अपने-अपने फादर-मदर, आज ये, कल और कोई


आजकल फादर (पिता) होने का अर्थ उसी महान इंसान से नहीं रह गया है जिसकी वजह से हम संसार में आए हैं। भीड़ में खूब सारे चेहरे ऐसे नज़र आने लगे हैं जो औरों को पिता का दर्जा देकर खुश हो जाते हैं। यह अलग बात है कि इन आयातित पिताओं को ‘गॉड फादर’ कहा जाता है।
अपने माता-पिता को गौण और हीन मानकर जो लोग बहुत सारे माता-पिता बनाते रहकर अपने काम निकलवाते रहते है ऐसे लोगों की परंपरा उनकी संतति में भी स्वतः स्थानान्तरित हो ही जाती है।
आज का इंसान पिता-माता सब को भुला भी सकता है, नए बना सकता है और मौका आने पर कितनी ही बार बदल भी सकता है।
इन लोगों के लिए अपने जन्मदाताओं की बजाय जिन्दगी भर का बोध वाक्य ‘पितु मातु मय सब जग जानी’ ही बना रहता है। बोलो अपने-अपने मात-पिता की जय।
खूब सारे हैं जिनके लिए उनके आका ही माता-पिता, बंधु, सखा इत्यादि सब कुछ हैं। ख़ासकर राजनीति के पोखरों से लेकर झीलों तक में नवप्रसूतों से लेकर स्थापित नेताओं तक की हालत ये है कि अपने तुच्छ स्वार्थों, मामूली पदों और प्रतिष्ठा, कोई न कोई दर्जा पाने, मनचाहे स्थान पर बने रहने, मनमाने काम करते रहने और इच्छा के अनुरूप स्थानों पर तबादले चाहने वाले, अपने अहं को तुष्ट करने, अपराधों की सजा से भयग्रस्त और खान-पान से लेकर सारे भोग-विलास आदि सब कुछ मुफ्त में पाते हुए मौज उड़ाने वाले छुटभैयों, पुरुषार्थहीनों के लिए तो इनके जैसे आका ही सब कुछ होते हैं।
एक बार जो बाहर वालों को माता-पिता, भाई-बंधु मान लेता है, मुफ्तखोरी की आदत पाल लेता है, बिना परिश्रम के धन-वैभव और विलासिता पाने के रास्ते तलाश लेता है उसके लिए कोई भी संस्कार परिपालन के योग्य नहीं रह जाता।
ऐसे लोग अपने माता-पिता, बंधु-बांधवों आदि की आत्मीय संबंधों की परिधि से मुक्त होकर सार्वजनीन, सर्वदास हो जाते हैं। घर वाले तक इन्हें पसन्द नहीं करते।
ये भले ही लोकप्रियता और लोकमान्यता के भ्रमों में जीते रहें, लेकिन समझदार लोगों को इन अंधानुचरों और मूर्ख दासों का वह भविष्य पता होता है जिसमें ‘पुनर्मूषको भवेत’ तथा ’न घर के न घाट के’ वाली कहावतें कालान्तर में सिद्ध हो जाती हैं।
ऐसे आत्ममुग्ध लोगों के लिए क्या माता, और क्या पिता। इनके लिए वह हर इंसान उनके लिए माता-पिता और दादा-दादी से भी बढ़कर है जो उनके लिए दया, करुणा और अनुकंपा दिखाता रहता है।
यह दासत्व और हरामखोरी भाव खत्म हो जाने पर नए-नए माता-पिता की तलाशी और चरणवन्दना से लेकर चापलूसी और महिमागान करते हुए परिक्रमा करते रहते हैं।
इनकी निष्ठा और समर्पण का कोई जवाब नहीं। मरणोपरान्त भी ये इन्हीं आकाओं के साथ भूत-प्रेतों और पिशाचों की सेवा में जुट जाते हैं।
यही कारण है कि आजकल किसम-किसम के भूत-प्रेतों और पिशाचों की अजीबोगरीब हरकतें देखने में आ रही हैं। इनसे भौंपें और तांत्रिक भी परेशान हैं कि आखिर इन आत्माओं को हो क्या गया है।
धन्य हैं वे लोग जो अपने हर आका और आकी में अपने माता-पिता और पितर देखते हैं। सच्चे अर्थों में इनसे बढ़कर सेकुलर पूरे ब्रह्माण्ड में कोई हो ही नहीं सकता।
