कोरोना काल - आत्मसंयम का महायुग


कोरोना की वजह से वैश्विक संकट के दौर से गुजर रही दुनिया के सम सामयिक भयावह और विषम हालातों की वजह से पनपे नकारात्मक पक्ष की चर्चा सब तरफ हो रही है लेकिन इन सभी के बीच जो शाश्वत, कालजयी और कड़वा सच उभर कर आया है वह है जीवनचर्या विज्ञान।
इंसान कैसा होना चाहिए, उसे किस तरह जीना चाहिए और इंसान के रूप में पैदा होकर उसके क्या-क्या कर्तव्य हैं, प्रकृति के साथ, जीवों और जगत के प्रति उनका व्यवहार और तादात्म्य कैसा होना चाहिए, इन सभी पक्षों के बारे में इस छोटे से वायरस ने दुनिया के लोगों को बहुत बड़ी सीख दी है।
कोरोना काल का सर्वाधिक सकारात्मक और सुकूनदायी पक्ष यह है कि इसने इंसान को उसकी औकात दिखा दी है, उसके आविष्कारों, अहंकार और मदान्धता भरे अधिकारों, भोग-विलासी संसाधनों और अवसरों, स्वेच्छाचारिता और उन्मुक्त व्यवहार, अनुशासनहीनता और मर्यादाओं के खात्मे के साथ ही साफ तौर पर बता दिया है कि जीवन उसी का है जो जीना जानता है, ‘जिओ और जीने दो’ में विश्वास रखता है और पूरी दुनिया के प्रति संवेदनशील एवं उपकारी है।
प्रकृति अपने भीषण और अंधाधुंध दोहन, धरती पर पापों और अत्याचारों, सज्जनों के साथ प्रताड़ना, दुर्जनों की निरंकुश धींगामस्ती, अनाचार, भ्रष्टाचार, लूट-खसोट और अमानवीय व्यवहारों से इतनी अधिक त्रस्त हो चुकी है कि अब उसके भी बस में कुछ नहीं रहा।
दुनिया के साम्राज्यवादी, हिंसक, धर्मान्ध, रंगभेदी और पक्षपाती लोग अपने-अपने हिसाब से जीवन की व्याख्या करते हुए औरों को रौंदते हुए बढ़ते जाने को ही प्रगति मान बैठे हैं। मानवीय मूल्य और आदर्श हवा हो रहे हैं, समुदाय के प्रति हमारे कर्तव्य हम भुलाते जा रहे हैं और सब तरफ संग्रह ही संग्रह, जमाखोरी और भ्रष्टाचार का ताण्डव मचता हुआ दिखाई दे रहा है।
समझदार लोगों ने तो इन तमाम हालातों में यह मान ही लिया है कि कलियुग का प्रभाव ही सर्वत्र दृष्टिगोचर हो रहा है। ईश्वर का भय कहीं रहा नहीं। आतंकवाद, उत्पात, असामाजिक तत्वों के उपद्रव और अशांति के माहौल को झेलते-झेलते प्रकृति इतनी त्रस्त हो चली थी कि उसके पास इंसान की अक्ल ठिकाने लगाने का कोई और चारा ही नहीं बचा।
ऎसे में अब जो कुछ हो रहा है उसे प्रकृति की कोपदृष्टि के रूप में देखा जाने लगा है। इतना सब कुछ भोगने और अपनी आँखों के सामने काल के क्रूर ताण्डव को देखने के बावजूद न हमारी मानवता जग पायी है, न संवेदनाएं।
एक महीन वायरस ने सारी दुनिया को महामारी और अकाल मृत्यु के दावानल की ओर उछाल रखा है। सब तरफ हर मामले में अनिश्चय, असमंजस और हताशा का माहौल छितराया हुआ है। इक्कीसवीं सदी के आनंद में डूबे हम लोगों को पुरानी सदियों की सादगी, एकान्तवास और शांति की ओर लौटने की स्थिति आ गई है।
कोरोना की वजह से हमें फिर से आत्म संयम और आत्म अनुशासन को अपनाने के लिए प्रवृत्त होना पड़ा है। यदि हम जीवन और जगत के शाश्वत मूल्यों और मर्यादाओं का व्यतिक्रम नहीं करते तो शायद हम आसानी से जीवन के सफर को आगे बढ़ाते रहते। लेकिन हमने ऎसा नहीं किया, इसका खामियाजा न केवल हमें बल्कि अब आने वाली पीढ़ियों को भी भुगतना और भोगना पड़ेगा।
वैदिक ज्ञान, पुरातन परंपराओं, प्राचीन ऋषि-मुनियों आदि ने जो परंपराएं बनाई, जो नियम बनाएं, वे सारे दीर्घकालीन अनुसंधान पर आधारित हैं। इनके आधार पर जीवनचर्या का संचालन किया जाए तब ही जीवन को सुन्दर एवं आशातीत सफल बनाया जा सकता है।
दृष्टि, स्पर्श, सम्पर्क और मानसिक आवेग-संवेगों से ऊर्जाओं के स्थानान्तरण एवं प्रभाव, हर तरह की शुचिता बनाए रखने और खान-पान तथा कमाई में पवित्रता लाने जैसे विषयों को अंगीकार करने की आवश्यकता है।
प्रकृति उसी पर प्रसन्न रहती है जो प्रकृति की मर्यादाओं का सम्मान करता है, समूचे संसार में प्रेम, करुणा एवं मैत्री भाव, आत्मवत् सर्वभूतेषु की भावना रखता है। अहिंसा, अपरिग्रह, अनासक्त भाव, निष्काम कर्मयोग और लोकमंगलकारी दिशा-दृष्टि का अवलम्बन ही जीवन को दिव्य, दैवीय एवं आशातीत सफल बना सकता है। इस महान कष्टकारी एवं सर्वथा अप्रिय आपदा से सीखें, समझें और प्रकृति के अनुकूल व्यवहार करें, यही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
