
हम सभी लोग चाहते हैं कि जीवन में जो कुछ हो वह हमारा मनचाहा ही हो, अनचाहा कभी न हो। लेकिन यह तभी संभव है कि जब हम मनुष्य के रूप में अपने निर्धारित दायरों और औकात में रहें, अपनी मर्यादाओं का पूरा-पूरा पालन करें और उन परंपरागत मूल्यों और शाश्वत सिद्धान्तों के साथ जिएं जो इहलोक और परलोक में भी जीवात्मा के लिए कल्याणकारक हैं।
पर ऎसा हो नहीं रहा। हमारी मुफ्तखोरी और जिन्दगी भर पराश्रित रहते हुए किसी न किसी पर निर्भर रहने और परजीवियों की तरह व्यवहार करने की आदत ही ऎसी पड़ गई है कि हम प्रत्यक्ष तौर पर इसे लाभ के रूप में देखते हैं लेकिन सच यह है कि परोक्ष रूप में यह हानि ही हानि है। और हानि भी ऎसी कि जिसकी भरपाई एक जन्म में हो पानी संभव है ही नहीं। फिर भी परिग्रह और पराये द्रव्य के प्रति हमारी आसक्ति मरते दम तक नहीं जाती।
यही हमारी सबसे बड़ी दुर्बलता है। अपने स्वार्थों को पूरा करने तथा मुफत का खान-पान और मौज पाने के लिए हम पशुओं की तरह हम बाड़े और आकाओं को बदलते रहते हैं। हमारी न कोई विचारधारा है, न कोई सिद्धान्त, न जीवन या जगत के लिए कोई लक्ष्य। जहाँ कुछ दिख जाए, मिल जाए, उसी बाड़े में घुस कर रेंकने, रंभाने और भौंकने लगते हैं। न दिन देखते हैं, न रात।
झींगुरों की तरह अपने वजूद को सिद्ध करने के लिए बेवजह गुंजन करते रहते हैं। एक जमाना था जब पशुओं की संख्या के आधार पर लोगों की समृद्धि का आकलन किया जाता था। आज अंधानुचरों और भीड़ को देखकर अंदाज लगाए जाते हैं। पालने वालों की ही तरह पलने वाले भी खूब हो गए हैं।
हम जीवन भर अधिकांश मामलों में दूसरों पर आश्रित होते जा रहे हैं। हमें अपनी प्रतिभा, क्षमता और कर्मयोग पर भरोसा कम है जबकि औरों की दया, करुणा और कृपा पर अधिक। यही कारण है कि हमारा पुरुषार्थ खत्म होता जा रहा है और पराश्रितता बढ़ती ही चली जा रही है।
खूब सारे लोग हैं जिनसे अपना जीवन चलता नहीं, चलाना आता नहीं, वे दूसरों के दम पर जी रहे हैं, उछलकूद और धींगामस्ती कर रहे हैं। परजीवियों की तरह अमरबेल बने रहना अपने आप में किश्तों-किश्तों में स्वैच्छिक आत्मघात से कम नहीं है। हैरत की बात ये है कि नाकाबिल और प्रतिभाशून्य लोग काबिलों पर अंगुलियां उठाने लगे हैं, अंगुली करने लगे हैं।
सबसे बड़ी बात यह है कि अपने जीवन को यशस्वी बनाना चाहें तो अपना खान-पान भी खुद की कमाई से करें। पराये पैसों और दूसरों के खान-पान से शरीर पुष्ट होता तो दिखेगा, किन्तु वह अपने किसी काम नहीं आएगा। बाहरी और पराये खान-पान से निर्मित उत्तकों और कोशिकाओं का कोई भरोसा नहीं।
बाहरी एवं दूसरों के पैसों से खान-पान होने पर दूसरों के खान-पान से बना रक्त, हाड़-माँस, चर्बी आदि सब कुछ मृत्यु से पूर्व किसी न किसी रूप में बाहर निकल ही जाते हैं और जितनी धनराशि का पराया खान-पान होता है उतनी से कहीं अधिक धनराशि बीमारियों के ईलाज पर खर्च हो जाती है।
