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साहित्य
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पेढ़ियों पर बिराजमान संकटमोचक

Deepak Acharya
Deepak Acharya
September 10, 2021
पेढ़ियों पर बिराजमान संकटमोचक

दुनिया की बहुत सी आबादी फुरसत या बतंगड़ी का समय किसी न किसी दुकान, प्रतिष्ठान या किसी भवन की सीढ़ियों-पेढ़ियों पर बैठकर बिताती है। आम तौर पर यह दृश्य उस समय हर कहीं देखने को मिलता है जब बाजार बन्द हो जाते हैं और कारोबारी शटर डाउन करके अपनी राह लेते हैं।

गांवों, कस्बों और शहरों से लेकर तकरीबन तमाम महानगरों तक देर शाम से लेकर रात तक यह नज़ारा आम है। खूब सारे लोग किसी न किसी दुकान की पेढ़ी के आगे बैठकर गपियाते हुए मिल ही जाएंगे।

और यह बैठक किसी थकान या मजबूरी में नहीं होती बल्कि फुरसतिया आनन्द पाने और बतियाने के मनोरंजन से भरी होती है, जहाँ हर कोई उन्मुक्त होकर घर-परिवार से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय और ब्रह्माण्ड तक की बातों में रस लेता हुए मग्न हुआ रहता है।

अधिकांश लोग दिन भर के काम-काज से रिलेक्स होने के लिए इन पेढ़ियों पर संगी-साथियों के साथ बैठने की आदत पाल लेते हैं। खूब सारे लोग हैं जिनके लिए देर रात तक पेढ़ियों-सीढ़ियों पर बैठकर गपियाना किसी नशीली तलब से कम नहीं होता।

इनके घर वाले भी इनकी इस तलब के मारे परेशान रहा करते हैं। और कुछ फीसदी के घर वाले यह समझ कर खुश हो जाते हैं कि चलो कुछ घण्टे तो घर-परिवार में सुकून रहेगा। पर अधिकांश मामलों में घर वाले इस तलब से नाखुश ही नज़र आते हैं।

पेढ़ियों पर पसर कर गपियाने में रमे रहने वाले बतरसिया भले ही रोजाना कई घण्टों जमे रहकर दुनिया जहान की चर्चाओं का आनंद क्यों न लेते रहें, मगर इन पेढ़ियों पर सम्मान और स्वाभिमानपूर्वक बिराजते हुए प्रतिष्ठा का अनुभव करने वाले अधिकांश लोग इन पेढ़ियों (सीढ़ियों) का पूरा का पूरा नकारात्मक प्रभाव अपने साथ घर ले आते हैं। न केवल दुकानों की पेढ़ियां बल्कि सार्वजनिक स्थलों, सर्कलों, चौराहों पर अवस्थित सीढ़ियों और पेढ़ियों पर भी यहीर् स्थिति देखी जाती है।

रोजाना यही क्रम जारी रहने से इनके घर-परिवार में नकारात्मक भावों और तत्वों का जमावड़ा बढ़ता रहता है और यह इनकी सेहत और घर की खुशहाली को दुष्प्रभावित करता है, समस्याओं और अभावों को पैदा करता है और इससे खूब सारे अनिष्टकारी प्रभाव सामने आते रहते हैं।

होता यह है कि जिन दुकानों और प्रतिष्ठानों की सीढ़ियों/पेढ़ियों पर ये लोग बैठते हैं, उन पर दिन भर असंख्य लोग अपने जूते-चप्पलों की गंदगी और स्वयं का नकारात्मक प्रभाव लेकर आते हैं और काफी समय तक खड़े रहते हैं।

ऎसे में इन सीढ़ियों पर रोजाना खूब सारा नकारात्मक प्रभाव और सूक्ष्म प्रदूषण जमा हो जाता है जिसे पेढ़ियों पर बैठकर विश्व भर की चर्चा और समीक्षा में माहिर ये लोग अपने साथ घर ले जाते हैं और इस तरह रोजाना ये लोग नकारात्मक तत्वों का मुफ्त में आयात करते रहते हैं। जिससे इनकी नकारात्मकता में उत्तरोत्तर अभिवृद्धि होती रहती है।

यह स्थिति सूक्ष्म से लेकर स्थूल तत्वों की नकारात्मकता को बढ़ाती है। इससे संक्रमण का भी खतरा बना रहता है क्योंकि दिन भर की कुल जमा गंदगी के सूक्ष्म तत्व उनके साथ लग जाते हैं। दुकानदारों और प्रतिष्ठानों वालों को पेढ़ियों पर बैठने वाले इन तमाम लोगों के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए जो कि उनकी दुकान के सूक्ष्म नकारात्मक प्रभावों को अपनी बैठकों के साथ ही वहाँ से हटाकर अपनी झोली में भर ले जाते हैं।

पेढ़ी पर बैठने वालों के कारण इनके कारोबार को भी उन्नति प्राप्त होती है क्योंकि कारोबार के दिन भर के नकारात्मक तत्वों का ये लोग परिवहन कर अपने साथ ले जाते हैं और इस तरह दुकानों की सकारात्मक ऊर्जा का असर बना रहता है। इनके इस अकथनीय एवं परोक्ष योगदान को भूला नहीं जा सकता। इसके लिए कारोबारियों को चाहिए कि इनका साल- छह महीने में सम्मान करने की परिपाटी डाले, कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए इन्हें पुरस्कृत करें और तहेदिल से इनका आभार व्यक्त करें।

आजकल हर तरफ बाजार बन्द होने के बाद से लेकर देर रात तक पेढ़ियों पर बैठने वालों की भरमार रहने लगी है। इन्हें पेढ़ियों पर बैठकर चर्चा करने में जितना आनंद आता है, उतना न घर में आता है, न और कहीं।

धन्य हैं पेढ़ियों पर बैठकर निष्काम भाव से अपेक्षा मुक्त परोपकार करने वाले सारे लोग। इससे हमारी अर्थव्यवस्था को भी सम्बल मिल रहा है और स्थानीय कारोबार भी पल्लवित-पुष्पित और फलित हो रहा है। इन तमाम उपकारी जीवात्माओं का आभार जताना न भूलें।