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साहित्य
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पुण्य तिथि पर विशेष - ताजिन्दगी करते रहे वागड़ का गौरवगान

Deepak Acharya
Deepak Acharya
May 17, 2022
पुण्य तिथि पर विशेष - ताजिन्दगी करते रहे वागड़ का गौरवगान

वागड़ के लाल - लाला भाई

वाग्वर अंचल के जिन चुनिन्दा व्यक्तित्वों पर गर्व किया जा सकता है उनमें शामिल हैं अजीम शख्सियत लालशंकर जोशी, जिन्हें उनके समकालीन मित्र और आत्मीयजन लाला भाई कहकर स्नेह और सामीप्य का आनंद पाया करते थे।

ऎसी महान विभूति के रूप में विख्यात डॉ. लालशंकर डी. जोशी मूलतः डूंगरपुर जिले के वमासा गांव के रहने वाले थे लेकिन इस छोटे से गांव से निकलकर राजस्थान और गुजरात के महानगरों से लेकर कोने-कोने तक उन्होंने अपने ज्ञान, प्रखर बौद्धिक अन्वेषण और अनुभवों के सागर का परिचय कराते हुए वागड़ का गौरव बढ़ाया।

शिक्षकीय जीवन को आजीविका का माध्यम बनाने वाले डॉ. जोशी शिक्षकीय परिसरों तक सीमित नहीं रहे बल्कि अपनी बहुआयामी प्रतिभाओं का हर कहीं लोहा मनवाया। स्वतंत्रता संग्राम के दौर में उन्होंने बड़े-बड़े स्वाधीनता सेनानियों और लोकनायकों के साथ रहकर स्वाधीनता आन्दोलन के विभिन्न आयामों में अपनी सहभागिता अदा की और सक्रिय रहे। यह दिगर बात है कि कई कारणों से स्वतंत्रता सेनानियों को मिलने वाले लाभों से वंचित ही रहे।

राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी के अभिन्न मित्र होने के बावजूद स्वाभिमानी व्यक्तित्व के धनी और अग्निधर्मा स्वभाव से भरपूर लाला भाई ने कभी इस दिशा में पहल नहीं की। समकालीन स्वाधीनता सेनानियों से उनका जीवन्त सम्पर्क स्वतंत्रता आन्दोलन के बाद के कई वर्षों तक रहा।

सत्य के प्रति समर्पित डॉ. एल.डी. जोशी अपनी बात को सीधी-सटीक और प्रखरता से रखने के लिए जाने जाते थे। आज के तथाकथित विद्वानों की तरह लल्लो-चप्पो, चापलुसी और झूठी बातें करने वालों से उन्हें सख्त नफरत थी। ऎसे लोग उनके करीब आने से भी भय खाते थे। यही कारण था कि खुदगर्ज लोग उनके बारे में यह स्पष्ट धारणा रखते थे कि डॉ. जोशी जैसे स्वाभिमानी, आत्म सम्मान के रक्षक और सीधी सपाट बयानी करने वाले लोग बिरले ही होते हैं।

शिक्षा-दीक्षा से लेकर राजनीति, स्वाधीनता संग्राम, इतिहास और पुरातत्व, लोक संस्कृति मर्मज्ञ एवं शोधक के रूप में उनकी उत्तर भारत में खास पहचान रही। ऎतिहासिक एवं पुरातात्विक विषयों पर खोज, अध्ययन एवं अनुसंधान की उनकी प्रवृत्ति और समर्पण की तारीफ संस्कृतिकर्मी, शोध विशेषज्ञ एवं इतिहासकार हमेशा करते रहे।

अपनी साफगोई के कारण मशहूर डॉ. जोशी का भीतरी-बाहरी व्यवहार एक जैसा होता था। इसमें न कोई दुराव था न मिलावट। इंसान के मूल्यांकन की अपरिमित क्षमता और मन की थाह पा लेने की अलौकिक दिव्य शक्ति का ही परिणाम था कि उनके सम्पर्क में आने वालों को वे हर बात स्पष्ट कह दिया करते।

वागड़ के लोक साहित्य और संस्कृति, परंपराओं के अनुरक्षण एवं प्रचार-प्रसार के साथ ही नई पीढ़ी तक इस विलक्षण ज्ञान को पहुंचाने के लिए उनके मन में कसक जीवन के अंतिम क्षणों तक बनी रही।

उन्होंने इन विषयों पर कई सारे शोधार्थियों को डॉक्टरेट करवाई किन्तु वे इसी से सन्तुष्ट नहीं थे। वे चाहते थे कि वागड़ का साहित्य और संस्कृति का अपार भण्डार देश-विदेश के शोधार्थियों की नज़रों में आए ताकि इसके गर्व और गौरव को दुनिया भी देख सके। डॉ. जोशी ने वागड़ पर जितना शोध-अध्ययन किया, जितना लिखा, उतना शायद ही कोई लिख पाए। छोटे से कागज के टुकड़े पर महीन अक्षरों में सम्पूर्ण वृतान्त लिखना उन्हीं के बस में था। ऎसा कोई दूसरा व्यक्तित्व देखने में नहीं आया।

डॉ. लालशंकर जोशी आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनका संदेश हमारे सामने रह -रहकर गूंज रहा है। वागड़वासियों का दायित्व है कि डॉ. एल.डी. जोशी के स्वप्नों को साकार करते हुए मातृभूमि के महिमा गान में अपना भी हिस्सा बंटाएं और आने वाली पीढ़ियों तक वागड़ की अनुपम संस्कृति, परम्पराओं और लोक साहित्य की महक संवहित करें।

वागड़ विभूति डॉ. लालशंकर डी. जोशी जी की पुण्य तिथि पर समस्त वागड़वासियों की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि....