जयन्ती पर विशेष - स्मृति शेष वागड़ विभूति प्रोफेसर डॉ. एल.डी. जोशी


स्वतंत्रता चेतना के पुरोधा व शिक्षा, संस्कृति और साहित्य धाराओं के संवाहक भगीरथ
वागड़ का इतिहास कई गौरवशाली शखि़्सयतों से भरा पड़ा है जिन्होंने अपने कर्मयोग को ऊँचाइयाँ दी और वागड़ का गौरव दिग-दिगन्त तक फैलाते हुए अपने व्यक्तित्व की अविस्मरणीय-अमिट छाप छोड़ी। समूचा वाग्वरांचल अपने इन रत्नों की सेवाओं के प्रति कृतज्ञ है।
इन्हीं में अग्रिम पंक्ति के हस्ताक्षर हैं - वागड़ विभूति प्रोफेसर डॉ. लालशंकर डी. जोशी, जिन्हें पुरानी पीढ़ी लाला भाई और नई पीढ़ी डॉ. एल.डी. जोशी के नाम से जानती है।
वागड़ की मौलिक संस्कृति, इसकी परम्पराएं और यहाँ की सुरभि से देशवासियों को परिचित कराने में डॉ. जोशी का योगदान सर्वोपरि रहा है। शिक्षा, कला-संस्कृति, इतिहास, शोध, रंगमंच, लेखन-प्रकाशन से लेकर तमाम माध्यमों का उपयोग उन्होंने वागड़ की सेवा और इसके गौरव की अभिवृद्धि के लिए किया।
वागड़ी पर शोध करने वाले सर्वप्रथम विद्वान
लाखों वागड़वासियों की अपनी प्रिय वागड़ी बोली पर शोध करने वाले वे देश के पहले मनीषी हैं। उनके सद्प्रयासों व मातृभूमि के प्रति समर्पण का ही परिणाम है कि देश में वागड़ी के वैज्ञानिक रूप का दर्शन हुआ और वागड़ी संस्कृति के विभिन्न पक्ष पहली बार दुनिया के सामने आए।
वे जहाँ भी रहे अपनी मातृभूमि की सेवा का भाव सबसे ऊपर रखा। उनका ज्यादातर समय गुजरात में ही बीता है लेकिन वहां भी उन्होंने वागड़ की संस्कृति और परिवेश से लेकर हर पहलू पर व्यापक शोध एवं गहन चिन्तन करते हएु खूब लिखा और प्रकाशन हुआ। जीवन भर उन्होंने संघर्ष किया और ढेरों चुनौतियों का सामना करते हुए उन पर विजय पायी तथा व्यक्तित्व का विकास किया। उन्होंने जो कुछ उपलब्धियां हासिल की, वे स्वयं के बूते। न उनका कोई गॉड फादर रहा, न उन्हें इसकी कभी तलाश रही।
डॉ. जोशी का जन्म 10 जनवरी 1928 को डूंगरपुर जिले की सागवाड़ा तहसील के छोटे से गांव वमासा में श्री डूंगरजी जोशी के घर हुआ। आरंभिक शिक्षा-दीक्षा अपने अंचल में ही प्राप्त करने के बाद उन्होंने राजपूताना यूनिवर्सिटी, जयपुर से सन् 1949 में द्वितीय श्रेणी में मैट्रिक पास की। इण्टरमीडिएट (आर्ट्स) 1952 में एलफिन्स्टन कॉलेज, बम्बई यूनिवर्सिटी से, बी.ए.(ऑनर्स)द्वितीय श्रेणी 1954 सेंट जेवियर्स कॉलेज, बम्बई यूनिवर्सिटी से तथा एम.ए. (ऑनर्स) द्वितीय श्रेणी 1956 सेंट जेवियर्स कॉलेज, बम्बई यूनिवर्सिटी से की। सन् 1965 में जोशी ने गुजरात यूनिवर्सिटी, अहमदाबाद से वागड़ी बोली में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की।
शिक्षा-दीक्षा में सदैव अव्वल
