साहित्यिक यात्रा में वापस
साहित्य
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साहित्य वही जिसे सदियां गुनगुनाएं

Deepak Acharya
Deepak Acharya
September 19, 2021
साहित्य वही जिसे सदियां गुनगुनाएं

सब तरफ खूब लिखा जा रहा है, खूब बोला जा रहा है और खूब सारा छापा-छपयावा जा रहा है। इस मामले में अक्षरों की दुनिया में जो चौतरफा विस्फोट कुछ अर्से पहले तक दिखाई देता था, वह अब सोशल मीडिया के आने के बाद महा विस्फोट के रूप में बदलता जा रहा है। लाखों लेखक, रचनाकार, कवि और साहित्यकारों द्वारा लिखा जा रहा है। और लिखे हुए या बोले हुए को अनचाहा परोसा भी जा रहा है। और इन सबके पीछे हेतु यह है कि लोगों में, क्षेत्र और दुनिया में अपनी पहचान बने और लोग लेखक या सर्जक के रूप में स्वीकारें,।

और इस सारी यात्रा का लक्ष्य यही है कि लोग इसी के माध्यम से आम से खास के रूप में अपनी पहचान स्थापित करते हुए लोकप्रियता के शिखरों को चूमने की ओर अग्रसर होते रहें। लेकिन यक्ष प्रश्न यह भी है कि इस अंधाधुंध सृजन की उपयोगिता कितनी है।

युगों पहले से चली आ रही श्रुति परम्परा का जनमानस पर जितना सीधा और गहरा प्रभाव हुआ करता था उसका आज लोप होता जा रहा है। अब लिखना भी है तो केवल लिखने के लिए ही लिखना होकर रह गया है, छपने के लिए लिखना होकर रह गया है। लेखन या अभिव्यक्ति का क्षेत्र लगातार पसरता जा रहा है, बावजूद इसके जनमानस पर कोई गहरा प्रभाव नहीं दिखता, जितना कि होना चाहिए।

आदि कवि और सर्जक ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए लिखा करते थे, जनमानस को ज्ञान एवं अनुभव देते हुए लोक चेतना के लिए, लोक मंगल के उद्देश्य और परिवर्तन के लक्ष्य को लेकर लिखा करते थे। अब अधिकांश मामलों में लेखन और अत्याधुनिक संचार पद्धतियों को अपनाकर लिखा तो खूब जा रहा है लेकिन प्रामाणिकता, तथ्यों और यथार्थ पर उतना ध्यान नहीं दिया जा रहा है जितना कि हमारे पूर्वज दिया करते थे।

उनका सृजन दशकों, शताब्दियों और सहस्राब्दियों बाद आज भी प्रेम और श्रद्धा के साथ स्वीकारा जा रहा है। यही नहीं तो पुरातन रचनाकारों की रचनाएं आज भी कालजयी होकर उतना ही प्रभाव छोड़ रही हैं जितना उनके समय में प्रभावी थी। आदि कवियों, पुरातन रचनाकारों और भक्त-कवियों की रचनाएं आज भी हर किसी की जुबान पर आकर प्रेम, श्रद्धा और माधुर्य की सरणियां बहाने में सक्षम हैं और इनका गान, पाठ या श्रवण ही अत्यन्त मनभावन है।

आज अपने सृजन के प्रति आत्म मुग्ध होकर लगातार लिख और छप रहे कितने रचनाकारों की रचनाओं को कितने लोग याद रख पाते हैं, गुनगुनाते हैं या प्रयोग में ला पा रहे हैं, इसकी वास्तविकता से कोई अपरिचित नहीं है। इसका मूल कारण यह है कि पहले जहां रचना कर्म हृदय के भावों से भरा होता था, दिल के अन्दर से निकलकर सीधा बाहर आता था वहीं आज जो कुछ सृजित हो रहा है उसका अधिकांश हिस्सा दिल की बजाय दिमागी तन्तुओं की छलनियों से होकर बाहर आ रहा है या किसी न किसी रिमोट से संचालित होकर दिशाएं और कलेवर बदल-बदल कर मार्केटिंग की जा रही है, जहाँ उसमें मौलिकता की बजाय वैयक्तिक पूर्वाग्रह-दुराग्रह और प्रदूषित लक्ष्य अधिक हावी होते हैं।

