खरी-खरी - नाम और फोटो न आए तो चाय न भाए


खूब सारे ऐसे लोगों की हर तरफ भरमार है जिनका दिन ही तब शुरू होता है जब अखबारों में न्यूज और फोटो दिखे। अन्यथा नींद उड़ती नहीं, इन्हें लगता है कि आज सूरज उगा ही नहीं। इनके लिए वे दिन काले दिन के रूप में रहते हैं जिस दिन फोटो और खबर न हो।
चाय और नाश्ते का मजा भी तभी आता है कि जब पब्लिसिटी का कोई न कोई मुफतिया प्रसाद सामने हो अन्यथा सारा मजा किरकिरा। इनमें हर किस्म के लोग हैं जिन्हें सुरसा और कुंभकर्ण की तरह भूखा-प्यासा माना जाता है। लगता है सदियों से भूखे-प्यासे हैं।
हर क्षेत्र में ऐसे कम से कम शताधिक लोग तो होते ही हैं जिनकी तमन्ना यही रहती है कि रोजाना उनकी कोई न कोई खबर और फोटो तो जरूर छपनी ही चाहिए। और ऐसा किसी दिन न भी हो पाए तो कम से कम नाम का जिक्र तो होना ही चाहिए ताकि तसल्ली से दिन अच्छा गुजर जाए।
वह दिन इनके लिए शोक का होता है जिस दिन इनका कहीं जिक्र न आए। घूम-फिर कर हर बार एक ही एक तरह के चेहरे अखबारों में खबरों के साथ मण्डराते रहते हुए दिखते हैं।
इस किस्म के लोग भले ही अलग-अलग दड़बों, तबेलों, कबीलों, गिरोहों और समूहों संस्थाओं में हों लेकिन उत्सवी आयोजन और पब्लिसिटी बटोरने वाले कामों में इन सभी का सामूहिक योगदान किसी मिशन भावना से कम नहीं होता। सभी का एकमेव ध्येय यही रहता है कि उन्हीं का प्रशस्तिगान होता रहे।
फिर लगातार पब्लिसिटी के सम सामयिक फण्डों में महारत हासिल करने वालों को यह अच्छी तरह पता हो ही जाता है कि खबरों और फोटो में बने रहने के लिए पोजीशन और हथकण्डे क्या होने चाहिएं। इनका मीडिया मैनेजमेंट भी किसी से छिपा हुआ नहीं होता।
फिर इनमें हर किस्म के लोगों के साथ बाबा लोग भी साथ हो चले हैं जिन्हें अपने भक्तों पर प्रभुत्व जमाने और भक्त श्रृंखला का साम्राज्य विस्तार करने के लिए भी पब्लिसिटी और प्रोपेगण्डों का सहारा चाहिए होता है। इसे ही कहा गया है - परस्परोपग्रहोपजीवानाम्।
जीवन के सम सामयिक संत्रासों, अभावों और समस्याओं से पीड़ित जनमानस को उत्सवी आयोजनों के जरिये क्षणिक मनोरंजन और उल्लास के सिवा और क्या चाहिए।
भीड़ और भाड़ से लेकर भाड़े वाले सारे लोग मिलकर कुछ न कुछ ऐसा करते रहते हैं जिनसे साल भर उनका नाम होता रहे, फोटो और खबरों में छाए रहें। हर क्षेत्र में ऐसे लोगों का वर्चस्व और आयतन बढ़ता ही जा रहा है।
इन लोगों से क्षेत्र में कोई दीर्घकालीन स्थायी महत्व के काम कभी नहीं होते। न ये करना चाहते हैं। इन्हें अच्छी तरह पता होता है कि इससे उनका समय, धन और परिश्रम व्यर्थ जाएगा और जो अभी मिल रहा है उतना मिल नहीं पाएगा।
इनके जीवन का एक सूत्री एजेण्डा यही रहता है कि जिस तरह भी हो सके उनकी प्रतिष्ठा और लोकप्रियता बरकरार रहे और इसीलिए वे रहकर कुछ न कुछ उत्सवी आयोजन करते रहते हैं जिनका कोई धार्मिक, सामाजिक और परिवेशीय महत्व नहीं होता।
इसी कारोबारी मानसिकता के चलते विभिन्न क्षेत्रों में परम्परागत धर्म-अध्यात्म, लोक संस्कृति और परंपराओं के स्थान पर नए-नए आयोजन और उत्सव जुड़ते जा रहे हैं। समाजवाद को पोषण देने वाले इन आयोजनों में टैण्ट, माईक, केटरर्स से लेकर सभी प्रकार के कारोबारी निहाल हो जाते हैं इसलिए इन सभी का तगड़ा गठबंधन हमेशा बना रहता है।
हम सभी का परम कर्तव्य है कि नाम और खबरों से लेकर लोकप्रियता के आकांक्षी ऐसे लोगों के लिए हर बार कोई न कोई अवसर उपलब्ध कराते रहें ताकि ये इनके सहारे जिन्दा रह सकें और हर क्षेत्र में रचनात्मक गतिविधियों के माध्यम से जीवन्तता बनी रह सके। गरीबों की सुनों, वो तुम्हारी सुनेगा....।
