योगीजन प्राप्त करने के लिए लालायित रहते हैं।
इसके लिए वन-जंगलों में जाकर तपस्या की आवश्यकता नहीं रहती बल्कि संसार में रहकर भी व्यक्ति इसकी प्राप्ति कर सकता है। इसलिए संकल्प को उत्तरोत्तर बलवान बनाने की आवश्यकता है। इसके लिए नाम और मंत्र जप के साथ भगवान की शरणागति सबसे सहज, सरल और आसान उपाय माना गया है। इससे लौकिक एवं पारलौकिक सभी प्रकार के लक्ष्यों के साथ ही आत्म आनन्द और भगवत्प्राप्ति तक सब कुछ संभव है।