यही कारण है कि ऎसा सृजन आत्म स्वीकार्य होकर आत्म मुग्धता के व्यामोह से तो बाँधे रखने में सफल हो रहा है किन्तु जन स्वीकार्यता में लगातार कमी आती जा रही है और यही कारण है कि यह साहित्य या सृजन का कोई सा पहलू जन स्वीकार्यता प्राप्त नहीं कर पा रहा है।

उस जमाने में अद्धैत का चिन्तन प्रधान था जबकि आज बहुभेदी स्वरूप में होने के कारण सृजन और इसके प्रभावों का भी ध्रुवीकरण होता जा रहा है। इस वजह से सृजन लोकमंगलकारी न होकर वैयक्तिक महिमा मण्डन या आलोचना-निन्दा का माध्यम होकर रह गया है। जो साहित्य लोक में रस का संचार न कर सके, उसका कोई उपयोग नहीं है चाहे वह कितने ही व्यापक और अतुलनीय परिमाण में सृजित करते हुए इनके बड़े-बड़े पर्वताकारी ढेर ही क्यों न लगा दिए जाएं।

जब से लेखन का उद्देश्य और लक्ष्य बदलने लगा है तभी से यह स्थिति सामने आ रही है। यही कारण है कि सर्जकों का सृजन कोई खास असर दिखा पाने के अपने लक्ष्यों से भटकने लगा है। रचनाकार की शुचिता और रचना धर्म के उद्देश्यों में पवित्रता होने पर ही वह सृजन अक्षर ब्रह्म की ऊर्जा ग्रहण पा सकता है अन्यथा रचनाकार की पूर्व से बंधी-बंधायी मानसिकता, किसी प्रलोभन या दबाव में आकर सृजन, सम्मान-पुरस्कार और अभिनंदन की भावी चाहत अथवा व्यक्ति विशेष को केन्द्र में रखकर रचा जाने वाला साहित्य कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ पाता और चन्द वर्षों की आयु पाकर ही प्राणहीन हो जाता है। इस प्रकार के साहित्य और साहित्यकार को जनमानस भी बहुत जल्द ही विस्मृत कर देता है।

लेखन जब अन्तःस्फुरणा से सृजित होता है, तभी वह विराट स्वरूप पाने में सफल हो सकता है अन्यथा उसका क्षरण निश्चित है। केवल लिखने या रायल्टी पाने के लिए लिखे जाने वाले साहित्य में सायास शब्दों को फ्रेम या किसी पूर्व निर्धारित साँचे में ढालकर परोसने से उन शब्दों के पर कतरे हुए जैसे हो जाते हैं अथवा वह रचना अपने आप को नज़रबन्द महसूस करती हुई शब्दों की हथकड़ी को तोड़कर मुक्त होना चाहती है और कुछ समय बाद शब्द श्रृंखला टूटकर वापस अपनी मौलिक अवस्था में आ ही जाती है।

असली लेखन वही है जो आत्मप्रेरणा से आकार प्राप्त करे, किसी के कहने अथवा किसी को खुश करने के लिए लिखा या बोला जाने वाला सृजन स्थूल होकर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण की भेंट चढ़ जाता है और कुछ समय बाद ही दम तोड़ देता है।

सृजन आत्मवाणी की तरह है, यह आत्मा से निकलने वाली धाराएं हैं जिनका प्रवाह तभी यादगार सिद्ध हो सकता है कि जब इसमें किसी भी स्तर पर मिलावट न हो, जैसा सृजित हुआ है, वैसा ही ताजा और तत्काल परोसा जाए, तभी जनमानस के मन-मस्तिष्क के लिए पौष्टिक और प्रेरणादायी, ऊर्जा संचरण करते हुए लोक में आलोक फैलाता हुआ चेतना जगा सकता है।

जिन लोगों को अपने सृजन को प्रभावशाली बनाना हो, उन्हें चाहिए कि मन, कर्म और वचन की शुद्धता, शरीर, मस्तिष्क और परिवेश की शुचिता को अपनाएं, ऎसा होने पर आत्मा से जो कुछ वाणी प्रस्फुटित होगी, वह अपने आप में कालजयी साहित्य का स्वरूप ले लेगी। इसी से आत्म आनंद प्राप्त हो सकता है, जो कि बाद में परमानंद में परिवर्तित होकर जीवात्मा को जीते जी ही मुक्तात्मा बना देता है।