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साधना मार्ग अपनाएं और तेजी से आगे बढ़ें

Deepak Acharya
Deepak Acharya
November 6, 2022
साधना मार्ग अपनाएं और तेजी से आगे बढ़ें

केवल साधकों केलिए - जो करना है स्वयं करें

यह तय मानकर चलें किदुनिया का कोईभी दूसरा व्यक्तिहमारी समस्या याअभाव का समाधाननहीं कर सकता।ज्योतिषी भी कुण्डलीया हस्तरेखाओं केमाध्यम से अपनेग्रह-नक्षत्र कीअनुकूलताओं और प्रतिकूलताओंको देख करवर्तमान या भावीस्थिति को व्यक्तकर सकता हैऔर अनिष्टकारी प्रतिकूलसमय के लिएकिसी न किसीउपाय करने कोही कहेगा।

इसमें टोने-टोटकेसे लेकर मंत्रजप और अनुष्ठानकरने की हीसलाह देगा। औरवह करना याकरवाना हमें हीपड़ेगा।

पहले जमाने जैसे सिद्धतपस्वी अब नहींरहे जो किकिसी अन्य कादर्द खुद लेकरसामने वाले कोबीमारी या प्रतिकूलताओंसे मुक्त करदेने में समर्थहुआ करते थे।

फिर आजकल वैसेनैष्ठिक और शुचितापूर्णअनुष्ठानी, संध्यापात्री कर्मकाण्डी पण्डित आदिभी नहीं रहे, जिनकी साधना सेस्पष्ट और सटीकअसरकारी प्रभाव परिलक्षित होताथा।

इस स्थिति में किसीऔर से अपनीसमस्या या शिकायत के समाधानया अभाव दूरकरने की अपेक्षानहीं रखकर जोकुछ करना हैवह स्वयं कोकरना है, इसमूल बात कोसम्पूर्ण जीवन भरसामने रखें। जोकुछ चाहते हैंवह भगवान सेही प्रार्थना करें, वही समस्त मनोकामनाओंको पूर्ण करने, दुःखों का समाधानकरने तथा अभावोंकी पूर्ति करनेमें सक्षम है।अपने अहं कोशून्य के स्तरतक पहुंचा करकी जाने वालीसमर्पित प्रार्थना बड़े सेबड़े अनुष्ठान सेकम नहीं है।

अपने कर्म कोकरते रहें, जीवननिर्वाह की सारीमर्यादाओं को सहजतापूर्वकपूर्ण करते रहें।लेकिन यह भीध्यान रखें किभगवान की साधनासे ही सभीप्रकार की समस्याओंका स्थायी समाधानसंभव है औरवह करनी हमेंही है, कोईऔर इसमें कुछनहीं कर सकता।

इसके लिए पहलेहम यह सोचलें कि कौनसे देवता यादेवी हमें पसन्दहैं। क्योंकि व्यक्तिको वही देवताया देवी पसंदहोते हैं जिनकीउपासना पूर्व जन्म मेंकी हुई होतीहै।

आम तौर परअपने गौत्र, वंशऔर कुल परम्पराके देवी-देवताकी उपासना हीकी जाती रहीहै, क्योंकि हमारेपूर्वजों द्वारा की जातीरही साधना मेंजुड़ जाने सेपरम्परागत ऊर्जा से फ्यूजवायर की तरहतार बंध जाताहै। फिर पूर्वजोंकी साधना कोआगे बढ़ाने सेउनके द्वारा कीगई साधना कीताकत भी हमेंप्राप्त हो जातीहै।

और इससे भीबड़ी बात यहहै कि हमारेपूर्वजों या पितरोंद्वारा की गईसाधना को अपनानेसे उनकी अपनीसंचित दिव्य ऊर्जाका प्रवाह भीहमारी तरफ बिनाकिसी बाधा केहोने लगता हैऔर इससे हमारीपचास फीसदी साधनाबिना किसी अतिरिक्तप्रयास के सफलहोकर प्रभाव दिखानेलगती है।

