दुरात्माओं से बचें, दैवीय शक्तियों का आश्रय पाएं


प्राचीन विद्याओं का प्रयोग मानवता और मर्यादाओं की रक्षा के साथ ही जीवों और जगत के कल्याण के लिए है और इनका सदुपयोग किया जाए तो व्यष्टि से लेकर समष्टि तक महा परिवर्तन लाया जा सकता है। लेकिन वर्तमान काल में पात्रता का कोई ध्यान नहीं रखा जा रहा है इस कारण शक्तियों का दुरुपयोग होने लगा है। अब न गुणग्राही रहे, न गुणों, ज्ञान और अनुभवों को धारण करने योग्य पात्र लोग।
ऎसे में हमारी जिम्मेदारी है कि पात्र व्यक्तियों को ही प्रोत्साहन, मार्गदर्शन, संरक्षण साहचर्य, सम्बल एवं आश्रय प्रदान करें ताकि विश्व कल्याण की धाराओं में हम भागीदार बनकर अपने जीवन को सफल व यादगार बना सकें। इस बार हम बात कर रहे हैं पुरातन विद्याओं, दैवीय कृपा और मनोकामना पूर्ति के लिए किए जाने वाले प्रयोगों की।
जानकार लोगों को चाहिए कि ऎसे किसी व्यक्ति को अपनी उन्नति, बीमारी से मुक्ति, समृद्धि एवं बहुविध ऎश्वर्य प्राप्ति अथवा मनोकामना पूर्ति का कोई टोना-टोटका, प्रयोग, साधना और अनुष्ठान न बताएं जो पात्र न हो, स्वयं कोई साधना - उपासना न करता हो तथा निन्दित कर्मों में रमा रहने वाला हो।
ऎसे लोगों को दैवीय शक्तियों से संबंधित सहयोग करने वाले पाप के भागी होते हैं तथा इन लोगों की नकारात्मकता उन पर आ जाती है जो इन्हें संकट से उबरने के लिए प्रयोग बताते हैं अथवा अपनी संचित दैवीय ऊर्जा का इस्तेमाल इनके लिए करते हैं। इसीलिए कहा गया है - अशिष्याय न देयम्, यो यदि मोहाद्दास्यति स पापीयान्भवति। अर्थात् जो मोह में पड़कर अपात्रों को ज्ञान या दीक्षा देता है वह पाप का भागी होता है।
साधकों के जीवन में अधिकांश समस्याओं, बीमारियों, असाध्य रोगों, अभावों तथा आकस्मिक घात-प्रतिघात व दुर्घटनाओं (अकारण मृत्यु तक संभव है) आदि का मूल कारण यही है। प्रयोग उन्हीं को बताएं जो स्वयं भी अपने स्तर पर ईश्वर की आराधना, साधना करते हों, पवित्र जीवन यापन करने वाले हों, ईमानदार हों, समाज और देश के लिए हितकर हों, जिनके घर वाले और समाज तथा क्षेत्र उनके कर्मों, स्वभाव और व्यवहार से खुश हों। जिनकी कमाई सात्विक हो, भ्रष्टाचार, दुराचार, माँसाहार और नशों से दूर हों।
किसी को भी दुःखों से उबारने और सुख प्रदान करने लायक स्थिति में लाने वाले प्रयोग बताने से पूर्व पात्रता की हर तरह से जांच करनी जरूरी है अन्यथा कुपात्र को ज्ञान, प्रयोग और शक्तियों का दान या शक्तिपात करने से वे लोग समाज और राष्ट्र के लिए घातक सिद्ध होते हैं और इसका सीधा पाप उसी को लगता है जो इन्हें आश्रय, प्रश्रय और सीख देता है, मंत्र-तंत्र या यंत्र आदि साधनाओं की दीक्षा देता है, टोने-टोटके बताता है।
प्रकृति विरूद्ध या भाग्य से अधिक प्राप्त करने के लिए स्वयं जातक का परिश्रमी होना जरूरी है। आजकल लोग भ्रष्टाचार, आसुरी वृत्तियों और दूसरों को दुःखी करने, सम्पत्ति और जमीन-जायदाद हड़पने, वशीकरण करके अपने हित साधने और अनुचित कर्मों व अवैध इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए टोने-टोटकों और तंत्र-मंत्र का सहारा लेने में पीछे नहीं हैं।
