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स्मृति शेष कैप्टेन छगनलाल सिंघवी - स्वतंत्रता संघर्ष और जागरुकता के पर्याय

Deepak Acharya
Deepak Acharya
January 9, 2022
स्मृति शेष कैप्टेन छगनलाल सिंघवी - स्वतंत्रता संघर्ष और जागरुकता के पर्याय

स्वाधीनता संग्राम में वागड़ अंचल के स्वाधीनता सेनानियों ने जिस त्याग-तपस्यासमर्पण और बलिदान का अमिट एवं गौरवशाली इतिहास कायम किया है उनकी दीर्घ श्रृंखला है। इन स्वतंत्रता सेनानियों को आज भी वागड़वासी गर्व के साथ याद करते हैं। इन्हीं में एक हैं कैप्टेन छगनलाल सिंघवी।

डूंगरपुर जिले के सागवाड़ा शहर में जनवरी सन् 1925 को जडावचन्द जी के यहां श्रीमती धूरी देवी की कोख से जन्मे छगनलाल के लिए संघर्ष जीवन भर चलता रहा। आठ वर्ष की उम्र में पिता का साया उनके सर से उठ गया। माँ की तबीयत खराब रहने लगी। ऎसे में घर-परिवार का बोझ उनके सर आ पड़ा। चार बहनों की परवरिश भी उनके जिम्मे आ पड़ी।

सेनानियों का सान्निध्य

इस स्थिति में छोटी आयु से ही छगनलाल ने पास के जनजाति बहुल खड़लई गांव में व्यवसाय शुरू किया जहां माणिक्यलाल वर्मागोकुलभाई भट्ट, शोभालाल गुप्तरामनारायण चौधरी, कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरीगौरीशंकर उपाध्याय, शेरे कटारा देवराम शर्मा जैसे महान स्वतंत्रता सेनानियों की गतिविधियां परवान पर थीें। पन्द्रह वर्ष की आयु में सिंघवी ने स्वतंत्रता एवं लोक जागरण गतिविधियों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। स्व. गौरीशंकर उपाध्याय के सान्निध्य में छगनलाल के क्रान्तिकारी संस्कारों का पल्लवन-पुष्पन होता चला गया। आजादी की लड़ाई में उपाध्याय उनके गुरु थे।

राजस्थान सेवा संघ ने शिक्षा के माध्यम से सामाजिक संगठन और लोकचेतना पैदा करने का बीड़ा उठाया और सागवाड़ा क्षेत्र में पहली स्कूल खड़लई में खोली गई। व्यापार के माध्यम से परिवार का भरण-पोषण करते हुए स्व. गौरीशंकर उपाध्याय के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने सेवा संघ की गतिविधियों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया और आयुर्वेद विशारद की उपाधि प्राप्त की।

जरूरतमन्दों के लिए उदारतापूर्वक मदद

संवत 1990 में पिता के स्वर्गवास के बाद संवत 1993 में अतिवृष्टि के कारण अकाल पड़ा और लोगों के पास दाना-पानी समाप्त होने लगा। ऎसे कठिन हालातों में व्यापार के लिए अपने पास जमा 100 कलपी अनाज बंटवाया। सिंघवी एवं सेवा संघ के कार्यकर्ताओं ने गांव-गांव जाकर लोगों को अनाज बांटा। उन दिनों आवागमन के यांत्रिक साधनों के अभाव में अनाज को गधों पर लाद कर ले जाया गया।

डूंगरपुर रियासत में उन दिनों वेट-वेगारअन्यायसामन्ती शोषण से लोग त्रस्त थे। गरीबी का ताण्डव थाऎसे में सिंघवी ने 1941-42 में विद्यार्थी कांग्रेस की गतिविधियों मेें भाग लेना शुरू कर दिया। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा सागवाड़ा में प्राप्त की और उसके बाद डूंगरपुर आकर पढ़ाई की।

इन हालातों में धंधा चौपट हो गया तब वकील नाथुलाल दोसी के पास काम सीखने जाने लगे। वे अदालत में भी जाया करते। स्कूल में प्रार्थना के वक्त ‘सदा रहे आनन्द में श्री जवाहरलाल नेहरू लाल बहादुर...’ कहने पर शिक्षक ने पिटाई कर दी। स्कूल में हाजरी के वक्त हाजिर साहब की बजाय सिंघवी ‘जय हिन्द साहब’ बोलते। इस पर उन्हें बुरी तरह मार पड़ती। इससे उनका अंगूठा कट गया। सन् 1945 में डूंगरपुर दरबार का सिल्वर जुबली वर्ष मनाया जाने लगा इसका सेवा संघ और प्रजा मण्डल ने पुरजोर विरोध किया।

