गर्व से कहो - हम सब हैं कट्टर निष्ठावान राष्ट्रवादी


महानतम एवं ओजस्वी राष्ट्रवादी विचारक पं. दीनदयाल उपाध्याय जी के त्याग, तपस्या और कठिनतम संघर्षों का फल आज लोग भोग रहे हैं उनके नाम से। कृतज्ञ राष्ट्र हर पल उनके प्रति श्रृद्धा और आस्था का ज्वार उमड़ाता रहा है।
भाजपाइयों और कट्टर निष्ठावान राष्ट्रवादियों ही नहीं बल्कि हम जैसे सभी सामान्य और अल्प बुद्धि वाले लोगों के लिए भी वे आदर्श और आराध्य हैं।
उन्हीं पण्डित दीनदयाल जी उपाध्याय के विचारों और जीवन गाथाओं पर केन्द्रित कई-कई वोल्युम्स कुछ वर्ष पहले राजस्थान के सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग ने प्रदेश भर के जनसम्पर्क कार्यालयों में भिजवाए थे। और इस कारण से इन कार्यालयां के पुस्तकालयों के कोने इन किताबों से भर गए थे।
इनके उपयोग के बारे में कुछ कहना उचित नहीं होगा क्योंकि सरकार के नीतिगत फैसलों और गुप्त एजेण्डों पर चर्चा करना हमारा अधिकार नहीं, लेकिन मेरे व्यक्तिगत मत में आज राजस्थान सरकार पं. दीनदयाल उपाध्याय जी के नाम पर जो अन्त्योदय सम्बल पखवाड़ा चला रही है, उसमें इन पुस्तकों का कहीं न कहीं कोई प्रेरक योगदान जरूर माना जा सकता है।
कहा जाता है कि बोला गया और लिखा गया हर शब्द एक न एक दिन ब्रह्माण्ड में हलचल मचाने में समर्थ हो ही जाता है। तभी तो इसे अक्षर ब्रह्म की संज्ञा दी गई है।
कमरों में बंद और पैकैट्स में कैद इन पुस्तकों में से पं. दीनदयाल उपाध्याय जी के उद्गार, उपदेश और कार्य आज सूक्ष्म रूप में बाहर प्रस्फुटित हो रहे हैं और शीर्ष सत्ता के कर्णधारों के दिमाग तक पहुंचे हैं। इसी का परिणाम है कि प्रदेश की सरकार अन्त्योदय सम्बल के लिए पखवाड़ा चला रही है।
और इस पखवाड़े के माध्यम से ही सही, आज पं. दीनदयाल उपाध्याय का नाम भगवा पार्टी वाले, राष्ट्रवादी लेने लगे हैं और अपने भाषणों में उनका स्मरण करते हुए आहत को राहत एवं अंतिम पंक्ति पर बैठे आमजन के उत्थान की बातों में रमे हुए हैं।
पुस्तकों के कद्रदानों और छपे हुए शब्दों पर अपार भरोसा करने वाले समझदारों का मानना है कि भले ही ये बहुमूल्य पुस्तकें बरसों से एक ही जगह पड़ी हों, मगर एक न एक दिन जब भी भारतीय इतिहास और पं. दीनदयाल उपाध्याय का संदर्भ आएगा, तब इनका उपयोग संभव हो सकेगा।
किसी भी साहित्य का आज वर्तमान में उपयोग हो या न हो, लेकिन आने वाली पीढ़ियों को जब भी जरूरत पड़ेगी तब कमरों में बंद इस प्रकार के महान संदर्भ साहित्य का उपयोग होकर ही रहता है।
शायद यही सोचकर तत्कालीन वसुन्धरा सरकार ने बड़ी संख्या में वोल्युम्स खरीदकर राजस्थान भर में भिजवाते हुए इस दुर्लभ साहित्य को संरक्षित करने का बीड़ा उठाया होगा। सभी राष्ट्रवादियों और भाजपाइयों को इस पर गर्व होना चाहिए कि नहीं?
आइयें हम सभी पं. दीनदयाल उपाध्याय के विचारों और संकल्पनाआेंं का सम्मान करें और सर्वशक्तिमान परमात्मा से करुण भाव में प्रार्थना करें कि इस महान साहित्य को आने वाली पीढ़ियों तक के लिए संरक्षित और सुरक्षित रखे और इसका पूरा-पूरा उपयोग कभी न कभी सुनिश्चित हो। माना जाना चाहिए कि सन् 2047 आते-आते विकसित भारत में यह संभव हो सकेगा।
पं. दीनदयाल उपाध्याय जी अमर रहें
