वागड़ की मौलिक साँस्कृतिक पहचान का संरक्षण जरूरी


भौगोलिक दृष्टि से तीन राज्यों की पहाड़ियों का स्पर्श करता, माही की रसधार से आप्लावित और नैसर्गिक रमणीयता की बदौलत दुनिया में अन्यतम पहचान रखने वाला वागड़ अपनी जड़ों से कटने लगा है और मौलिक संस्कृति की गंध कहीं खोती जा रही है।
भौतिक विकास की दृष्टि से नॉन स्टॉप बढ़ने वाले वागड़ में सांस्कृतिक परम्पराओं और सामाजिक रस्मों-रिवाजों की मिठास और भारीपन अब नज़र नहीं आता। आधुनिकता की चकाचौंध में पुरातन परम्पराओं को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है और लोक संस्कृति के आदर्शों की ठण्ढी हवाएं लू के रास्ते बढ़ने लगी हैं।
नई पीढ़ी को वागड़ की लोक संस्कृति, विरासतों, मौलिक फक्कड़ दृष्टि और जीवन माधुर्य के पारंपरिक रंगों और रसों से साक्षात कराने की आवश्यकता है। संस्कृति की पुरातन जड़ों को सिंचने के साथ ही वागड़ की लोक परम्पराओं को सहेजने के लिए मिल जुलकर प्रयास करने की जरूरत है।
कला-संस्कृति और पर्यटन विकास के लिए हमारी सरकारें खूब काम कर रही हैं लेकिन वागड़ मूल के जागरुक लोगों, संस्थाओं और बुद्धिजीवियों को भागीदारी निभाने के लिए आगे आने की जरूरत है तब ही वागड़ को चरम विकास के साथ ही मौलिक साँस्कृतिक गंध से भरा-पूरा रखकर लोक जीवन में माधुर्य रसों और सुनहरे रंगों की वृष्टि हो सकती है।
व्यष्टिपरकता को छोड़कर समष्टिवादी व्यक्तित्व अपनाने की जरूरत है। उन कारकों को भी जड़-मूल से समाप्त करना होगा जो वागड़ की परम्पराओं और अस्मिताओं को अक्षुण्ण बनाए रखने के प्रयासों में कैक्टस बने हुए हैं।
वागड़ की पहचान और मौलिक विरासतों के अस्तित्व पर खतरा मण्डरा गया है। अब समय आ गया है जब वागड़ के प्रबुद्धजनों को वागड़ अंचल की पुरातन थातियों तथा सांस्कृतिक एवं मौलिक परम्पराओं के संरक्षण और संवर्द्धन के लिए सामूहिक एवं समर्पित प्रयासों के साथ आगे आना चाहिए।
वागड़ अंचल में प्राकृतिक सौन्दर्यपूर्ण प्राचीन स्थलों, नैसर्गिक मनोहारी परिवेश, प्राचीन शिल्प स्थापत्य, प्रचुर जल संपदा भरे जलाशयों की श्रृंखला, मौलिक सांस्कृतिक परम्पराएं और वह हर कारक मौजूद हैं जिनके बूते वागड़ को दुनिया के पर्यटन मानचित्र पर स्थान दिलाया जा सकता है।
इनके लिए सार्थक प्रयास सामाजिक और संस्थाओं के स्तर पर भी होने चाहिएं ताकि यह क्षेत्र उपेक्षित न रहे और पर्यटन के सर्किट व रूट्स से सीधा जुड़ सके।
पर्व-त्योहारों और धार्मिक गतिविधियों के नाम पर वागड़ अंचल के जनजीवन में आ धमकी बुराइयों को समाप्त करने की ओर ध्यान दिया जाना जरूरी है क्योंकि सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश में पिछले कुछ समय से होते जा रहे कई नवीन प्रयोग वागड़ के लिए बेहद खतरनाक हैं।
वागड़ अंचल में लोक संस्कृति और सामाजिक परंपराओं से जुड़ी नदियांे और तालाबों के किनारे होने वाली रस्मों के अस्तित्व की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाए जाने जरूरी हैं।
हर साल अनन्त चतुर्दशी पर बड़ी संख्या में प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियों के जलाशयों में विसर्जन की बुराई को रोकने का दायित्व वर्तमान पीढ़ी का है। इससे जल प्रदूषण बढ़ता है और जलीय जीव-जन्तुओं का जीवन खतरे में पड़ने के साथ ही पेयजल और सिंचाई के लिए साफ पानी नहीं मिल पाता है। इस घातक जलीय प्रदूषण से पशुओं और मनुष्यों के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर होता है। इसके साथ ही जलाशयों में मिट्टी भरते रहने से जलस्तर पर भी खराब प्रभाव पड़ता है।
इस ज्वलन्त मुद्दे पर लोक जागरण किया जाकर जलीय प्रदूषण पर पाबंदी जरूरी है। प्लास्टर ऑफ पेरिस की बजाय मिट्टी की मूर्तियां बनाये जाने का विधान है और ये मूर्तियां भी सीमित मात्रा में स्थापित होनी चाहिएं। इससे जलीय प्रदूषण कम होगा और स्थानीय कुम्हारों को रोजगार मिलेगा। इससे वागड़ का पैसा वागड़ में ही गरीबी दूर करने पर खर्च होगा।
वागड़ अंचल की समृद्धि और यहां के गरीबों के उत्थान के लिए यह जरूरी है कि स्थानीय उत्पादों के इस्तेमाल की आदत फिर से पैदा हो ताकि स्थानीय घरेलू लघु उद्योग-धंधों और ग्राम्य स्वरोजगार को बढ़ावा मिले तथा यहां के लोगों को कमाने के लिए बाहर न जाना पड़े। इसके लिए यहां के पर्व-उत्सवों, मेलों-त्योहारोें में पहले की ही तरह स्थानीय उत्पादों के प्रयोग को बढ़ावा दिए जाने की जिम्मेदारी वागड़ अंचल के लोगों की है।
प्राचीन स्मारकों, किलों, मन्दिरों, छतरियों, महलों, मठों आदि की जानकारी एकत्रित कर दस्तावेजीकरण और इनके संरक्षण तथा विकास के साथ ही प्रचार-प्रसार के लिए विशेष कार्ययोजना बनाने की जरूरत को भी हमें समझना होगा। यहां का अमूल्य साहित्य आज भी बिखरा पड़ा हुआ है और इसे संग्रहित करने के साथ ही विषयवार दस्तावेजीकरण और प्रकाशन जरूरी है। इस काम के लिए साहित्यचिन्तकों के आगे आने जरूरत महसूस की जा रही है।
अन्य क्षेत्रों के मुकाबले अपार संपदाओं व संभावनाओं के धनी होने के बावजूद वागड़ के स्वस्थ पर्यटन विकास में कमी के पीछे मानसिकता और समर्पण की भावना तथा स्थानीय लोगों में जागरुकता एवं इच्छाशक्ति का अभाव प्रमुख कारण हैं।
वागड़ की विरासतों की अब अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। इसके लिए सभी संबंधितों के साथ ही जनता के स्तर पर समाजों, संस्थाओं और सभी विद्वजनों को आत्मकेन्द्रित प्रवृत्ति छोड़कर एक साथ जुटना होगा।
नई पीढ़ी को वागड़ की परम्पराओं, संस्कृति, कला-स्थापत्य शिल्प वैभव, इतिहास और मौलिकताओं से परिचित कराने के लिए प्रचार-प्रसार, लेखन, ग्रंथ प्रकाशन और कार्यशालाओं आदि पर ख़ास जोर दिया जाना चाहिए।