अपने विद्यार्थी जीवन से ही विभिन्न सह शैक्षिक प्रवृत्तियों में अव्वल रहे जोशी ने विभिन्न प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया और कई पुरस्कार हासिल किए। उन्होंने 1953-54 में हिन्दी साहित्य मण्डल मेरिट स्कॉलरशिप, 1955-56 में सेंट जेवियर्स कॉलेज, बम्बई यूनिवर्सिटी में मेरिट फैलोशिप तथा सन् 1963 में वागड़ लोक संस्कृति पर आधारित श्रेष्ठ शोध पत्र के लिए, गुजरात रिसर्च सोसायटी(खार) बम्बई द्वारा उन्हें मेडल प्रदान कर सम्मानित किया गया। बम्बई विश्वविद्यालय में 1950 से 1952 तक उन्होंने अंतर महाविद्यालयी निबंध व कहानी प्रतिस्पर्धा में प्रथम पुरस्कार, भारतेन्दु शताब्दी महोत्सव (बम्बई 1950) के अन्तर्गत आयोजित अंतर महाविद्यालयी वक्तृत्व प्रतिस्पर्धा में द्वितीय पुरस्कार हासिल किया। सन् 1950-52 में एनसीसी के अन्तर्गत प्रथम बोम्बे बटालियन ए-कंपनी में भागीदारी के लिए प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया।
प्रेरणादायी आदर्श शिक्षकीय जीवन
डॉ. जोशी ने अपनी मेहनत और प्रतिभा के बल पर शैक्षिक उपलब्धियों का शिखर पाने के बाद उच्च शिक्षा को आजीविका का जरिया बनाया। एल.एम.सी.पी., एल.डी. आर्ट्स कॉलेज में 1956-60 में व्याख्याता(हिन्दी) तथा एम.जी. साइन्स कॉलेज, अहमदाबाद में अध्यापन कराया। 1960 से 88 तक आर्ट्स कॉलेज, मोड़ासा में प्राध्यापक(हिन्दी) के पद पर कार्य करते हुए सन् 1980-82 तक इसी कॉलेज में प्राचार्य के रूप में सेवाएं दीं। वे ईडर आर्ट्स कॉलेज में स्नातकोत्तर कक्षाओं के अध्यापन तथा सन् 1963 से लेकर 1988 तक गुजरात यूनिवर्सिटी, अहमदाबाद पी.जी. टीचर के रूप में सेवाएं भी दीं।
लोक संस्कृति अन्वेषण में सिद्ध
गहन शोध, चिन्तन एवं मनन के प्रति खासी रुचि रखने वाले डॉ. एल.डी. जोशी ने अपने अध्ययन को आजीविका या स्वयं के स्वार्थ तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर कइयों को शोध कराते हुए पीएच.डी. मार्गदर्शक के रूप में डॉक्टरेट करायी। सन् 1971 से सन् 1988 तक वे गुजरात यूनिवर्सिटी, अहमदाबाद के पीएच.डी. परीक्षक-मार्गदर्शक रहे।
संत मावजी पर गहरा अध्ययन
उन्होंने ‘गुजराती और हिन्दी राष्ट्रीय कविता का तुलनात्मक अध्ययन’ विषय पर एस.पी. शर्मा, ‘मावजी ः व्यक्तित्व और कृतित्व’ विषय पर सुन्दरलाल शर्मा, ‘संत दुर्लभरामजी और संत मावजी का तुलनात्मक अध्ययन’ विषय पर नवीनचन्द्र याज्ञिक तथा ‘हिन्दी काव्य को बच्चन की देन’ विषय पर बालमुकुन्द जोशी को पीएच.डी. करायी। इस शोध कार्य में भी उनका वागड़ प्रेम हावी रहा है। डॉ. जोशी प्री यूनिवर्सिटी से पीएच.डी. तक गुजरात यूनिवर्सिटी, नॉर्थ गुजरात यूनिवर्सिटी एवं सौराष्ट्र यूनिवर्सिटी के परीक्षक रहे।
