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साहित्य
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ईश्वरीय इच्छा और प्रवाह का सम्मान करें - कर्म को टालें नहीं, भोग लें

Deepak Acharya
Deepak Acharya
December 12, 2021
ईश्वरीय इच्छा और प्रवाह का सम्मान करें - कर्म को टालें नहीं, भोग लें

जीवात्मा जब तक कर्म को पूरी तरह भुगत नहीं लेते तब तक आगे से आगे चलते रहते हैं। कारण यह है कि कोई से कर्म का अच्छा-बुरा फल सामने आने पर अच्छे फल को तो हम प्रसन्नतापूर्वक भुगत लेते हैं और आनंदित होते हैं लेकिन पूर्व जन्मों के और वर्तमान जन्म के पाप कर्मों की वजह से दुःख आने पर भगवान से अनुनय विनय करते हैं कि इसे हटा दे। भगवान बड़ा ही दयालु है इस कारण वह उस समय तो हमें इस दुःख से मुक्त कर देता है लेकिन कर्म का क्षय नहीं होता, वे कर्म कुछ वर्ष बाद के लिए अथवा अगले जन्मों के लिए टल जाते हैं।

इसलिए जो कुछ अच्छे-बुरे कर्म का फल प्राप्त हो रहा है उसे प्रसन्नतापूर्वक भोग लिया जाना चाहिए ताकि बाद में इनसे दो-चार न होना पड़े।

नियति के विधान को जो प्रसन्नतापूर्वक भोग लेता है उसके प्रति नियति भी दयालु रहती है। इसलिए भगवान की इच्छा से जीने की कोशिश करो, अपनी इच्छा से नहीं।

भगवदीय प्रवाह को परम सहजता और प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करने पर भगवान हमारे पाप कर्मों से सृजित दुःखों को न्यूनतम स्तर तक लाकर आसानी से भुगतवा देता है और पुण्य कर्मों के सुखों को उच्चतम घनत्व एवं अधिकतम व्यापकता के साथ भुगतवाते हुए आनंद में डूबोए रखते हुए पाप-पुण्य दोनों का ही समूल क्षय कर जीवात्मा को अपना लेता है, मोक्ष कर देता है।