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अभिशाप है आतिशबाजी - शापित कर देती है पूरी जिन्दगी

Deepak Acharya
Deepak Acharya
November 2, 2021
अभिशाप है आतिशबाजी - शापित कर देती है पूरी जिन्दगी

आतिशबाजी ऎसा शब्द है जिसका संबंध हर इंसान से किसी न किसी रूप में है। या तो हम आतिशबाजी करने के शौकीन होते हैं अथवा कराते हुए दूर से मजा लेने के अथवा आतिशबाजी देखने के।

जलना तथा औरों को जलाना इंसान के लिए कभी आदत बना होता है कभी फितरत। आतिशबाजी अच्छे और बुरे दोनों समय किए जाने की परंपरा रही है। पहले यह शौक राजा-महाराजाओं और सम्राट तक सीमित था, अब आम लोगों तक आ पहुंचा है।

दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। एक वे हैं जो शांत रहकर काम करते हैं और चरम शांति पसंद हैं। इन्हें न भीड़-भडक्का पसंद होता है न किसी प्रकार का शोर। इस तरह के लोगों में से अधिकांश लोग आत्मस्थिति में जीने वाले होते हैं और असल में ये लोग ही दुनिया में कुछ नया और कालजयी कर पाने का माद्दा रखा करते हैं।

इसके ठीक उलट अधिकांश लोगों की फितरत होती है शोरगुल करना-कराना, शांति भंग करना-कराना और मजे लेना। आतिशबाजी को कहीं यौद्धिक विध्वंस का परिणाम माना गया है और कहीं आनंद की अभिव्यक्ति का।

आतिशबाजी का सीधा संबंध युद्ध से है और इसका उपयोग उसी में होना चाहिए तभी तक ठीक है। जहां कहीं लोक जीवन में सामान्य या असामान्य अवसरों पर आतिशबाजी के धमाकों का प्रयोग होता है वहां आतिशबाजी के शौकीन लोगों के लिए यह नितान्त मनोरंजन और उल्लास का बाहरी प्रकटीकरण है।

आजकल इंसान के लिए आतिशबाजी सबसे सरल और सस्ता प्रयोग है जिसे अपनाकर वह अपनी बाहरी खुशी का इजहार कर सकता है। अक्सर आतिशबाजी करने वालों के जीवन पर अनुसंधान किया जाए जो साफ पता चलेगा कि ऎसे लोग केवल शोरगुल और धींगामस्ती का क्षणिक प्रदर्शन कर यश पाने वालों में शुमार रहते हैं, इनसे कोई दूसरा अच्छा काम नहीं हो सकता।

आतिशबाजी करने वालों की पूरी की पूरी भीड़ के मनोविज्ञान और जीवन व्यवहार को देख कर इसका अंदाजा अच्छी तरह लगाया जा सकता है। जो उथले, छिछले और हल्के लोग होते हैं वे ही आतिशबाजी से आनंद पाने के लिए प्रयासरत रहा करते हैं क्योंकि इनके लिए आनंद देने वाला और कोई दूसरा ठोस कारण या तरीका होता ही नहीं है इसलिए शांति भंग करते हुए ये अपने वजूद को सिद्ध करते रहते हैं।

वहीं यही लोग हैं जो कि औरों को दिखाने तथा दूसरों की नज़रों में आने के लिए ही आतिशबाजी जैसे सरल और धमाकेदार माध्यमों का सहारा लेते रहते हैं।

इन्हें अच्छी तरह पता होता है कि धमाकों की ओर दुनिया का ध्यान जल्दी जाता है। यही वजह है कि धमाका करके खुश होने वाले लोग क्षणिक आनंदोत्सव मनाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लिया करते हैं।

आतिशबाजी और शोरगुल करते हुए जीवन में आगे बढ़ने के शौकीन लोग पूरी जिन्दगी कुछ भी हासिल नहीं कर पाते हैं और वैसे ही निठल्ले या अनुपयोगी बने रहते हैं।

