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संस्मरण : ऎतिहासिक विभूति श्री महेश पुरोहित - कभी भुला न पाएंगे

Deepak Acharya
Deepak Acharya
May 15, 2021
संस्मरण : ऎतिहासिक विभूति श्री महेश पुरोहित -  कभी भुला न पाएंगे

वागड़ वसुन्धरा रत्नों की खान रही है। इन्हीं में एक रत्न थे श्री महेश पुरोहित। उनका नाम ही काफी है उनके व्यक्तित्व और कर्मयोग की पहचान को। उन्हाेंने जिस समर्पण और निष्ठा एक ऋषि की तरह जो तपस्या की है उसका फल वागड़ अंचल सदियों तक प्राप्त करता रहेगा।

हमेशा यह लगता है कि ऎसे लोग नहीं रहेंगे, तब क्या होगा, बहुत बड़ा रिक्त स्थान बन जाएगा, जिसकी पूर्ति शायद ही कोई कर सके। हुआ भी ऎसा ही। ऎसे ही स्वर्णिम एवं बहुआयामी व्यक्तित्व तथा सुगंधित कर्मयोग के धनी थे श्री महेश पुरोहित, जो संसार को छोड़ कर गोलोक धाम सिधार गए। हम सभी को भीतर तक यही महसूस होता है कि उनका चले जाना वागड़ अंचल के लिए शुभ नहीं कहा जा सकता।

गहन परिश्रम का परिणाम, वागड़ को अवदान

दूरस्थ एवं पिछड़ा हुआ क्षेत्र होने से वागड़ क्षेत्र के इतिहास के बारे में पहले से ही काफी कम जागरुकता एवं जानकारी जुटाने की दृष्टि से स्थितियां जटिल रही हैं। ऎसे में इस इतिहास को खोजना और इससे संबंधित शिलालेखों, पाण्डुलिपियों और प्राचीन ग्रंथों आदि दस्तावेजों व जानकारी की तलाश करना अपने आप में दुरुह कार्य रहा है।

इन विषम हालातों में इतिहास के झरोखों की ओर देखना भी कठिनाइयों से भरा था। इस स्थिति में आम जन से लेकर रियासत से संबंधित परम्पराओं से जुड़े व्यक्तित्वों के सान्निध्य सम्पर्क में रहकर उन्होंने वागड़ को बहुत कुछ दिया है।

गंभीर चुनौतियों भरा होता है इतिहास लेखन

इतिहास लेखन न केवल अपने आप में चुनौतियों से भरा रहा है बल्कि यह दुधारी तलवार होता है। चाहे वह प्राचीन रियासतों के वक्त का हो या फिर आधुनिक परिप्रेक्ष्य में। इतिहास में प्रामाणिकता सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। इतिहास वही कालजयी होता है जिसमें सत्य और प्रामाणिकता का पुट गहरे तक संलिप्त हो अन्यथा प्रामाणिकता के अभाव में इतिहास कुछ वर्ष बाद मिट जाया करता है।

अन्यथा कहा तो यह भी जाता है कि प्राचीनकाल में राजा-महाराजा प्रबुद्धजनों से अपना मनमाफिक और महिमा मण्डन करने वाला इतिहास लिखवाया करते थे लेकिन इनका प्रभाव कुछ समय के बाद क्षीण होता भी देखा गया है। उन्होंने वागड़ के इतिहास को आधुनिक दृष्टि के साथ संयोजित कर हमारे सामने रखा है।

सत्य और प्रामाणिकता पर शत-प्रतिशत फोकस

श्री महेश पुरोहित जी की विशेषता थी कि उन्होंने तमाम पूर्वाग्रहों-दुराग्रहों से परे रहकर सच्चाई और प्रमाणों के आधार पर इतिहास का दिग्दर्शन कराया। पूर्वाग्रहों से मुक्त और शत-प्रतिशत प्रामाणिकता के प्रति वे ताजिन्दगी वचनबद्ध रहे।