अलौकिक लीलावतार मावजी महाराज, उनकी परंपराओं तथा ग्रंथों का उन्होंने गहरा अध्ययन किया और अपने शोधार्थियों के माध्यम से इन्हें दुनिया के सम्मुख प्रकाश में लाए। वागड़ी गीतों, मुहावरों एवं कहावतों का उन्होंने खूब संग्रह किया और इन्हें जन मानस तक पहुंचाते हुए वागड़ी साहित्य की विलक्षणओं से साक्षात कराया।
वागड़ को अनुपम देन
वागड़ की संस्कृति और साहित्य पर उनकी अनेक पुस्तकें निकली हैं। उनकी पुस्तकों में ‘वागड़ी बोली का स्वरूप और उसका तुलनात्मक अध्ययन’ तथा गुजरात राज्य लोक साहित्य समिति द्वारा गुजराती में प्रकाशित ‘वागड़ी लोकगीत’(1976) तथा ‘गलालेंग’ वीरगाथा(1985) प्रमुख है। उनकी पुस्तकें हरिदेव जोशी ः संस्मरण, ‘वागड़ी लोक गीत’,‘गलालेंग’, वागड़ी शब्दकोष, लोक साहित्य, वागड़ी बोली, संत माव साहित्य तथा ‘अस्मिता’ लेख संग्रह आदि प्रमुख हैं।
वागड़ी, गुजराती, हिन्दी, मेवाड़ी आदि भाषाओं में उन्होंने कई स्मारिकाओं, पुस्तकों एवं संग्रहों का संपादन किया है। इनमें वागड़ी लोक गीत (300), वागड़ी कहावतें एवं मुहावरे (1500), वागड़ की पहेलियाँ (शताधिक), वागड़ की लोक कथाएं/वार्ताएं/भजन आदि (शताधिक), लोकेतिहासिक कथा काव्य (दर्जनाधिक) हैं। इसी प्रकार वागड़ी, गुजराती, मेवाड़ी एवं हिन्दी में 10 हजार शब्दों का अनूठा कोष निर्माण किया है। यह अपने आप में अद्भुत कार्य है।
अनवरत सृजन के पर्याय
निरन्तर चिन्तन मनन और सृजन के पर्याय रहे डॉ. लालशंकर डी. जोशी आकाशवाणी और दूरदर्शन पर अनेक अवसरों पर अपनी प्रतिभा और उपलब्धियों का दिग्दर्शन करा चुके हैं। आकाशवाणी के उदयपुर, राजकोट आदि केन्द्रों तथा दूरदर्शन केन्द्र अहमदाबाद से उनकी साहित्यिक/शैक्षिक वार्ताओं, कहानियों, कविताओं, गीतों आदि का समय-समय पर प्रसारण हुआ है तथा इन माध्यमों में आयोजित विभिन्न गोष्ठियों का आपने संचालन किया है।
राजस्थान, गुजरात तथा देश के विभिन्न हिस्सों में डॉ. जोशी ने विभिन्न प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर के आयोजनों में अतिथि, वक्ता या संभागी के रूप में अपनी धाक जमाकर सभी को अभिभूत किया। उनके द्वारा लोक साहित्य, वागड़ी बोली सहित लोकजीवन एवं साहित्य के विविध पक्षों पर आधारित सेमीनारों में शोधात्मक पत्रवाचन किया गया है।
डॉ. जोशी ने एस.आई.ई.आर.टी. उदयपुर, राजस्थान विद्यापीठ उदयपुर, राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, जयपुर गुजरात इतिहास परिषद की विविध गतिविधियों में संभागीत्व किया है। इसी प्रकार आल इण्डिया म्यूजियम्स कान्फ्रेन्स(बड़ौदाः 26-29 दिसम्बर 1981) में ‘मोड़ासा कॉलेज म्यूजियम में संग्रहित प्राच्य सिक्कों के महत्व’ विषय पर आपका पत्रवाचन खूब सराहा गया है।
