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कोरोना काल - अग्नि परीक्षा

Deepak Acharya
Deepak Acharya
April 25, 2021
कोरोना काल - अग्नि परीक्षा

मौजूदा समय इंसानों के लिए कठोरतम और निर्णायक अग्नि परीक्षा का महा काल है। चाहे वह कर्मभूमि भारत हो या फिर भोग भूमि पाश्चात्यों के देश। सब तरफ अशान्ति, उद्विग्नता और महामारी का ताण्डव दिख रहा है।
पिछले डेढ़-दो साल से यह सब चल रहा है। न्यूनाधिक रूप में समूचा विश्व इन हालातों से त्रस्त है और इससे उबरने का कोई ठोस एवं सटीक रास्ता नहीं दिख रहा। हालांकि चौतरफा गंभीर प्रयास निरन्तर जारी हैं किन्तु कोरोना से निर्णायक मुकाबले का कोई ब्रह्मास्त्र अब तक कोई नहीं खोज पाया है।
प्रकृति और परमेश्वर ने इंसानों के लिए जाने ये कैसी चुनौतियाँ उछाल दी हैं कि हर कोई चिन्तित और असुरक्षित महसूस करने लगा है। ऎसा नहीं है कि यह वर्तमान सदी का ही ताण्डव हो। इतिहास बताता है कि हर सदी में कभी न कभी तो ऎसा होता ही है कि जब प्रकृति कुछ न कुछ ऎसा कहर ढा ही देती है कि विध्वंस का अनचाहा इतिहास बन जाता है जो दशकों तक दंश का अहसास कराता रहता है।
पिछले कुछ समय से इसी तरह की स्थितियां हमारे सामने हैं जिन्हें देख-सुन और भोग कर हम सभी लोग दुःखी और खिन्न हैं और बार-बार यही सोचते रहते हैं कि आखिर कब मुक्त होंगे हम इन अप्रिय हालातों से।
यह अग्नि परीक्षा कई तरह से हमारे सामने है। इंसान के रूप में हम अपने आपको कितने फीसदी सही मानते हैं, कितनी मानवता और संवेदनशीलता हममें शेष बची है, हम कितने आदर्शवान, नैतिक मूल्यों को अपनाने वाले और जीवों तथा जगत के प्रति दयालु हैं, इस बारे में कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है।
अपने-अपने परिधानों में हम सभी नंगे हैं। और साथ ही भूखे-प्यासे भी। खूब सारे लोग तो जाने कितने जन्मों से कुंभकर्ण की तरह ही बने हुए हैं। बेशर्मी से भरपूर अपने नंगेपन का अहसास हम गाहे-बगाहे कराते भी रहे हैं।
स्वाभिमान, मूल्यों, मानवीय संवेदनाओं और इंसानियत के सारे कारकों को ताक में रखकर हम जो कुछ कर रहे हैं वह न हमारी आत्मा से छिपा हुआ है और न ही जमाने से।
आज हम सब कोरोना को दोष देने में मुखर होकर चिल्लपों मचा रहे हैं। लेकिन हमने कभी यह नहीं सोचा कि धरती पर हमारे कारण से कितना पाप, अनाचार, अत्याचार, व्यभिचार, लूट-खसोट और हर तरह का भ्रष्टाचार बढ़ गया है।
इस कारण से पृथ्वी पर पापों का अपरिमित बोझ बढ़ चुका है। एक इंसान दूसरे को दुकान समझ रहा है, वस्तु मान रहा है और चरम स्तर का शोषण करने को आमादा है। इंसान को ही क्यों, धरती के सारे दूसरे प्राणियों के जीने और रहने के हकों को हमने मार दिया है, बेजुबान जानवरों की निर्मम हत्या और माँसाहार को अपना लिया है, दारू, गुटखा, नशा अपना लिया है, हर कहीं मुफ्तखोरी और हराम की कमाई तथा औरों के पैसों से खान-पान की आदतों के साथ ही उन सभी बुराइयों को हमने भीतर तक अंगीकार कर लिया है।