अक्सर किसी विशिष्ट व्यक्ति के आगमन और किसी उमंग भरी खबर सुनते ही कुछ लोग आतिशबाजी कर डालते हैं। इन्हें पता नहीं होता कि आतिशबाजी करते हुए भले ही वे खुद आनंद पा लेते हैं लेकिन धमाकों की वजह से उन लोगों को कितनी पीड़ा होती है जो लोग बीमार, अशक्त और पीड़ित हैं।

उन पक्षियों और पशुओं सहित तमाम जानवरों की सोचें जो अंगारों, धमाकों और तीव्र चमक के कारण उद्वेलित हो जाते हैं और खतरा मानकर उन्हें अपने डेरों और घोंसलों से कुछ समय के लिए पलायन के लिए विवश होना पड़ता है।

आतिशबाजी के धूंए की वजह से कितना घातक प्रदूषण फैलता है, कानों को खतरा पैदा हो जाता है और पूरा का पूरा माहौल अशांत, उद्वेलित एवं असंतुष्ट हो जाता है।

शादी-ब्याहों के वक्त भी आतिशबाजी का नज़ारा अब आम हो गया है। एक तरफ लोग घर बसाने के लिए घोड़े पर सवार होकर जाते हैं और दूसरी ओर इनके प्रोसेशन के आगे रह-रहकर होने वाली आतिशबाजी पशु-पक्षियों और लोगों को हैरान करती रहती है। और ये लोग दुल्हे और बारातियों को बददुआएं देने से नहीं चूकते।

आतिशबाजी वाला एक प्रोसेशन विवाह मण्डप में पहुंचने से पहले तक रास्ते भर हजारों लोगों की बद्दुआएं पा लेता है। कितने सारे जीव इस प्रोसेशन में शामिल लोगों को श्राप देते हैं। इसका अंदाजा वे लोग कभी नहीं लगा पाएंगे जो लोग आतिशबाजी को ही सम्पन्नता, वैभव और आनंद का पर्याय मान चुके हैं।

यही कारण है कि जिन लोगों के शादी-ब्याहों में आतिशबाजी के तीव्र धमाके और शोर होता है उनका दाम्पत्य जीवन जीवों की बद-दुआओं और नकारात्मक विचारों की वजह से अभिशप्त हो जाता है। लेकिन हम अपनी ही मौज में जीने के इतने आदी हो चले हैं कि हमें कुछ भी पता नहीं चल पाता और इसके कारणों की तरफ जाने की कोई कोशिश नहीं करते।

यही स्थिति सभी प्रकार के आयोजनों, वीआईपी के आगमन और तमाम गतिविधियों में सामने दिखाई देने लगी है। लगता है कि जैसे रावण दहन से पहले आतिशबाजी हो रही हो या रावण परिवार के पुतले धमाकों के साथ जल रहे हों।

हम जितना पैसा आतिशबाजी में बर्बाद करते हैं उसका आधा भी यदि देश के गरीबों के लिए खान-पान और उनके अभावों को दूर करने में लगाएं तो देश का कल्याण ही हो जाए। आतिशबाजी केवल अशांति और युद्ध का विषय है और इसका उपयोग वहीं किया जाना चाहिए।

जहाँ कहीं लोक जीवन में आतिशबाजी का प्रयोग होता है यह इससे जुड़े लोगों और क्षेत्रों के लिए अभिशाप का जनक हो जाता है। इंसान को आवश्यकता परम शांति और शाश्वत आनंद की है न कि पैसों की बर्बादी के साथ आतिशबाजी से आनंद पाने की।

सच्चा और अच्छा इंसान वही है जो अशांति से शांति, असन्तोष से संतोष तथा परिग्रह से अपरिग्रह की ओर जाए। जीवन की समस्याओं से बचना चाहें तो आतिशबाजी से दूर रहें, शांति की ओर जाएं, अपने आत्म आनंद को पाने की कोशिश करें। यह पक्का मान लें कि आतिशबाजी से जीवन शापित हो जाता है।