कई बार होतायह है किहमारे पूर्वज यापितर बहुत अधिकऊर्जावान साधक रहेहोते हैं लेकिनदिवंगत होने केबाद जैसे हीउत्तर क्रिया कीपूर्णता के उपरान्तसंक्रमण काल केसमाप्त होने केसमय यानि कीउनकी मुक्ति यानई योनि ग्र्रहणकरने के समयकाफी कुछ संचितदिव्य ऊर्जा कालाभ उनके साधकवंशजों को आशीर्वादस्वरूप प्राप्त हो सकताहै।

और यह आशीर्वादजीवन की सफलतासे लेकर पीढ़ियोंतक को खुशहालीदेने में अहम्भूमिका निभाता है। इससेआशातीत और आश्चर्यजनकपरिणाम सामने आ सकतेहैं।

इन सभी बातोंका सार यहकि मौलिक रूपसे चिन्तन करतेहुए अपनी पसंदकी या कुलपरम्परा की साधनाको आगे बढ़ानेका अलग हीलाभ होता हैअन्यथा जीवात्मा यदि किसीके कहने परदूसरी कोई साधनाकरता है तोनए सिरे सेशुरू होने वालीसाधना में सफलतापाने के लिएकई जन्मों कासफर तय करनापड़ सकता है।इससे तो अच्छाहै कि उसीसाधना का आश्रयप्राप्त करें जोकि पूर्वजन्म सेकरते आए हैंया कुल परंपरासे होती रहीहै।

वर्तमान की सबसेबड़ी समस्या यहहै कि हमेंजीवन के अंततक भी अनिश्चयबना रहता हैकि आखिर किसदेवी-देवता यासाधना को हमेंकरना चाहिए।

आम इंसान जीवन भरअपनी कामनाओं केहिसाब से देवी-देवताओं और साधनाओंको बदलता रहताहै और कईसारे नासमझ औरमूर्ख तो विधर्मीभूत-प्रेतिया स्थलोंपर जाकर मन्नतपूरी होने केलिए नाक रगड़तेरहते हैं फिरभी जीवन केअंत तक कुछभी हासिल नहींहो पाता औरकिसी क्षण असामयिक-आकस्मिक राम नामसत्य हो जाताहै।

हम लोग ज्योतिषियोंऔर पण्डितों केचक्कर काटते रहतेहैं और हरनया आदमी कोईन कोई नईउपासना या प्रयोग, टोने-टोटके बतातारहता है। जोलोग ये उपायबताते हैं उनमें 90 फीसदी उपाय किसीसे सुने यालिखे हुए होतेहैं, खुद येलोग इनका प्रयोगकभी नहीं करते।और हम जिन्दगीभर पागलों औरआधे पागलों कीतरह भटकते रहतेहैं और अन्ततक भी कुछहासिल नहीं होपाता।

हर छोटे सेछोटे और बड़ेसे बड़े कर्मके लिए कईसारे मंत्र, यंत्रऔर तंत्र हैं।कई जन्मों मेंभी मनुष्य इनकालाभ प्राप्त नहींकर सकता। खूबसारे देवी-देवताओंऔर साधनाओं काआश्रय लेने सेकुछ नहीं होनेवाला।

अभी हो यहरहा है किदस-पांच देवी-देवताओं और ग्रहोंकी पूजा औरएक-दो मालाएंजप कर लियाकरते हैं। इससेकिसी भी एकका पुरश्चरण तकनहीं हो पाताऔर ऐसे मेंएक भी मंत्रकाम में आनेकी स्थिति मेंनहीं होता, सारेनिस्तेज और सोयेपड़े रहते हैं।