उनके धैर्य की जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है क्योंकि अपने कर्म से संबंधित किसी भी प्रकार के प्रकाशन की आतुरता उनमें कभी नहीं रही। पूर्णता के बाद ही उन्होंने अपने निष्कर्ष को सार्वजनीन किया।

श्री महेश पुरोहित जी का इतिहास लेखन और इससे जुड़ा कर्मयोग हमेशा याद रहेगा क्योंकि ऎसे ही इतिहासकार यशस्वी और कालजयी प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं। समय के साथ भी, और समय के बाद अमर रहने वाले व्यक्तित्व हैं। मशहूर इतिहासकार ओझा जी के बाद वागड़ के इतिहास को खंगालने वाले श्री पुरोहित पहले इतिहासविद् थे जिन्होंने दिन-रात परिश्रम किया और कई नवीन तथ्यों से साक्षात कराया।

मुग्धकारी व्यक्तित्व

श्री महेश पुरोहित जी से मेरा परिचय डूंगरपुर कार्यकाल के दौरान हुआ, जब सन् 1997 से लेकर 2004 तक विभिन्न अवसरों और कार्यक्रमों के अलावा डूंगरपुर एवं बांसवाड़ा के इतिहास, परम्पराओं, लोक संस्कृति और इससे जुड़े कई विषयों पर घण्टों चर्चाएं हुई और हर बार नई से नई और प्रामाणिक जानकारी मिली।

मेरे छोटे से अनुरोध पर उन्होंने डूंगरपुर जिला दर्शन के लिए डूंगरपुर की सम्पूर्ण पृष्ठभूमि पर सारगर्भित और प्रामाणिक लेख दिया, जिसे उनके नाम के साथ प्रकाशित किया गया। इस लेख ने काफी जिज्ञासाओं को शान्त करते हुए गिरिपुर के गौरव और गरिमा से परिचित कराया।

रचनात्मक गतिविधियों से गहरा जुड़ाव

इसी प्रकार जब-जब भी कोई उनकी तपस्या के दौरान ऎतिहासिक और सांस्कृतिक विषयों पर जो कुछ भी नई जानकारी सामने आती, वे अपने हाथ से लिखकर सीधे ही मुझे भेज देते समाचार के लिए।

उनकी हैण्डराईटिंग भी सुपाठ्य होने के साथ-साथ मोतियों की लड़ी की तरह आकर्षक भी थी। सन् 1997 में डूंगरपुर में ड्यूटी जोईन करते ही 1-2 दिन में ही मेरा पहला बड़ा कार्यक्रम था वागड़ महोत्सव, और डूंगरपुर में पहली बार वागड़ महोत्सव की शुरूआत के पीछे श्री महेश पुरोहित का सशक्त प्रयास था।

पूर्णता तक गहन अध्ययन

तमाम सम सामयिक वितण्डों और हथकण्डों से दूर श्री महेश पुरोहित शालीनता और गांभीर्य की प्रतिमूर्ति थे। किसी तरह का अहंकार या विद्वत्ता का गुमान उन्हें कभी छू तक नहीं पाया। अपनी अभिरुचि व प्रोफेशन से संबंधित विषयों में विद्वत्ता के साथ ही विषयगत हर पक्ष का सूक्ष्मतापूर्वक गहन अध्ययन और शोध करते हुए सम्पूर्ण ज्ञान और निष्कर्ष तक का उनका पूरा क्रम पूर्ण होने के बाद ही पूरी प्रामाणिकता के साथ सामने रखना उनकी अन्यतम विशेषता थी।

दस्तावेजों का वैज्ञानिक रीति से संधारण

श्री महेश पुरोहित का एक ओर जहां भाषा पर पूर्ण अधिकार था वहीं वे हर विषय पर घण्टों गहन अध्ययन, प्रमाण जुटाने और फिर सारगर्भित प्रामाणिक बात परोसने के आदी थे। उनकी किसी भी शोध पर उंगली उठाने का साहस कोई नहीं कर सका। ऎतिहासिक दस्तावेजों को सहेज कर रखने तथा वैज्ञानिक रीति से व्यस्थित संधारण की उनकी कला का हर कोई कायल था।