आतिथ्य और संभागीत्व का पार नहीं
इनके अलावा राष्ट्रीय सेवा योजना सांस्कृतिक शिविरों, भीलूड़ा में उद्बोधन, हिम्मतनगर नेहरू युवा केन्द्र पर्यावरण सप्ताह उद्घाटन, कोहशिप योजना(गुजरात यूनिवर्सिटी) के अन्तर्गत अम्ब्रेली कॉलेज, बी.एड कॉलेज डूंगरपुर में व्याख्यान, अखिल भारतीय लोक साहित्य सम्मेलन, बम्बई में वागड़ी लोक गीतों पर पत्रवाचन, गुजरात संशोधक मण्डल में ‘वागड़ नूं जनजीवन’ पर पत्रवाचन आदि अनेक आयोजनों में शिरकत कर चुके हैं। वे सहस्राधिक सम्मेलनों, कवि सम्मेलनों, वार्षिक उत्सवों, समारोहों, गोष्ठियों में आतिथ्य एवं उद्घाटन कर चुके हैं।
क्रान्तिचेता लाला भाई
लाला भाई विद्यार्थीकाल से ही क्रांतिकारी विचारों के रहे हैं और इस वजह से विभिन्न आन्दोलनों, संगठनों आदि में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सन् 1952 से 1956 तक वे बम्बई हिन्दी विद्यार्थी मण्डल, बम्बई हिन्दी लेखक संघ तथा बम्बई-राजस्थानी विद्यार्थी संघ के मंत्री पद को सुशोभित कर चुके हैं।
लोक साहित्य संशोधक एवं शोधमर्मज्ञ के रूप में डॉ. जोशी देश भर में अपनी अहम् पहचान रखते हैं। उनके अंग्रेजी, हिन्दी एवं गुजराती में 225 शोध निबंध प्रकाशित हो चुके हैं। इसके साथ ही वागड़ी बोली, वागड़ी लोक साहित्य, इतिहास, संस्कृति, पुरा सम्पदा पर बहुआयामी शोध एवं संग्रह करने के साथ ही इनके संशोधक रहे हैं।
उनके द्वारा मोड़ासा आर्ट्स कॉलेज परिसर में पुरा सम्पदाओं के म्यूजियम की स्थापना की गई। डॉ. जोशी देश के ऎसे पहले विद्धान हैं जिन्होंने गहन शोध एवं क्षेत्र भ्रमण के बाद यह रहस्योद्घाटन किया है कि वागड़ में आदि मानव की मौजूदगी रही है।
प्रखर स्वाधीनता सेनानी
स्वाधीनता संग्राम में डॉ. लालशंकर जोशी की अग्रणी भूमिका रही है। वे सन् 1942 से 1949 तक डूंगरपुर में राज्य विद्यार्थी कांग्रेस के अध्यक्ष तथा राजपूताना प्रान्तीय विद्यार्थी कांग्रेस में कार्यकारिणी सदस्य रहे हैं। उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन की अलख जगाने प्रभातफेरियों, संघर्ष जुलूसों, धरनों, छात्र आन्दोलनों आदि के आयोजन तथा अन्य महत्वपूर्ण गतिविधियों में बतौर स्वतंत्रता सेनानी सक्रिय सहभागिता निभायी है। स्वतंत्रता संघर्ष में उनके कई-कई साथियों को राज्य एवं केन्द्र सरकार ने स्वतंत्रता सेनानी के रूप में मान्यता दे रखी है लेकिन डॉ. जोशी इससे वंचित रहे हैं। इसका मलाल उन्हें जीवन के अंत तक रहा। बड़े-बड़े स्वाधीनता सेनानी और नेता ओजस्वी वक्ता डॉ. जोशी के धारदार भाषणों और वक्तृत्व कला के कायल थे।