साधना के बारेमें सर्वमान्य तथ्ययह है किहम रोजाना जोकुछ न्यूनाधिक साधनाकरते हैं, मंत्रजप, स्तुति यास्तोत्र पाठ करतेरहते हैं, उनकीकम से कमएक बार पुनरावृत्तिसूर्य या चन्द्रग्रहण काल मेंहोनी नितान्त जरूरीहै, तभी इनकाजागरण हो सकताहै, अन्यथा जिन्दगीभर ये मंत्र-स्तोत्र सुप्तावस्था मेंपड़े रहते हैं, इनका कोई असरनहीं होता। हमकेवल टाईमपास हीकर रहे होतेहैं।

यह ठीक ऐसाही है किजैसे जमीन मेंसे पानी निकालनेके लिए पाँच-पाँच फीटके सौ गड्ढेखोद दें परपानी नहीं निकलता।ऐसे में एकही गड्ढा यदिसौ फीट काखोद दिया जाएतो पचास-साठफीट पर हीपानी निकल सकताहै।

यही स्थिति हमारी साधनाकी है। खूबसारे देवी-देवताओंऔर साधनाओं कीबजाय किसी एकदेवी या देवतातथा उसकी सरलतमसाधना का आश्रयप्राप्त कर लेंतो जीवन मेंसब कुछ आसानीसे प्राप्त होनेलगेगा।

दुर्लभ मनुष्य जन्म मुक्तिपाने के लिएहुआ है। लेकिनहम माया केसांसारिक प्रपंचों में ऐसेघिर जाते हैंकि गर्भ केसमय लिए गएसारे संकल्पों कोभूल जाते हैंऔर कामनाओं तथाभोग-विलास केवशीभूत होकर अंततक भटकते रहतेहैं और बादमें कई वर्षों, दशकों और शताब्दियोंतक भटकते हीरहते हैं।

ऐसे में उन्हींदेवी-देवता कीसाधना का सहारालिया जाए जिनकेबारे में ऊपरकहा गया है।ऐसा होने परसाधना से ईश्वरसे संबंध जोड़नेके लिए डोरपक्की जम जातीहै और उसकालाभ प्राप्त होताहै।

जो भी देवताया देवी हमेंपहले नंबर परपसंद हैं उनकाकोई सा छोटामंत्र लेकर रोजानाकम से कम 21 और अधिकतम अपनीसामर्थ्य के अनुसारमालाएं करने कानियम बांध लें।जैसे ही मंत्रजप की संख्याएक लाख सेपार होगी, हमेंउसका लाभ प्राप्तहोना शुरू होजाएगा और सारीसमस्याओं का समाधानएक-एक करहोने लग जाएगा।एक बार साधनाआरंभ कर देनेके बाद अपनेआप रास्ता मिलताचला जाएगा।

वैसे नियम यहहै कि मंत्रतभी सिद्ध होपाता है जबउसके जितने अक्षरहैं उससे सवायेजप पूर्ण निष्कामभाव से करलें। यह पक्कीधारणा बना लेंकि सभी देवी-देवता एक हीपरमात्मा तत्व केस्वरूप हैं औरकिसी भी एककी साधना मेंपूर्णता आ जानेके उपरान्त सभीमें अद्वैत तत्वका दर्शन होताहै। इसलिए किसीको भी अलगनहीं मानें।

मंत्र सिद्धि के लिएचन्द्र या सूर्यग्रहण काल भीलाभकारी है। इसमेंमंत्र जप सेमंत्र के पुरश्चरणके बराबर कीऊर्जा प्राप्त होजाती है औरमंत्र सिद्ध होजाता है। पुरश्चरणके उपरान्त मंत्रका जागरण होनेपर ही वहमंत्र सिद्धि प्रदानकरने में समर्थहो पाता है।