सहा दरबारी आतंक

महारावल के सिल्वर जुबली वर्ष में गरीब किसानों पर अनाज कर लगा दिया गया। इसका भारी विरोध हुआ। इस पर शेरे कटारा देवराम शर्मा व अन्य नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। लम्बरदार और भाट चारण महारावल का स्तुतिगान करने लगे। पचलासा में महारावल ने डेरा डाला और आदिवासियों को अपनी ओर करने की कोशिश की। जो विरोध करता उसे राजा के गुमाश्ते बुरी कदर पीटते।

पण्ड्या ने दिया कैप्टेन नाम

इसके विरोध में गलियाकोट में पूर्व मुख्यमंत्री स्व. हरिदेव जोशी एवं स्व. भोगीलाल पण्ड्या की अगुवाई में सभा हुई। इसी सभा में छगनलाल सिंघवी की नेतृत्व क्षमता को देखकर भोगीलाल पंड्या ने उन्हें ‘कैप्टेन’ नाम दियातभी से सिंघवी कैप्टेन नाम से जाने गए। इस सभा में बृजलाल शाह सहित अनेक सेनानी उपस्थित थे।

आदिवासी क्षेत्रों में प्रभातफेरियां निकालनेलोगों को रियासती दमन के विरूद्ध संगठित करने और आजादी का पैगाम गांव-गांव पहुंचाने की एकमात्र धुन उन पर सवार थी। तत्कालीन महारावल ने सिंघवी की गतिविधियों को देखते हुए गिरफ्तारी वारंट निकाल दिया। अपनी पत्नी सज्जन देवी के अस्वस्थ होने के बावजूद सिंघवी ने स्वाधीनता सेनानियों के साथ ग्राम्यांचलों में अपनी लोक चेतना गतिविधियां जारी रखीं। इधर पत्नी जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रही थी लेकिन इससे बेपरवाह होकर वे लगे रहे।

इसी बीच पत्नी सज्जन देवी की मृत्यु हो गई। घर वालों ने अंतिम संस्कार कर दिया गया। इस समय वे अज्ञातवास में थे। हालात इतने जटिल हो गए कि वे अपनी पत्नी के तीये में भी भाग नहीं ले सके। पत्नी वियोग की इस घड़ी में सिंघवी ने साफ कहा- मेरे लिये पत्नी के तीये से भी आजादी ज्यादा बड़ी है।

तब तत्कालीन सामन्ती शासन ने आरोप लगाया कि सिंघवी ने अपनी पत्नी मार डाली। इस पर अभियोग चलाया गया। शासन का एकमात्र लक्ष्य था कि किसी भी तरह से फंसाया जाए। हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन सबूत नहीं थे इसलिए मामला आगे चल नहीं पाया।

इसी दौरान् देवराम शर्मा और अन्य सेनानियों को गिरफ्तार कर लिया गया। पगड़ी की रस्म के दिन सामन्ती शासन ने मौका देख कर वहां आयी प्रजा मण्डल की टोली को गिरफ्तार कर लिया गया।

इसके विरोध में सागवाड़ा में रैली निकाली गई। गौरीशंकर उपाध्याय को नदी पार किया गया। कार्यकर्ताओं की रैली थाने पर जमा हो गई। वहां प्रदर्शन होने पर लाठीचार्ज हुआ। 8-10 जनों को गिरफ्तार कर लिया गया। सिंघवी भूमिगत हो गए और पुराने मकान के तहखाने में रह कर गतिविधियों का संचालन करते रहे। बाद में पोस्ट ऑफिस में चार दिन रहे। वहां से उन्होंने तमाम सेनानियों को टेलीफोन कर इसकी जानकारी दी। फिर मौका पाकर वगैरी में ठाकुर के वहां चले गए और सारी स्थिति बता कर रात में ही सागवाड़ा लौट आए।

गरम दल के माने जाने वाले सिंघवी ने सागवाड़ा में सुभाष रेस्टोरेन्ट नाम से होटल शुरू की। वहां भी उन्हें तंग किया जाने लगा। एक दिन 20-25 फौज़ियों ने आकर उत्पात मचाया और धमकियां दी कि शासन के खिलाफ संघर्ष किया तो कहीं का नहीं रखेंगे।

