अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस - सरकारी मशीनरी को बनाया जाए संवेदनशील व जवाबदेह


राज्य और केन्द्र सरकार द्वारा महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और उनके उत्थान के लिए योजनाओं और कार्यक्रमों की कहीं कोई कमी नहीं है लेकिन समस्या उस सरकारी मशीनरी की है जो अपनी तनख्वाह और भत्तों तथा दूसरे चाहे-अनचाहे लाभों और प्राप्तियों के फेर में संवेदनहीन, पुरातनपंथी और यथास्थितिवादी बनी हुई है।
कहने को उनका विभाग सेवा प्रधान और कल्याणकारी है मगर वह केवल नाम का ही सेवा प्रधान होकर रह गया है। यदि यही सरकारी मशीनरी अपने परम्परागत दायरों और कछुवा खोल से बाहर निकल कर अपने विभाग की योजनाओं और कार्यक्रमों के बारे में जागरुकता संचार की पहल अपनी ओर से करे और अधिक से अधिक महिलाओं के उत्थान का लक्ष्य निष्काम भाव से लेकर आगे आए, तो कोई कारण नहीं कि विभागीय लक्ष्य भी समय से पूर्व पूर्ण न हों और सामाजिक बदलाव की दिशा में चमत्कारिक परिवर्तन सामने न आएं।
लेकिन विभागीय कुनबा चुपचाप सब कुछ करने का आदी होता जा रहा है और यही कारण है कि जनोन्मुखी स्वभाव समाप्त होता जा रहा है। ‘जैसा चल रहा है, चलने दो’ का भाव मुख्य होता जा रहा है। इस वजह से जिन आम महिलाओं के लिए ये योजनाएं बनी हैं उनको इनकी जानकारी तक नहीं हो पाती और वे सब कुछ प्रावधान होते हुए भी इनका लाभ पाने से वंचित रह जाती हैं।
इस स्थिति का फायदा सरकारी मशीनरी को किसी न किसी रूप में उपकृत करने वाले अति जागरुक लोग ही भरपूर उठाते रहते हैं। इस स्थिति में बदलाव लाए बगैर महिला उत्थान के लक्ष्यों को हासिल करने की बातें बेमानी है।
राजनेताओं और अफसरों की स्थिति यह है कि विभिन्न आयोजनों, सभा-संगोष्ठियों, बैठकों, समारोहों आदि में महिला उत्थान की योजनाओं और कार्यक्रमों, अभियानों और सभी प्रकार की रचनात्मक गतिविधियों के बारे में जानकारी देने की बजाय महिला कल्याण और उत्थान पर उपदेशात्मक भाषण और आह्वानमूलक अपील की बारिश करते रहते हैं जैसे कि ये कोई महान दार्शनिक या उपदेशक हों।
इन्हें लच्छेदार और लोक लुभावन शब्दों और इनके जरिये पायी जाने वाली पब्लिसिटी की भूख को शान्त करने से ही फुर्सत नहीं है। जबकि इन लोगों को चाहिए कि सरकार की योजनाओं की जानकारी आम महिलाओं दें और उन्हें इनके लाभों से परिचित कराते हुए इन लाभों को प्राप्त करने की प्रक्रिया, दस्तावेजों की आवश्यकता और सम्पर्क सूत्रों की जानकारी भी साझा करें। लेकिन वे ऐसा कभी नहीं करते। कभी कभार कोई उपदेशात्मक दार्शनिक भाषण नहीं होने की स्थिति में ही केवल योजनाओं के नाम भर गिना देते हैं।
सच में इनमें लोक सेवा और महिला कल्याण का कोई दृढ़ संकल्प या लक्ष्य नहीं हुआ करता, केवल सत्ता सुख का चरम भोगना और टाईमपास करते हुए आगे की यात्रा करना ही रह गया है।
इस ठहराव की स्थिति के लिए विभिन्न विभागों के बड़े अफसर भी काफी हद तक जिम्मेदार होते हैं। इनमें से अधिकांश अफसर केवल टाईमपास करने की नीति पर यथास्थितिवादी बने रहकर अपने ही अपने स्वार्थों में रमे रहते हैं।
राजधर्म के प्रति फिसड्डी रहने वाले इन अफसरों की उदासीनता की वजह से ही निचले स्तर पर ड्यूटीचोरों, भ्रष्टाचारियों और शिथिलता बरतने वाले मातहत अफसरों और कार्मिकों पर कोई कार्यवाही नहीं हो पाती और उनकी मनमानी चलती रहती है।
इसके लिए आकस्मिक निरीक्षण और उदासीनों पर सख्त दण्डात्मक कार्यवाही किए बिना कोई बदलाव आने वाला नहीं। बड़े अफसरों के निरीक्षण दौरे भी औपचारिक होकर रह गए हैं। इस बारे में प्रशासनिक सुधार विभाग की यथास्थितिवादी मानसिकता भरी कार्यवाही के कारण अब तक कोई बदलाव नहीं आ पाया है।
अधिकांश सरकारी संस्थानों में लेट लतीफी, पूरे समय न रुकने, जल्दी भाग जाने, मूवमेंट रजिस्टर की परम्परा न होने आदि की शिकायतें आम हो गई हैं। कई बार तो प्रशासनिक सुधार विभाग की निरीक्षण टीम के आकस्मिक निरीक्षण की भनक पहले से ही मिल जाया करती है।
विधवाओं और परित्यक्ताओं को शिक्षकीय सेवाओं में लिए जाने से काफी हद तक इन महिलाओं के जीवन में रोशनी का प्रवेश हुआ है तथापि विधवाओं और परित्यक्ताओं में बहुसंख्य महिलाएं ऐसी हैं जिनके सामने जीवन यापन का संकट बहुत बड़ा है। इन्हें शासकीय सेवाओं में लिया जाकर इन्हें आत्मनिर्भर बनाए बगैर विधवाओं और परित्यक्ताओं के कल्याण की बातें बेमानी हैं।
आज गांव-गांव महिला एवं बाल विकास, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता (पूर्व में समाज कल्याण नाम से मशहूर), महिला अधिकारिता आदि विभागों और स्वयंसेवी संस्थाओं की गतिविधियों का जाल बिछा हुआ है।
ऐसे में इस ग्राम्य मशीनरी को गरीब और जरूरतमन्द महिलाओं, ख़ासकर विधवाओं और परित्यक्ताओं के प्रति और अधिक संवेदनशील बनाना जरूरी है। ग्राम्य मशीनरी यदि अपने दायित्वों को ईमानदारी से निभाए तो महिलाओं के उत्थान का ग्राफ कुछ प्रतिशत और ऊँचाई पा सकता है। जरूरत है तो बस ईमानदार प्रयासों और मानवीय संवेदनाओं की।