नैष्ठिक साधकों का अनुभवहै कि अपनेईष्ट की कृपाप्राप्त हो जानेपर सभी देवी-देवताओं में भेददृष्टि समाप्त होकर अद्वैतभाव आ जाताहै और कईबार तो किसीएक देवी-देवताके मन्दिर मेंदर्शन करते वक्तदूसरे देवी-देवताका ध्यान औरस्तुति अपने आपजिह्वा पर आजाती है। कईबार आँखों मेंआँसू निकलने लगतेहैं और साधकभावविभोर हो जाताहै। यह सिद्धावस्थाके आरंभिक लक्षणहैं।

इस रहस्य को भीजान लेना चाहिएकि किसी भीएक मंत्र केसिद्ध हो जानेपर दूसरे सारेमंत्र बहुत कमसंख्या में जपकरने मात्र सेही सिद्ध होजाते हैं। इसलिएयह भ्रम हमेशाके लिए निकालदें कि हरमंत्र को सिद्धकरने के लिएसभी के उतनेलाख जप जरूरीहैं जितने उनकेअक्षर हैं।

जीवात्मा के कईजन्मों में भीमूलाधार से लेकरसहस्रार चक्र तकसुषुम्ना नाड़ी मेंढेरों अवरोध बनेरहते हैं। मंत्रसिद्धि से इनअवरोधों का निवारणहोकर मूलाधार सेसहस्रार चक्र तकजो सुषुम्ना नाड़ीहै वह एकदमसाफ हो जातीहै और तबऊर्जा का प्रवाहआसानी से होनेलगता है।

इसे यों समझंेकि कोई पाईपलाईन चॉक होगई है औरपानी का प्रवाहबाधित हो गयाहै। ऐसे मेंया तो हमलम्बी लकड़ी याबाँस घुसाकर आगे-पीछे करेंगे, या पानी अथवाहवा का प्रेशरकरते हुए अवरोधको साफ करेंगे।इसके बाद उसपाईप लाईन मेंकुछ भी डालो, सहज-स्वाभाविक रूपसे आसानी सेप्रवाह होता रहेगा।

ठीक यही स्थितिहमारी सुषुम्ना नाड़ीकी है जोकई जन्मों सेजाम है औरइसे ही साफकरने के लिएसारी धार्मिक एवंयौगिक क्रियाएं, मंत्रानुष्ठानआदि हैं। औरएक बार साफहो जाने परजीवात्मा मुक्तात्मा होने काअनुभव करने लगजाता है। हमेंभी ऐसा हीकरना है।

इसीलिए समझदार साधक अपनेपसंदीदा देवी-देवताका सबसे छोटेसे छोटा मंत्रलेकर इसके लाख-दो लाखजप करते हुएइस पाईप लाईनको साफ करनेकी शुरूआत करतेहैं। जैसे हीइसकी सफाई कीशुरूआत अनुभव होती हैमूलाधार चक्र सेस्पन्दन आरंभ होजाता है। फिरसाधक अपने आपआगे बढ़ता रहताहै।

एक बार छोटेसे मंत्र कोसिद्ध कर लिएजाने के उपरान्तकिसी और मंत्रको सिद्ध करनेके लिए यदिएक लाख जपकी आवश्यकता होतो वह एकसे लेकर दसहजार मात्र तकजप से सिद्धहोने लगता है।इस रहस्य कोसमझने की आवश्यकताहै। फिर हरमनोकामना के लिएअलग-अलग मंत्रजपने के प्रपंचमें नहीं पड़करकिसी एक मंत्रका ही आश्रयग्रहण कर लें, लाखों जप करलें।

इससे संकल्प सिद्धि प्राप्तहो जाएगी औरअपने संकल्प मात्रसे कार्य होनेलगेंगे, चाहे कोईसा काम क्योंन हो। बहुतसारे तंत्र-मंत्रऔर यंत्रों आदिके चक्करों कोछोड़ कर संकल्पसिद्धि का प्रयासकरना ही श्रेयस्करहै। इससे जीवननिर्वाह भी आसानहोगा और भगवत्प्राप्तिभी।

