व्यंग्य - रोचकताओं भरी है साहबों की दुनिया


दरबारियों और अफसरों की जितनी अधिक प्रजातियां देश-दुनिया में विद्यमान रही हैं, उसके अनुपात में अफसरों के किस्से और कहानियों की भी भरमार है। रियासती काल और अंग्रेजों के शासन के दौर से लेकर वर्तमान तक इनका जो रुतबा रहा है, वह किसी से छिपा हुआ नहीं है।
इनके रोचक किस्से, कारनामे, हरकतें और करतूतें लोक से लेकर परिवेश और इतिहास तक में समाहित हैं। इन मजेदार कहानियों में हालांकि 80 फीसदी बातें दफन होकर रह जाती हैं, कभी सामने नहीं आ पाती। लेकिन जो बातें किसी न किसी मौके पर सामने निकल आती हैं, उनमें ज्ञान, अनुभवों और तरकीबों का कमाल तो दिखता ही है।
अफसरों के कई सारे रोचक और अविस्मरणीय किस्से होते हैं, जिनके बारे में उनके समकालीन संगी-साथी और परिचित या जानकार गाहे-बगाहे पुरानी बातों को याद करते हुए कभी न कभी प्रस्फुटित कर ही देते हैं।
इस देश में साहबों की जितनी अधिक प्रजातियां हैं उतनी किसी और की नहीं। साहबों के शौक और आदतों का भी अपना रोचक संसार है।
तरह-तरह की आदतों वाले साहबों की चर्चा अक्सर होती रहती है। ये साहब पाँच साला से लेकर साठ साला बाड़े तक के हो सकते हैं अथवा प्राइवेट सेक्टर के भी। कई भाग्यशाली साहब अपनी प्रतिभाओं का कमाल दर्शाते हुए मरते दम तक किसी न किसी ओहदे को धन्य करते रहते हैं और जब ये संसार से विदा लेते हैं तब हर कोई इस एकमात्र शब्द का उच्चारण करना नहीं भूलता - अपूरणीय क्षति।
एक आम आदमी अपनी पूरी जिन्दगी में किसम-किसम के साहबों से रूबरू होते हुए इनके बारे में इतना अधिक सुनता रहता है कि यदि वह लेखक हो तो कई सारी रोचक किताबों का सृजन कर सकता है।
खूब सारे साहबों की श्रेणियों में सर्वाधिक नस्ल उनकी है जो चाय के रसिया होते हैं, इन्हें दिन-रात में कभी भी किसी भी समय और कितनी भी चाय देते रहो, कभी ना-नुकुर नहीं।
प्रेम और आदरपूर्वक चाय स्वीकार करते हुए चाय का सुकून देने वालों का आभार व्यक्त करना नहीं चूकते। इनमें भी कई ऐसे हैं जो कॉफी पसन्द करते हैं।
आम तौर पर अफसरों के बारे में सुना जाता है कि पहले पहल जब तक नए-नए हुआ करते हैं तब सामान्य चाय के शौकीन होते हैं। उसके बाद उनका जेहन कॉफी का रसिया हो जाता है या फिर ग्रीन टी, ब्लेक टी, लेमन टी आदि-आदि।
प्रमोशन पाते हुए जो जितना बड़ा अफसर होता जाता है उसके लिए ब्लेक टी स्टेटस सिम्बोल बन जाती है। फिर हर मौसम में कई तरह का ठण्डा और गरम पीने वालों की भी कोई कमी नहीं देखी जाती।
उत्तरोत्तर ऐसा बदलाव नहीं करें तो संगी-साथी साहबों और वीआईपी, वीवीआईपी के साथ चर्चा की गरिमा और ऊँचाइयों पर ग्रहण लग जाने जैसा अनुभव होता है।
कुछ के बारे में सुना जाता है कि केले ही पसन्द होते हैं और रोजाना भरपेट केले खाने में इन्हें आनन्द आता है। कइयों के बारे में कहा जाता है कि वे गाजर-मूली से लेकर बैगन तक की कच्ची सब्जियां चबाने का शौक फरमाते हैं।