समाज की दुरावस्था, दुष्टों की प्रभाववृद्धि और सज्जनों की शक्तिहीनता के साथ ही प्रदूषित माहौल का होना इसी का परिणाम है। इसलिए पात्रता और लक्ष्य की पवित्रता को ध्यान में रखकर ही किसी को कोई उपाय बताएं अन्यथा ये उपाय हम पर ही उल्टे पड़ते हैं क्योंकि प्रकृति किसी को नहीं छोड़ती। हर क्रिया की प्रतिक्रिया उन सभी को भुगतनी पड़ती है जो कि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ऎसे कर्मों में जुटे हुए हैं।
अच्छा हो कि साधना या उपाय बताने से पूर्व ऎसे लोगों को सर्वांग शुचिता प्राप्ति के लिए कहें और पवित्रता लाने के लिए सभी जरूरी उपाय करने पर बल दें। आजकल मैली विद्याओं का इस्तेमाल और प्रभाव सर्वाधिक हो रहा है। इनका प्रभाव क्षणिक होता है किन्तु असर जल्द करती हैं।
हालांकि जो लोग सात्विक उपासना करते हैं उन पर इनका केवल आभासी प्रभाव ही पड़ता है और निर्धारित अवधि के उपरान्त अपने आप समाप्त हो जाता है। आजकल जो लोग नास्तिक हैं या केवल कामनापूर्ति अथवा संकट निवारण, बीमारी को दूर करने आदि परिस्थितियों में ही साधना, भक्ति और भजन-पूजन करते हैं उनकी साधना या भजन-भक्ति का प्रभाव संचित कभी नहीं रहता। ये लोग खोखर या खोखले होते हैं।
दूसरी ओर जीवात्मा हर दिन ढेर सारे ज्ञात-अज्ञात पाप, हिंसा और व्यभिचार करता रहता है। इन सभी का पाप अपने आभा मण्डल(ओरा) में पसरता रहता है, इससे हमारे शरीर के भीतर का पाप पुरुष निरन्तर पुष्ट और प्रभावकारी होता रहता है। हमारे स्थूल शरीर के इर्द-गिर्द पूरी परिधि में पापों का इतना अधिक आयतन सूक्ष्म शरीर अथवा ओरा में बढ़ता रहता है कि हमें पता ही नहीं चलता कि हमारे आयतन से कई गुना अधिक पापों का आयतन और घनत्व हम साथ लेकर चल रहे हैं।
इस स्थिति में किसी भी तरह की नकारात्मक क्रिया का हम पर जल्दी असर होता है और जीवन भर परेशानियों, संकटों, बीमारियों, अभावों और समस्याओं से घिरे रहते हैं। इस अवस्था में हम चाहे कितना अधिक जप-तप, माला, भक्ति, साधना इत्यादि कर लें, इसका कोई प्रभाव नहीं होता। क्योंकि अपने पापों की अपेक्षा अर्जित पुण्यों का स्तर अत्यल्प होता है।
यह केवल अपने मन को समझाने की बात है क्योंकि साधना अपने चित्त और शरीर की शुद्धि कर पवित्रता के उस स्तर तक लाने का प्रयास करती है जिसमेें शुचिता इतनी अधिक पूर्णता प्राप्त कर ले कि पापों से पूरी मुक्ति हो जाए, तभी परमात्मा की कृपा, विभूति, साक्षात्कार अथवा सिद्धि प्राप्ति का अनुभव हो सकता है।
रोजाना जुड़ते जा रहे हमारे पापों के पहाड़ों के आगे मामूली साधना, भक्ति और पूजा-पाठ का कोई असर नहीं होता। यह ऊँट के मुँह में जीरे या पहाड़ों के बीच राई के बराबर ही है। अब स्थितियां यह हो गई हैं कि अभिचार के मामले में कहीं कोई मर्यादाएं रही ही नहीं।
बीते जमाने में कर्मकाण्ड और तंत्र-मंत्र के जानकार विद्वान उन्हीं की पूजा या अनुष्ठान स्वीकारते थे जो लोग भद्र एवं समाज व क्षेत्र के लिए उपकारी होते थे अन्यथा स्पष्टतया इंकार कर देने में कभी पीछे नहीं रहते, चाहे कोई कितना ही बड़ा आदमी हो या फिर सत्ताधीश।
पर आजकल पैसों व प्रतिष्ठा के लोभ अथवा अवैध कुकर्मों के संरक्षण और अपराध बोध पर आवरण चढ़ाए रखने के फेर में हम लोग भ्रष्टाचारियों, व्यभिचारियों और असामाजिक तत्वों तक की रक्षा और खुशहाली के लिए पूजा-पाठ और अनुष्ठान करने से गुरेज नहीं रखते। यह भी हमें नरकगामी बना रहा है।