हर व्यक्ति को ईष्टसाधना पर बलदेना चाहिए। ईष्टसाधना बलवती होनेपर दूसरे मंत्रभी अपने लिएक्षमतावान सहयोगी भूमिका मेंआ जाते हैं।हम सभी कालक्ष्य परमात्मा या मुक्तिप्राप्ति है औरऐसे में ईष्टका स्मरण केवलइसी कर्म केलिए करना चाहिए।

ईष्ट से भौतिककामनाओं की मांगन करें, केवलईष्ट को पानेका ही लक्ष्यसामने रखें। अन्यकामनाओं की पूर्तिके लिए किसीन किसी एकपसंदीदा देवता की मामूलीआराधना का क्रमभी बनाए रखेंताकि जीवन निर्वाहआसानी से होसके।

निष्काम साधना के दोप्रत्यक्ष फायदे हैं। जबभी निष्काम भावसे साधना करतेहैं तब भाग्यऔर प्रकृति काजबर्दस्त संघर्ष आरंभ होजाता है। ऐसेमें साधना कीशक्ति से भाग्यसे अधिक प्राप्तहोने में प्रकृतिऔर अन्य दैवीयशक्तियां साधक केमार्ग को रोकनेया भ्रमित करनेके लिए नए-नए प्रलोभनउपस्थित कर हीदेती हैं। इसेसामान्य साधक परीक्षाकी श्रेणी मेंलेते हैं। निष्कामसाधना से पिण्डका आभामण्डल दिव्यताकी ओर आगेबढ़ने लगता हैऔर ऐसे मेंभू लोक स्थितजीवात्मा का आभामण्डलऊर्ध्वगामी होकर अन्तरिक्षके लोकों कीतरफ बढ़ने लगताहै। इस स्थितिमें निष्काम साधनाके बावजूद सांसारिकभोग-विलास उपलब्धहोने की स्थितिआएगी ही आएगी।जबकि मनोकामना पूर्तिके लिए जबकोई साधक साधनाकरता है, मंत्रजप या अनुष्ठानकरता है तबउसका आभामण्डल ऊर्ध्वगामीन होकर पार्श्वगामीहो जाता हैऔर उसका ओरापरिधि बनाता हुआसंचरित होता है।इस स्थिति मेंइच्छित व्यक्ति, वस्तु औरभोग-विलास कर्षणशक्ति से उसकेपास आकर्षित होकरआनंद प्रदान करतेहैं और मनोकामनापूरी हो जातीहै। लेकिन सकामसाधना का सबसेबड़ा खतरा यहहोता है किमनोकामना पूर्ति होते हीउसके द्वारा कीगई संचित साधनाका क्षय होजाता है क्योंकिउस साधना कीशक्ति मनोकामना पूर्तिमें खर्च होजाती है। जबकिनिष्काम साधना का फायदायह है किदृढ़ निष्ठावान बनेरहने पर साधकको ईश्वर साक्षात्कारया मोक्ष प्राप्तहो जाएगा अथवाअपनी साधना कापूरा का पूरासंचित बल सुरक्षितव संरक्षित रहनेके बावजूद सारेभोग-विलास उसकेआस-पास उपलब्धहोंगे ही होंगे।

सामान्य तौर परसाधना के कर्मतीन तरह केहोते हैं - नित्यकर्म, नैमित्तिक कर्मएवं काम्य कर्म।नित्य कर्म मेंरोजाना कली पूजा, संध्या-गायत्री आदि आतेहैं। नैमित्तिक कर्मकिसी व्रत, त्योहार, जयन्ती, पर्व आदिके निमित्त होतेहैं। हम किसीभी देवी-देवताके उपासक होंकिन्तु कोई भीनिमित्त उपस्थित हो तबउनका यजन अवश्यकरें। जैसे रामनवमी, जन्माष्टमी आदि परराम-कृष्ण कीपूजा-उपासना। काम्यकर्म में वेकर्म आते हैंजो हमारी मनोकामनासे संबंधित होतेहैं। इसमें मनोकामनापूर्ति के लिएकिए जाने वालेअनुष्ठान आते हैं।