वागड़ पर गहरा अध्ययन

न केवल डूंगरपुर बल्कि बांसवाड़ा जिले और आस-पास के क्षेत्रों के इतिहास और भौगोलिक विषयों पर उनके ज्ञान की कोई सीमा नहीं थी। मुझे उन्होंने बांसवाड़ा जिले के कई पहाड़ों और भूगोल के बारे में अवगत कराया। और यह सब मेरे लिए एकदम नई जानकारी थी।

एक ज्ञानी-विज्ञानी ऋषि के रूप में उन्होंने डेढ़-दो दशकों तक का पूरा समय निरन्तर स्वाध्याय और शोध में बिताया और इस कार्य को उन्होंने तपस्या के रूप में लेते हुए आज जो कुछ वागड़ धरा को दिया है, वह अनुपम धरोहर ऎतिहासिक थातियों में शामिल है तथा सदियों तक याद रखा जाएगा।

ताजिन्दगी रहेगा मलाल

जब-जब भी उनकी कोई नई पुस्तक प्रकाशित होती, वे मुझे भेजकर समीक्षा के लिए आदेशित किया करते थे। यह अलग बात है कि समयाभाव और वागड़ अंचल से दूर होने की वजह से यह कार्य मैं नहीं कर पाया, यह मेरी धृष्टता ही रही। इसका मुझे ताजिन्दगी मलाल रहेगा। बावजूद इसके उन्होंने कभी कोई उलाहना नहीं दिया, हाँ, फोन पर याद जरूर दिलाते रहे।

डूंगरपुर कार्यकाल यानि की सन् 1997 से लेकर कुछ माह पूर्व तक उनसे मेरा फोन सम्पर्क निरन्तर बना रहा। उनकी पुस्तकों को मुझ तक पहुंचाने के लिए मैं श्री भूपेन्द्रनाथ चौबीसा एवं श्री मनोहरलाल चौबीसा का सदैव आभारी रहूंगा।

हमेशा किया प्रोत्साहित

वे जब भी मुझे फोन करते उनका संबोधन होता था - सरस्वती पुत्र। मेरे बारे में जब भी कहीं जिक्र आता, वे स्नेह के वशीभूत ‘सरस्वती पुत्र’ के रूप में मेरा परिचय दिया करते और कहते कि जिस विषय पर कहो - कलम चल जाएगी।

निरन्तर लेखन के लिए पुरोहित जी ने मुझे हमेशा प्रोत्साहित किया और साथ में नसीहत भी दी कि केवल लिखने के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के ज्ञानार्जन के लिए ऎतिहासिक तथ्यों के सम्पूर्ण समावेश के साथ लेखन होना जरूरी है ताकि हमारा हर लेख दस्तावेज के रूप में हमेशा उपयोग में आता रहे। इसके बाद मेरा इस दिशा में प्रयास लगातार बना रहा।

शोध अध्ययन का हो प्रकाशन

श्री महेश पुरोहित जी के व्यक्तित्व और कर्मयोग के बारे में जितना लिखा जाए, कम होगा। वे हमारे बीच नहीं हैं मगर अब हमारा यह प्रयास होना चाहिए कि उन्होंने जो कुछ लिखा है वह समाज और देश के सामने आना चाहिए।

इसके लिए प्रकाशन की कोई योजना बननी चाहिए। राज परिवार से लेकर डूंगरपुर के संगठनों और प्रबुद्धजनों को इसमें आगे आकर भागीदारी निभानी चाहिए। और यही हमारी मातृभूमि के प्रति वास्तविक सेवा तथा श्री महेश पुरोहित जी के प्रति सच्ची श्रद्धान्जलि होगी।

नई पीढ़ी के इतिहास जिज्ञासुओं और लेखकों को उनके समग्र जीवन से यही सीख लेनी होगा कि समाज की सेवा के लिए ऋषि की तरह तपस्या की आवश्यकता होती है। वागड़ वसुन्धरा के अनुपम रत्न को खोकर हम सभी लोग व्यथित हैं। श्री महेश पुरोहित जी के प्रति हार्दिक श्रद्धान्जलि।