लोग धर्म से विमुख होकर अर्थप्रधान होते जा रहे हैं और इसलिए उनके जीवन का एकमेव लक्ष्य यही रह गया है कि किस प्रकार अकूत धन-सम्पदा, परायी जमीन-जायदाद और सारा वैभव शोर्ट कट से अथवा अनुचित दबावों और अभिचारों का सहारा लेकर अपने नाम किया जाए।
ऎसे में सभी तरह के धूर्त मक्कारों और पुरातन विद्याओं का दुरुपयोग करने वालों की कहीं कोई कमी नहीं है। यों कहा जाए कि अभिचारों का यह बिजनैस हर तरफ गोपनीय रूप से फल-फूल रहा है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
लोग बिना वजह अपने तुच्छ स्वार्थों को पूरा करने-कराने के लिए किसी न किसी के पीछे पड़े हुए हैं। कुछ लोग तो धरती पर ऎसे पैदा हो गए हैं कि जिनके जीवन का मकसद ही सज्जनों, कर्मयोगियों और जमाने भर को तंग करना और धींगामस्ती करते हुए लूट खाना ही है। इन्हें न पढ़ाई से सरोकार है, न किसी काम-धंधे से। एकसूत्री यही काम है कि ब्लेकमेलिंग और दादागिरी करके कमा-खाओ, मुफत का माल उड़ाते रहो और खुद को सब जगह सायास जबरन प्रस्तुत करते रहो।
अपने दस रुपए के फायदे के लिए औरों का लाखों रुपयों का नुकसान करने में भी उन्हें कोई शर्म नहीं आती। इस धंधे में जमा पूंजी कुछ भी नहीं लगानी पड़ती, हींग लगे न फिटकरी, रंग चोखा का चोखा। फिर लोकप्रियता के साथ लोगों में भय भी घुसा रहता है और बिना कोई मेहनत किए मामूली टोनों-टोटकों से ही काम बनने-बिगाड़ने का खेल जारी रहता है।
व्यभिचारी, माँसाहारी और शराबी भूत-प्रेतों और बुरी आत्माओं को भी इन लोगों से मनचाहा स्वाद और सुगंध पाने में आसानी रहती है, इसलिए ये भी इनके संगी-साथी होकर दुष्टों को सहयोग करने में पीछे नहीं रहते।
इन मौजूदा तमाम हालातों में सज्जनों के लिए यह बहुत जरूरी हो चला है कि किसी न किसी देवी-देवता का ईष्ट रखें और रोजाना एक-डेढ़ घण्टा जप-तप एवं पूजा के माध्यम से अपने लिए निकालें ताकि उनका सूक्ष्म शरीर कवच के रूप में विकसित और उत्तरोत्तर परिपुष्ट होता रहे और दुष्ट विद्याओं के प्रभाव से बचे रह सकें।
अन्यथा हम कितने ही सज्जन, ईमानदार और अच्छे क्यों न हों, समाज में दुष्टों, हरामियों, हरामखोरों और बिना मेहनत के सब कुछ हासिल कर मौज उड़ाने वालों की कोई कमी नहीं है। और न ही कोई कमी है इन्हें आश्रय-प्रश्रय देने वाले संरक्षकों, संगी साथियों, टोने-टोटकेबाजों, मांत्रिकों और तांत्रिकों की अथवा मैली विद्याओं से धन कमाने में भिड़े हुए माहिर मदारियों और जमूरों की।
यह तय मान कर चलें कि दैवीय कवच और आध्यात्मिक अर्थिंग के बिना इस जमाने में कोई अपने अस्तित्व की रक्षा नहीं कर पाएगा, एक न एक दिन बल्ब फ्यूज होने ही हैं। हमारे आस-पास खूब सारे उदाहरण हैं जिनमें इस बात को चरितार्थ होते हुए देखा जा सकता है।
शाश्वत सत्य यही है कि सारे भयों, प्रलोभनों, अवैध कामनाओं और आलस्य को छोड़कर अपने व्यक्तित्व को आध्यात्मिक पॉवर के जरिये दैवीय एवं दिव्य बनाने का प्रयास करें, सूक्ष्म शरीर को अभेद्य कवच में रूपान्तरित करें और जीवन के मर्म को समझते हुए मानवीय मर्यादाओं और धार्मिक सदाचरणों का परिपालन करें। जीवन में जितनी अधिक सात्विकता और शुचिता होगी, उतना लक्ष्यों में आशातीत सफलता, स्थायी समृद्धि, आत्मतोष, आनन्द और सुकून का अनुभव होता रहेगा।
