नुगरे-नालायकों की फौज, कर रही मौज


समाज, क्षेत्र या देश के लिए जिनका कोई चिन्तन नहीं, कुछ काम या सहयोग करने का भाव नहीं, वे अपने आपको बुद्धिजीवी मानते हुए दुनिया चलाने की राय देते हुए बताते हैं कि किस तरह से काम किया जाए। या कि होना चाहिए।
सामाजिक, आंचलिक और राष्ट्रीय सरोकारों के प्रति घोर उदासीन लोग इस धरती पर भार ही हैं। जीवन व्यवहार और लोक मंगल से परे जिन लोगों की कोई पारिवारिक या सामाजिक उपादेयता नहीं, वे अपने आप में मुर्दाल, मनहूस और प्राणहीन ही हैं।
समाज-जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में खूब सारे लोग हैं जो अपने आपको बुद्धिजीवी, सम्मानित, प्रतिष्ठित, लोकप्रिय, लोकनायक, चिन्तक, मनीषी, शिक्षाविद्, साहित्यकार, चिकित्साविज्ञानी, उद्योगपति, अधीश्वर ब्राण्ड शासक-प्रशासक, अपने-अपने क्षेत्रों के ज्ञानी-विज्ञानी और अनुभवी मानते हैं।
लेकिन उनके सामाजिक सरोकारों और रचनात्मक गतिविधियों में वैयक्तिक योगदान या समर्पण की बात करें तो नगण्य ही दिखता है। इनमें खूब सारे तनख्वाहभोगी और पेंशनयाफ्ता हैं, साठ साला भी हैं और पांच साला भी। इन छह दशकों में इनकी क्या भूमिका रही है, उसे इनसे जुड़े लोग जानते हैं, कुछ कहने की आवश्यकता नहीं।
जब सत्ता, शक्तियां और अधिकार थे, तब भी ये किसी को निहाल नहीं कर पाए, अपने लिए जमीन-जायदाद और पैसा बनाने में जुटे रहे। अब क्या करेंगे, जब ये यमराज के घर जाने की तैयारी में बीमारू, अशक्त और आत्महीन होकर जैसे-तैसे जीने और आसानी से मरने की यात्रा में आगे ही आगे बढ़ते जा रहे हैं।
इन्हें न धर्म का ज्ञान है, न शास्त्रों का। केवल और केवल एक ही ज्ञान है कि सब कुछ अपने हक में कैसे हो, कैसे हमेशा बना रहे। और अपनी तरह के लोग फलते-फूलते रहें। सब कुछ अपने स्वार्थ के हिसाब से ढालना चाहते हैं।
खुद कुछ करना नहीं, न किसी काम में सहयोगी होना, और न परोक्ष-अपरोक्ष अपनी कोई भूमिका। बस उनके पास एक ही मुफतिया झरना है सुझावों, राय और फालतू की निन्दाओं का। इनका एक ही जीवन लक्ष्य है - जो कुछ अपने बस में है करते रहो, वैध-अवैध, राम-हराम की परवाह नहीं।
सारे धंधों और कुकर्मों में रमे रहने के बावजूद चाहते हैं कि कोई उन पर अंगुली न उठाए, उनकी हरकतों, हलचलों और कारनामों के बारे में सच्चाई का प्रकटीकरण न करे। जो करेगा उसके पीछे ये सारे नुगरे, नालायक और नकारात्मक लोग गैंग या गिरोह बनाकर पीछे पड़ जाते हैं बदनाम करने के लिए। जबकि देखा यह भी गया है कि इनके घरवाले और रिश्तेदार तक इन्हें बर्दाश्त नहीं कर पाते।
जागरुकता संचार के लिए यह जरूरी है कि इन कैंकड़ों और अजगरों से बेफिक्र रहते हुए अपने काम करते रहें। श्वानों की अपनी कोई विचारधारा नहीं होती, वे औरों के विचारों की नाव पर चढ़कर भौंकते रहते हैं, इन गधों की पीठ पर विचारों के कई गट्ठर सदियों से लदे पड़े हैं, इनमें क्या है यह उन्हें भी नहीं मालूम।
हमारे पुरखों में भी इस तरह की नस्लें हुई हैं जिन्होंने राम को राम नहीं कहा, रावण को रावण नहीं कहा, बुरे को बुरा और अच्छे को अच्छा नहीं कहा, और इसी कारण से समाज में सत्यासत्य का विवेक नहीं रहा, दुर्जनों को प्रश्रय मिलता रहा। इसी का खामियाजा आज हम भुगत रहे हैं।
उन्होंने सत्य, धर्म और शास्त्र का परिपालन करते हुए जीवन जिया होता तो आज हम अखण्ड भारत का ही ही हिस्सा होते, और उनकी संतति आज की तरह स्वार्थी, मक्कार और तटस्थ नहीं होती।
हालांकि इन पुरखों को इनकी हरकतों के कारण मोक्ष संभव ही नहीं, हो सकता है कि खूब सारे भूत-प्रेत, चुड़ैल-पिशाच और ब्रह्मराक्षस बनकर इनकी संतति में शरीर में प्रवेश कर ही इन नालायकों को बिगाड़ कर अपनी परम्पराओं को आगे बढ़ा रहे हों।
चरेवैति चरेवैति ....
