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साहित्य
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अजीब महिमा है माननीयों और रागदरबारियों की

Deepak Acharya
Deepak Acharya
March 7, 2025
अजीब महिमा है माननीयों और रागदरबारियों की

संस्मरणात्मक आत्मकथ्य - राजकाज का रायता

राजा-महाराजाओं से लेकर लोकतंत्र के शहंशाहों तक न चापलूस राग दरबारियों की कोई कमी रही है, न इनका झूठा महिमागान करते हुए खुश करने वालों की। बड़े-बड़े ओहदों पर बैठे लोग इनके लिए ढोली, नगारची और डिण्डोरा पीटते रहने वाले से लेकर इनके ब्यूटीशियन और पब्लिसिटी का चारा डालकर उपकृत होने वाले हर युग में रहे हैं।

पुराने जमाने में तो इनके चेहरे-मोहरे, हरकतों और करतूतों को देखकर साफ-साफ पता चल जाता था कि कौन किसका आदमी है, कौन पालतू, पिछलग्गू और दुमहिलाऊ है और कौन किसकी दया, अनुकंपा और कृपा पर मौज उड़ा रहा है। लोकतंत्र का शोर मचा रहे वर्तमान परिवेश में भी ऐसे बहुरूपिया चरित्र वालों की कहीं कोई कमी नहीं है। केवल नाम बदले हैं।

आजकल तो राजनेताओं की चापलूसी आम से लेकर ख़ास लोगों तक का सार्वजनीन व्यवहार हो गया है जिसकी स्वीकार्यता के आगे स्वाभिमान, पदीय मर्यादाओं और सत्यासत्य या तथ्यों का कोई व्यवहारिक आधार नहीं रह गया है। चाहे किसी भी सत्ता क्यों न हो। आखिर सारे आकाओं और उनके पीछे चलने वाली रेवड़ों को यही सब तो पसन्द होता ही है।

बात उन दिनों की है जब एक बहुत बड़े संभाग मुख्यालय पर पदस्थ था। और वह क्षेत्र महात्मा गांधी के क्लोन माने जाने वाले राजनेता का था। अपना क्षेत्र होने की वजह से इन महानतम् वीवीआईपी व्यक्तित्व का आना-जाना लगा रहता। हमारा काम भी उनका महिमामण्डन करते रहना था। ड्यूटी निभाते हुए यह सब खूब किया।

इसी दौरान् कभी यह समझ नहीं आया कि आखिर बड़े-बड़े प्रशासनिक पदों पर बैठे लोग व्यवहारिक समझ क्यों नहीं बना पाते। प्रशासनिक सेवाओं की कोई सी श्रेणी क्यों न हो, यह जरूरी नहीं कि वे यथार्थ को समझने का कौशल रखते ही हों।

जब भी आका आते, उनकी खबरें जारी होती, मीडिया के व्हाट्सअप ग्रुप और तमाम सोशल मीडिया पर फोटो और वीडियो क्लिप के साथ पल-पल की ब्रेकिंग न्यूज जारी होती। और इस ग्रुप में वे साहब भी शामिल थे जो आका की सेवा-चाकरी में दिन-रात रमे रहकर गर्व और गौरव का अभिमान रखते हुए फूले नहीं समाते थे।

यहां तक तो सब ठीक-ठाक है। असली बात शुरू होती है समाचारों के प्रस्तुतीकरण से। जब भी कोई ब्रेकिंग न्यूज जारी होती, सरकारी प्रेस नोट जारी होता, साहब की निगाह पड़ते ही यह निर्देश टपक पड़ता कि ऑनरेबल साहब के नाम के आगे माननीय, श्री इत्यादि लिखो। और उधर मीडिया वालों को पूरी तरह पक्की और तैयार खबर की चाहत रहती।

वे माननीय और श्री जैसे शब्दों का इस्तेमाल खबरों में नहीं किया करते। वे कहते कि इन शब्दों का प्रयोग न करें ताकि खबरों में कोई संशोधन नहीं करना पड़े और सीधी चलायी जा सके। अन्यथा इन शब्दों को हटाने में मेहनत करनी पड़ती है।

इस बारे में साहब को बताया भी गया लेकिन वे मानें तब न। उनसे छोटे वाले साहबों को इस बारे में बताया गया। वे समझ गए लेकिन कहा - बड़े साहब का एकसूत्री एजेण्डा है, चाहे जिस तरह भी हो सके आका खुश हों, ऐसा करो।

अधीश्वरों का अपना अलग ही संसार होता है। आकाओं की चापलूसी और खुश करने की हर कला में माहिर लोगों को समझा पाना कितना मुश्किल होता है इस दुविधा को कोई नहीं समझ पाता।

और तो और आका के साथ ही दौरे करने वाले एक बड़े साहब तो अपने मोबाइल से खुद ही फोटो व वीडियो खींचकर भिजवाते और इसी को मीडिया से शेयर करने का निर्देश रहता। उनका पूरा फोकस साहब के बेस्ट फोटो पर रहता। बाल उड़े हुए न दिखें, सर पर ज्यादा टाट वाला हिस्सा न दिखे, भाषण की मुद्रा मनोहारी दिखनी चाहिए इत्यादि-इत्यादि।

यह रस्साकशी तब जाकर थमी जब आका का राजनैतिक पराभव हो गया और उनके ख़ास समझे जाने वाले साहब का वहाँ से तबादला हुआ। और तब जाकर सब ने ली चैन की साँस।