जीवर भर नहीं छोड़ा गांधी टोपी का साथ

सिंघवी में देश प्रेम का जज्बा इतना अधिक था कि तत्कालीन रियासत ने गांधी टोपी पर पाबन्दी लगा दी, ऎसे में कइयों ने गांधी टोपी पहनना छोड़ दिया। मगर सिंघवी ने गांधी टोपी नहीं छोड़ी। गांधीजी के नाम पर वादों और विचारों के शोर मचाने वाले लोगों की भीड़ में सिंघवी उन गिने-चुने लोगों में रहे जिन्होंने जीवन के अंतिम क्षण तक गांधी टोपी का साथ नहीं छोड़ा।

अपनी पत्नी की मृत्यु हो जाने पर मित्रों ने दूसरी शादी के लिए जोर दिया। इस पर संकल्प ले लिया कि जब तक देश आजाद नहीं होगा दूसरी शादी नहीं करूंगा। अपने तारुण्य को उन्होंने आजादी के लिए बलिदान कर दिया। देश को आजादी मिलने के बाद सन् 1950 में उन्होंने दूसरा विवाह किया।

इन हालातों में जनजीवन की स्थिति दयनीय होती चली गई। स्व. गौरीशंकर उपाध्याय का यह गीत उन दिनों लोक चेतना का सशक्त माध्यम बना-‘जाग-जाग दुखियारा खेडूत/थेपाड़ी फाटी गई रे तारी, सोरा नागा थायवाला जाग रे....।’

प्रजा मण्डल की गतिविधियों ने खड़लई और अन्य इलाकों में जबर्दस्त धूम मचायी। यहां जब प्रजाण्डल का गठन हुआ तब सिंघवी उन्नीस वर्ष के युवा थे। यहां प्रजा मण्डल का नाम राजपूताना प्रजामण्डल था। कांग्रेस के सच्चे कार्यकर्ता के रूप में सिंघवी ने हर संघर्ष में अपना योगदान दिया। सन् 1976 में श्रीमती इन्दिरा गांधी की गिरफ्तारी के वक्त सागवाड़ा में 78 कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के साथ प्रदर्शन किया और चौदह दिन जेल में रहे।

गायन और लेखन के जरिये लोक जागरण

अच्छे गायक और पद्य सर्जक श्री सिंघवी ने वागड़ी और हिन्दी में अपनी तथा गौरीशंकर उपाध्याय की रचनाओं के माध्यम से आजादी की अलख जगाई। आजादी के बाद लोक समस्याओं के लिए निरन्तर संघर्ष के साथ ही उन्होंने जुझारू कार्यकर्ता की पहचान बनाई। सन् 1952 से 1990 तक श्री भीखा भाई के चुनाव संयोजक रहे। वे जिला कांग्रेस के उपाध्यक्षतहसील व्यापार मण्डल के अध्यक्ष सहित अनेक पदों पर रहे। श्री सिंघवी 30 वर्ष तक सागवाड़ा नगर कांग्रेस के मंत्री रहे। सागवाड़ा नगरपालिका में बतौर पार्षद उन्होंने कई काम किए।

जीवन होम दिया लोक सेवा में

गरीबों के हमराही, निष्ठावान कांग्रेसीस्वाभिमानी व्यक्तित्व के साथ वागड अंचल लोक जागरण और शैक्षिक चेतना के साथ आजादी के संघर्ष की ढेरों घटनाओें में हिस्सेदारी के लिए सिंघवी का नाम इतिहास में अंकित है। आजादी के बाद उन्होंने लोक सेवा का प्रण लिया और जनता की सेवा में पूरा जीवन समर्पित कर दिया।

स्वतंत्रता सेनानी कैप्टेन छगनलाल सिंघवी का 76 वर्ष की आयुमें 11 सितम्बर 2002 मंगलवार रात आठ बजकर पांच मिनट पर अहमदाबाद के सिविल हॉस्पिटल में निधन हो गया। वे करीब साल भर से कैंसर से पीड़ित थे।

उनका अंतिम संस्कार अगले दिन 12 सितम्बर बुधवार को पैतृक निवास स्थान सागवाड़ा में उनके गुरु स्व. गौरीशंकर उपाध्याय की समाधि के समीप किया गया। स्व. कैप्टेन छगनलाल सिंघवी आज हमारे बीच नहीं हैं पर उनके कार्य और व्यक्तित्व की कीर्ति गाथाओं के स्वर युगों तक गूंजते रहेंगे।