कुछ के बारे में सुना गया कि उन्हें स्टाफ वालों के टिफिन में ही स्वाद आता है, और कुछ तो ऐसे कि मुफ्त का ही चाय-नाश्ता या भोजन मिल जाए तो क्षेत्र और देश की सेवा और अधिक ऊर्जा से करने की ताकत पैदा कर लिया करते हैं। दफ्तर के बजट से आने वाली चाय-कॉफी और नाश्ते में जो रस आता है वह खुद की जेब के पैसों से कभी नहीं आ सकता।
जबकि कुछ साहबों के बारे में सुना जाता है कि वे चने-मूंगफली के बहुत शौकीन होते हैं। बहुत से ऐसे भी देखे गए हैं जो पान-गुटखों और बीड़ी-सिगरेट से ही खुश हो जाते हैं। इसके अलावा ढेरों आदतें हैं जिनका कोई पार नहीं, सभी लोग इनसे वाकिफ हैं मगर कुछ कह पाते हैं, कुछ कभी नहीं। समझदारों के लिए इशारा ही काफी है।
यह साहिबी है ही ऐसी कि खूब सारी आदतें अपने आप पड़ जाती हैं और सुकून भरी सुविधाओं का संसार अपने आप तमाम किस्मों और आकार-प्रकारों के शौक परवान चढ़ा ही देता है।
कुछ को अपवाद मानकर छोड़ दें तो इन सभी की यह खूबी तो गौरवान्वित करने वाली है ही कि ये अव्वल दर्जे के गांधी भक्त हैं और गांधीजी की छवि इन्हें सबसे ज्यादा पसन्द है।
आस-पास के लोग भी व्यवस्था को धक्का देते हुए आगे से आगे खिसकाते रहने वाले इन संवेदनशील, जवाबदेह और पारदर्शी स्तंभों पर भांति-भांति की सुकोमल और मीठी-मीठी, भीनी-भीनी वल्लरियां चढ़ाने में कोई कसर बाकी नहीं रखते।
समझदार लोग तो यहां तक कहते हैं कि सच्चा साहब वही माना जाता है जिसकी तनख्वाह और भत्ते पूरी तरह सेफ रहें, सारा खान-पान और लोक व्यवहार सब कुछ उन कृतज्ञ लोगों की ओर से होना चाहिए जिनकी सेवा पाने के लिए भगवान ने इन्हें तरह-तरह के ओहदों से नवाजा है।
ये परंपराएं फिर उनके परम प्रतापी और अपनी हरकतों के कारण पराक्रमी कहे जाने वाले उनके साहबजादों और अनुचरों से लेकर कमाऊ पूतों तक को भी गौरवान्वित करती रहती हैं।
ऐसे ही खूब सारे बड़े लोग हैं जिनकी कोई न कोई ऐसी आदत होती ही है, और इस वजह से ये महान लोग चर्चाओं में बने रहते हैं। साहबों की महिमा के बारे में जितना अधिक कहा जाए उतना कम है। इसी तरह की स्थितियां मेम साहिबाओं की भी सुनी जाती रही हैं।
ढेरों साहबों की बहुत बड़ी ख़ासियत यह होती है कि वे निरहंकारी होते हैं। खुद कितने ही बड़े साहब हों, लेकिन पूरी नौकरी अपना साहब उन पॉलिटिकल आकाओं को ही मानते रहते हैं जिनके कारण मनचाहे स्थान पर बने रहते हैं और उनके इशारों पर मनमाने काम करते रहते हैं।
इन तमाम हालातों के बावजूद आज भी खूब सारे साहब-साहबियां हैं जो सात्त्विकता के साथ जीते हैं और अपनी पावन देह के लिए जो कुछ खर्च होता है वह अपनी जेब से ही करते हैं। सार यह कि इस विषय पर लेखन और अभिव्यक्ति की अपार संभावनाएं हैं, लेकिन यह एक जन्म में पूरा नहीं हो सकता।
साहब अनन्त, साहबी-कथा अनन्ता।