शिक्षा, भाषा, संस्कृति, साहित्य आदि तमाम विषयों के आधिकारिक विद्वान डॉ. जोशी विभिन्न राज्यस्तरीय समितियों में बतौर प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। इनमें उच्च माध्यमिक निरीक्षण पेनल ः साबरकांठा एवं पंचमहाल (1980-88), गुजरात राज्य लोक साहित्य समिति(1975-80), गुजरात राज्य दफ्तर भण्डार ः अहमदाबाद, गुजरात यूनिवर्सिटी हिन्दी बोर्ड, राजस्थानी भाषा साहित्य समिति, जयपुर (1995), उत्तर गुजरात यूनिवर्सिटी - हिन्दी बोर्ड एवं अकादमिक कौन्सिल, उच्च माध्यमिक हिन्दी पाठ्यक्रम समिति, गुजरात राज्य (1984-85) तथा उच्चतर माध्यमिक अभ्यास समिति, गुजरात राज्य (1988-89) उल्लेखनीय हैं।
नामवर विद्वान डॉ. एल. डी. जोशी उत्तर गुजरात यूनिवर्सिटी - हिन्दी बोर्ड प्रथम के वर्ष 1988 में अध्यक्ष तथा गुजरात राज्य दफ्तर भण्डार ः साबरकांठा में उप संचालन समिति( 1987-89) में अध्यक्ष पद को सुशोभित कर चुके हैं। कई संस्थानों ने उन्हें अपना आजीवन सदस्य बनाया है। इनमें गुजरात इतिहास परिषद्, पथिक ‘त्रैमासिक शोध पत्रिका’, भगवतामृतम् तथा भट्टमेवाड़ा समाज शामिल है।
उनकी विद्वत्ता, संगठनों व समाज के प्रति सक्रिय योगदान और उल्लेखनीय-उत्कृष्ट सेवाओं के लिए शताधिक समारोहों में उनका अभिनन्दन व सम्मान किया जा चुका है। हिन्दी प्राध्यापक परिषद्, दहेगांव सम्मेलन (31 दिसम्बर 1988), राजस्थानी महोत्सव, जयपुर (30 जून 1991), राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ, डूंगरपुर सम्मेलन( 13 अगस्त 1983), राजस्थान कर्मचारी संघ, बांसवाड़ा, महंत रघुनंदनदास बी.एड. कॉलेज डूंगरपुर( दिसम्बर 1986), गुजरात संशोधन मण्डल, बम्बई (अक्टूबर 1963) द्वारा किए गए अभिनन्दन प्रमुख हैं।
वक्तृत्व कला और विद्वत्ता का समन्वय
डॉ. जोशी का परिचय प्रतिष्ठित संदर्भ कोषों एशियन राइटर्स, जागती जोत, जोधपुर तथा नवभारत टाइम्स, बम्बई(1954) में प्रमुखता से प्रकाशित हो चुका है। जीवन का उत्तरार्ध अहमदाबाद में व्यतीत करते हुए भी डॉ. जोशी ने सृजन, चिन्तन और मनन कभी नहीं छोड़ा। कुछ समय से वार्धक्यजन्य बीमारियों के चलते 92 वर्ष की आयु में हाल ही 17 मई 2021 को उनका अहमदाबाद में निधन हो गया।
भावभीनी श्रद्धान्जलि
प्रोफेसर डॉ. जोशी ने वागड़ अंचल के लिए पूरा जीवन समर्पित कर दिया। लोक संस्कृति मर्मज्ञ एवं अन्वेषक के रूप में उन्होंने वागड़ में कला, साहित्य और संस्कृतिजगत की जो सेवा की है, वह अमूल्य है तथा आने वाली पीढ़ियों को लाभान्वित करती रहेगी। कृतज्ञ वागड़ अंचल की ओर से उनके प्रति भावभीनी श्रद्धान्जलि।
कृतज्ञ वागड़ आज 10 जनवरी 2022 को स्व. लालशंकर डी. जोशी की जयन्ती मना रहा है।
