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खरी-खरी - सनातन के मूल मर्म को आत्मसात करें

Deepak Acharya
Deepak Acharya
November 1, 2025
खरी-खरी - सनातन के मूल मर्म को आत्मसात करें

दुर्लभ मनुष्य जन्म मिलने के उद्देश्य को भूलकर आजकल हम छोटे-छोटे तुच्छ स्वार्थों के लिए मरे जा रहे हैं और इसके लिए टोने-टोटकों, ग्रह-नक्षत्रों के जप, सकाम अनुष्ठानों, शत्रुओं को परास्त करने, मनचाहे कामों या मनचाही और मनमानी स्थितियों को पाने के लिए वशीकरण आदि षट्कर्मों का प्रयोग करने-कराने, पारिवारिक शान्ति और सामाजिक सौहार्द के लिए प्रयास करने की बजाय एक-दूसरे संबंधों को पछाड़ने, समाप्त करने और एक-दूसरे पर हावी होने के लिए तंत्र-मंत्रों का सहारा लेने, मुफ्तखोरी, परिश्रमहीन पैसा, वैभव और ऐश्वर्य पाने, जमीन-जायदाद हड़पने और अपने नाम करने-कराने जैसे नश्वर कार्यों पर समय, पैसा और ऊर्जा नष्ट करने में भिड़े हुए हैं।

इससे हमारा कोई भला होने वाला नहीं। सब तरफ सनातन के नाम पर धन्धेबाजी हावी है। जो लोग पूजा-पाठ और ग्रह-नक्षत्रों के जप, अनुष्ठान आदि करते-कराते हैं, उनकी वैयक्तिक स्थिति क्या है? इस बारे में भी सोचें।

हर कहीं धर्म के नाम पर टोने-टोटकों से लेकर कोई न कोई रास्ता बताकर लूट जारी है और हम हैं कि भगवान का स्मरण भूल कर इनमें रमे हुए हैं।

असली धर्म वही है जिसमें एक गरीब से गरीब और विपन्न, सामान्य श्रेणी का व्यक्ति भी धार्मिकता का पूरा-पूरा पालन कर सके और इसमें पैसों का कोई महत्व न हो।

भगवान भावों का भूखा है। हमारे पास धर्म के नाम कोई सम्पत्ति या द्रव्य न हो तब भी मानसिक रूप से इनका समर्पण करना भौतिक समर्पण से कहीं अधिक और कई गुना प्रभावी एवं पुण्यदायी होता है और ऐसा करने वालों पर भगवान की प्रसन्नता शीघ्र होने लगती है।

पर आज धर्मकर्म में सब जगह पैसा हावी है। दक्षिणा का स्थान जब पारिश्रमिक ले ले, तब इस दैवीय कार्य को धार्मिक की बजाय उद्योग धंधों की श्रेणी में रखना ज्यादा उचित होना चाहिए।

प्रारब्ध को प्रसन्नतापूर्वक भोगने की बजाय जिन्दगी भर बाबाओं, पण्डितों और तांत्रिकों, मांत्रिकों, टोने-टोटकेबाजों के चक्कर लगा रहे हैं। फिर भी कुछ हासिल नहीं हो पा रहा है। और पूरी जिन्दगी भटकते रहने के आदी हो गए हैं। इससे कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला।

सनातन की उपासना पद्धति को अपनाएं। पंचदेव उपासना करें और ईष्ट को मजबूत रखें।

अपने आचरणों में दैवीय भाव और दिव्यता लाएं, शुचिता रखें। अपने आप भगवद्कृपा का अनुभव होने लगेगा। हमारे और ईश्वर के बीच कोई तीसरा दलाल, सौदागर, जादूगर, टोटकेबाज और मध्यस्थ नहीं होना चाहिए, तभी भगवान की कृपा हम तक सीधे पहुंचने लगती है।

सनातन के मूल रहस्य, जीवन के उद्देश्य और लक्ष्य को जानने की कोशिश करने पर जीवात्मा इन सभी प्रकार के पाखण्डों, धंधों, आडम्बरों आदि से दूर होकर भगवत्प्राप्ति का अधिकारी हो जाता है।

इस सत्य को हम आज नहीं समझ पाए तो फिर मरने के बाद भूत-प्रेत बनकर भटकना अथवा पशु-पक्षियों की योनियों में पैदा होना तय है।