हम इतने अधिक पराश्रित और परजीवी हो चले हैं कि हमारा अपना कुछ नहीं रहा। हमारे शरीर का लहू, माँस, अस्थियां-उपास्थियां आदि सब कुछ परायों के खान-पान और पैसों से निर्मित है और ऎसे में हमारा दिल और दिमाग उसी मिश्रित कचरे का अर्क ग्रहण कर इतना अधिक प्रदूषित और मलीन हो चला है कि हमें हर पल यही लगता है कि हम जो सोच रहे हैं, जो कुछ कर रहे हैं, वही संसार का सत्य है और यही सब दूसरे लोगों को करना ही चाहिए।
इस मामले में हम दुराग्रहों और पूर्वाग्रहों का सडान्ध भरा पोखर ही बने हुए हैं। प्रकृति वही सब लौटाती है जो उसे हम देते हैं। ऎसे में आज कोरोना के भीषण और भयावह हालातों में हम सभी को सोचना होगा कि हमने आखिर क्या दिया है प्रकृति को पिछले दशकों में।
वृक्षों और जीवों की हत्या, धरती का उत्खनन और शोषण, क्रूरता, हिंसा, भ्रष्टाचार, असत्य, हत्या, प्रताड़ना, लूट-खसोट, व्यभिचार, अन्याय, अत्याचार, कचरा, प्रदूषण, प्लास्टिक, अप्राकृतिक कुकर्म और वह सब कुछ उण्डेला है जो मनुष्य को अपनी पूरी जिन्दगी में कभी नहीं करना चाहिए।
हमने जमीन-जायदाद पर अधिकार जमाने, सत्ता और अधिकारों के उन्मुक्त बेलगाम दुरुपयोग, धींगामस्ती, भोग-विलास और स्वेच्छाचार के सिवा क्या दिया है प्रकृति को।
हमने इंसान के रूप में पैदा होकर प्रकृति और परमेश्वर का भरपूर अपमान किया है जिन्होंने इस धरा पर सुगंधित फूल के रूप में दुनिया को महकाने के लिए हमें भेजा था। और हम कर क्या रहे हैं।
आज सभी लोग दोष दे रहे हैं कोरोना को। कोई अपने भीतर झाँक कर देखने का ईमानदार साहस नहीं कर पा रहा है। हममें इतनी हिम्मत है भी नहीं कि हम अपने दुर्गुणों और जीवन के कर्मों का हिसाब लगा सकें।
जिस दिन हम अपने आपका मूल्यांकन करना आरंभ कर देंगे, पापों और कुकर्मों का प्रायश्चित करने लगेंगे, इंसान के रूप में पैदा होने के उद्देश्य को समझ लेंगे, तभी से प्रकृति भी हमारी सहयोगी बन जाएगी और परमात्मा भी।
पूरी जिन्दगी हम काम तो कर रहे हैं प्रकृति और परमेश्वर की मंशा के विपरीत, और कामना करते हैं कि सुख-समृद्धि, आनंद और आत्मतोष प्राप्त हो, ये दोनों विरोधाभासी बातें हैं और कभी पूर्ण होनी संभव हैं ही नहीं।
अब भी समय है। मन, कर्म और वचन से पूर्ण शुचिता लाएं, सुधार लाने की दिशा में आगे बढ़ें, अपने पापों और कुकर्मों के लिए प्रकृति और भगवान के साथ ही उन इंसानों से भी माफी मांगें, जिन्हें हमने बेवजह परेशान करते रहने की आदत पाल ली है, तभी कुछ सकारात्मक बदलाव संभव है। अन्यथा अब हालात बेकाबू हो ही गए हैं।
अब न प्रकृति मानने वाली है, न परमेश्वर। अभी तो केवल ट्रेलर है। भगवान न करे हमारे पापों की सजा उन बेचारे सज्जनों को मिले, जो समाज और देश के लिए समर्पित होकर जी रहे हैं, जिओ और जीने दो के सिद्धान्तों पर चल रहे हैं और जिनका रहना दुनिया के लिए बहुत जरूरी है।
हम पापियों के रहने या न रहने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला क्योंकि यों भी हमारी न तो कोई उपयोगिता रही है, और न ही औचित्य। बल्कि हमसे मुक्त होकर दुनिया सुखी और निश्चिन्त ही होगी।
आत्म अनुशासन और आत्मसंयम के साथ धैर्य अपनाएं। खुद भी सुरक्षित रहें और दूसरों के सुरक्षित जीवन के प्रति भी संवेदनशील रहें। अब भी समय है, सुधरने और सँवरने का, वरना अब न किसी से कुछ कहने का मौका मिलेगा, न पश्चाताप का।