यह हमारा भ्रम ही है कि हम अपने पैसे बचा रहे हैं और जितना खाना-पीना पराये पैसों से हो जाए, उतनी बचत होगी। असल में यह बचत न होकर बीमारियों के ईलाज अथवा दुर्घटना के लिए धनराशि के इंतजाम की भूमिका ही होती है। हराम का और पराया खान-पान करने से शरीर एक समय बाद अपना नहीं रह जाता और कुछ वर्षों बाद अपना ही शरीर बोरे की तरह और पराया-पराया नाकारा लगने लगता है, काम में मन नहीं लगता और अक्सर यही विचार आते हैं कि अब ये शरीर किसी काम का नहीं रहा। यह ठीक इसी तरह है कि पराये सुरक्षा गार्ड्स के भरोसे किसी की रक्षा की कोई गारंटी नहीं।
खान-पान के बारे में यह प्रसिद्ध है कि जैसा अन्न वैसा मन, जैसा पानी वैसी वाणी। यह सौ फीसदी सत्य है। इसे कोई झुठला नहीं सकता। खान-पान के लिए सर्वोपरि आरंभिक सिद्धान्त तीन ही हैं जिनसे शरीर को लम्बे समय तक निरोगी और चित्त को आनंदित रखा जा सकता है। ऋत भुक् अर्थात् सात्विक धन से प्राप्त, हित भुक् अर्थात शरीर के लिए हितकारी, और मित भुक् अर्थात् शरीर की जरूरत के अनुसार ही स्वीकारना। इन तीन सूत्रों का उल्लंघन ही आज सेहत की तमाम समस्याओं का मूल कारण है।
पराये खान-पान से शरीर के अंग-प्रत्यंगों में विकार और परायापन आ जाता है। जब हमारे अपने खान-पान की अपेक्षा पराये खान-पान या हराम की पेय-भोज्य सामग्री का अनुपात बढ़ जाता है तब हमारी स्थिति विचित्र हो जाती है और शरीर से अपनापन, आत्म आनंद गायब होता जाता है। स्वयं की आत्मा शरीर के पिंजरे में रहकर अशुद्धि और पापों के कारण कुलबुलाती है और हमेशा इसी में लगी रहती है कि इस गंदे पिंजरे को छोड़कर कब बाहर निकले।
जहाँ प्रेमपूर्वक आतिथ्य सत्कार हो, स्वेच्छा से खिलाने-पिलाने वाले को अतीव प्रसन्नता का अनुभव हो, उसका धन शुद्ध सात्विक हो, स्वभाव एवं व्यवहार से सज्जन हो, ऎसे लोगों के खान-पान से कोई हानि नहीं है लेकिन प्रलोभन, किसी कार्यवश या दबाव अथवा भिखारियों की तरह मांग कर खाया-पिया सब कुछ एक समय बाद किसी न किसी रूप में बाहर निकलना ही है। यह शरीर को नुकसान करता ही है, इसे कोई रोक नहीं सकता।
पराये और हराम के खान-पान वाले लोगों को चौतरफा नुकसान ही नुकसान है। एक समय बाद उनका अपना ही शरीर साथ नहीं देता, भार स्वरूप लगता है और धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की गतिविधियों में मन नहीं लगता। अन्न दोष और पापों से उनका आभामण्डल(ओरा) इतना अधिक भारी और पसरा हुआ हो जाता है कि इन लोगों की गति-मुक्ति भी तब तक नहीं होती, जब तक खाए-पिए का एक-एक पैसा चुकारा न हो जाए।
आम तौर पर खान-पान और व्यवहार सामान्य बात हो सकती है किन्तु इसका असर न केवल वर्तमान जन्म पर ही पड़ता है, बल्कि आने वाले कई जन्मों तक भुगतना पड़ना है। ऎसे लोगों के लिए मोक्ष की कामना और कल्पना भी नहीं की जा सकती। इनमें से अधिकांश प्रेत योनि को प्राप्त होते हैं और बाद में पशु-पक्षियों और भुजंगों की योनियां पाते हुए भटकते रहते हैं। इन सबसे बचने के लिए जरूरी है शुचिता और पुरुषार्थ पर सर्वाधिक ध्यान केन्दि्रत करना। इसके बिना मानव जीवन व्यर्थ ही है।