इनमें नित्यकर्म में पंचदेवउपासना शामिल रहनी चाहिए।इसमें अपना ईष्टप्रधान होता है।द्विजों के लिएनियमित संध्या और गायत्रीनितान्त अनिवार्य नित्य कर्महै। नित्य कर्मकिए बिना जोभी कर्म, अनुष्ठानआदि होते हैंवह सब व्यर्थहैं। नित्य कर्मएक तरह सेअर्थिंग भी हैजो कई खतरोंको अपने मेंसमाहित कर साधकको सुरक्षित रखतीहै। नित्य कर्मके बगैर कोईउपासना फलवती नहीं होती, केवल टाईमपास औरदिखावा ही होकररह जाती है।

वर्तमान समय ढोंगियोंऔर पाखण्डियों काहै। बड़े-बड़ेप्रतिष्ठित माने जानेवाले बाबाओं औरमहंतों से लेकरमामूली कर्मकाण्डी तक धर्मके नाम परधंधों से पैसाऔर प्रतिष्ठा बनानेमें जुटे हुएहैं।

इसे देखते हुए किसीभी बाहरी प्रपंचमें न पड़ें।संसार का कोईभी व्यक्ति, पंडित, साधु या औरकोई भी व्यक्तिअपना कल्याण नहींकर सकता। इसमेंपैसे, समय कीबर्बादी है।

इसी प्रकार किसी भीप्रकार के गण्डेताबीज या मालावाला, रत्न आदिके चक्कर सेबचें। कई बारहम ढोंगियों केचक्कर में आकरमामूली कामनाओं के वशीभूतहोकर विधर्मियों केगण्डे-ताबीज, रत्न, गले या हाथमें धारण करलिया करते हैं, यह अपने ईष्टका अपमान हैऔर ऐसे लोगोंको हमेशा अनिष्टोंऔर राक्षसी सूक्ष्मआत्माओं से दुःखपहंुचने लगता है।

ईश्वर ने अपनेभीतर महान ऊर्जादी है उसकाजागरण करें। कुछन कर सकेंतो आरंभिक तौरपर ऊँ याराम-राम अथवाकिसी भी एकाक्षरीया छोटे सेमंत्र की रोजानाकम से कम 21 माला करें। सूर्य कोअर्घ्य चढ़ाएं। अपने आपकोजागृत करें, सामर्थ्यजगाएं और आगेबढ़ें।

पितरों और गुरुओंकीतस्वीरपूजास्थलपरनरखें

अपने कितने ही प्रियपितर या गुरुहों, उनकी तस्वीरको पूजा स्थलपर न रखें।इससे देवी-देवताकुपित रहते हैं।भगवान और इंसानोंमें जो अन्तरनहीं मानता, वहभगवान की पूजाके काबिल नहींहोता। भगवान उनकीपूजा को कभीनहीं स्वीकारते।

कई गुरु अपनेआपको पूजवाने केलिए पूजा स्थलपर अपनी तस्वीररखवाते हैं, यहअनुचित है। गुरुका काम शिष्यया भक्त कोमार्ग दिखाना हैन कि पूजवानेके लिए प्रेरितकरना।

गुरु के प्रतिश्रद्धा अपनी जगहहै, और उपासनाकी मर्यादा अपनीजगह। दोनों मेंघालमेल न करें।इसी प्रकार पितरोंकी तस्वीर कोभगवान के समानान्तररखना भी निषिद्धहै। जो गुरुअपने आपको भगवानके बराबर मानतेहैं, वे गुरुहो ही नहींसकते। इसी प्रकारसांई या अन्यकी तस्वीर, मूर्तिया इनसे संबंधितकुछ भी अपनेपास नहीं रखें।इससे अनिष्ट हीहोगा।