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धर्म के नाम पर अधर्म का बोलबाला, ढोंग-पाखण्ड जिन्दाबाद, धूर्त्त-मक्कार अमर रहें

Deepak Acharya
Deepak Acharya
April 4, 2025
धर्म के नाम पर अधर्म का बोलबाला, ढोंग-पाखण्ड जिन्दाबाद, धूर्त्त-मक्कार अमर रहें

पिछले कुछ समय से धर्म के नाम पर जिस तरह से धार्मिक क्रियाकलापों का जोर देखा जा रहा है, उत्सवों, मनोरंजन, फैशनी धूम-धड़ाकों और धर्महीन कृत्यों एवं आडम्बरों का दिखाना देखने को मिल रहा है, उसे देख धर्म शास्त्र, पुरातन परम्पराएं और धार्मिक कर्मकाण्ड भी हाशिये पर आ गया है।

धर्मशास्त्रों की मर्यादाओं का पालन गौण होता जा रहा है और इसकी जगह ले ली है नए-नए चोंचलों, टोने-टोटकों और वैध-अवैध इच्छापूर्ति के तंत्र-मंत्रों, भभूत, डोरे-ताबीज, गण्डे, मालाओं और अंगुठियों से लेकर कभी जानवरों के नाखून-दाँत, नाल आदि-आदि ने।

धर्म का परिपालन और शास्त्रों के अनुरूप मर्यादाओं का पालन कोई नहीं करना चाहता है। सब चाहते हैं कि दुनिया भर के सारे खोटे कर्म करते रहें, मानवीय मूल्यों को दरकिनार करते हुए लूट-खसोट, नशाखोरी, भ्रष्टाचार, शोषण और अमानवीय कृत्य करते रहें, पैसा बनाते रहें, जमा करते रहें, जमीन-जायदाद अपने नाम करते रहें, हर संभव पाप कर्म में रमे रहें, और कभी-कभार भगवान को प्रसाद, पैसा चढ़ा दें, पूजा-पाठ करवा लें और अपने पापों से मुक्त हो जाएं।

यही सब आजकल धर्म के नाम पर चल रहा है। धर्म के नाम पर किसम-किसम की छोटी-मोटी दुकानों का संचालन धडल्ले से हो रहा है। संसार और धन-वैभव को माया बताकर त्याग करने का संदेश देने वाले बाबा लोग, उपदेशक और कथावाचक मालामाल हो रहे हैं, मांत्रिक-तांत्रिक, मुल्ला-मौलवी से लेकर मैली विद्याओं में रमे हुए सारे के सारे लोग चमत्कारों के नाम पर लोगों को गुमराह कर रहे हैं।

वेद, पुराणों और व्याकरण से लेकर धर्म शास्त्रों और सनातन परम्पराओं से अनभिज्ञ पण्डे-पुजारी और पण्डित टोनों-टोटकों, ग्रह शान्ति के उपायों और विचित्र-विचित्र प्रयोगों से टाईमपास करते हुए अपना टाईम संवार रहे हैं।

अब दान-दक्षिणा का प्रचलन रहा नहीं, मुँहमाँगा पारिश्रमिक लेने की परम्परा शुरू हो चुकी है। ऐसे में यह प्रावधान क्यों न अपना लिया जाए कि धर्म, तंत्र-मंत्र, ग्रह शान्ति, कालसर्प शान्ति, भूत-प्रेत और पितर बाधा शान्ति के अनुष्ठानों का पारिश्रमिक जातकों के काम पूरे होने के बाद लिया जाए जैसा कि कोर्ट केस में वकीलों का शुल्क, केस निपट जाने के बाद कुछ परसेंट के आधार पर पारिश्रमिक का निर्धारण।

धर्म और धार्मिक कार्यक्रमों, कर्मकाण्ड, अनुष्ठानों में ठेकेदारी परवान पर है। सरकारी और गैर सरकारी नौकरियों और बिजनैस से अच्छा-ख़ासा धन कमा रहे लोग हों या भरपूर पेंशन पाने वाले पेंशनभोगी, इनमें से खूब सारे सम्पन्न होने के बावजूद पूजा-पाठ और कर्मकाण्ड की ठेकेदारी का हिस्सा बने हुए धर्म को धन्य कर रहे हैं।

और उधर बेचारे बेरोजगार कर्मकाण्डियों और पूजा-पाठ को आजीविका का माध्यम बनाने के इच्छुकों को कोई गाँठ नहीं रहा, उन्हें अवसर नहीं मिल पा रहा है, इस कारण से बेरोजगारी बढ़ती जा रही है, सामाजिक आर्थिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है। धर्म-कर्म और अनुष्ठानों के नाम पर परिवारवाद, वंशवाद और समूहवाद का माहौल व्याप्त है।

और इन सबके लिए जिम्मेदार वे लोग हैं जो अन्य बंधे-बंधाए स्रोतों से भरपूर धन कमाने के बावजूद पूजा-पाठ और धार्मिक क्रियाकलापों में भरपूर दखलन्दाजी कर रहे हैं। और ये ही लोग हैं जो एकाधिकार चाहते हैं, इसलिए नई पीढ़ी को कुछ सिखाना नहीं चाहते। पता नहीं कालनेमियों की यह कुंभकरणी भूख और सुरसाई प्यास समाज को कहाँ ले जाएगी।

लोगों को बस पैसा ही चाहिए। चाहे कोई सा रास्ता क्यों न अपनाना पड़े। धन जमा करने का भूत इस कदर हावी है कि पात्र-अपात्र किसी प्रकार का कोई विचार नहीं। जो पैसा देगा, जितना अधिक देगा, उसके लिए तथाकथित सिद्धों की पूरी की पूरी फौज उमड़ पड़ती है। फिर चाहे वह कैसा भी क्यों न हो।

अनैतिक रूप से लूटने वाले, शोषकों और अनाचारियों को संरक्षण, तंत्र-मंत्र और पूजा-पाठ से शक्ति दिलाने से लेकर इनके विरोधियों तक को सबक सिखाने के लिए धर्म-कर्म, टोनों-टोटकों और मर्यादाहीन क्रियाओं और विद्याओं का इस्तेमाल करते हुए खूब सारे लोग हैं जो अपनी प्रतिष्ठा, पैसा और सुरक्षा चाहने की रेवड़ में शामिल हैं। अंधविश्वासों को भुनाने में हमारा देश पीछे नहीं है। इसकी बहुत बड़ी इण्डस्ट्री हर तरफ जोरों से चल रही है।

धर्म-अध्यात्म के ज्ञान तथा अपने जीवन लक्ष्यों से भटक गए लोगों को न भगवान चाहिए, न मोक्ष प्राप्ति की कामना। केवल और केवल धन-वैभव, यश-प्रतिष्ठा और शोर्ट कट से भोग-विलास भरा जीवन पाने के लिए सारे उतावले हैं। इनकी अपार संख्या के अनुपात में अनगिनत ऐसे भी हैं जिनके लिए ये लक्ष्यहीन प्राणी किसी टकसाल से कम नहीं।

हम सभी सनातन की बातें तो करते हैं लेकिन सनातन मूल्यों और परम्पराओं के अनुगमन और परिपालन की जब बात आती है, तब हम बगले झाँकने लगते हैं। हम सभी को ईमानदारी से अपना आत्म मूल्यांकन करना होगा कि हम कितने फीसदी सनातनी हैं। त्याग, तपस्या, सेवा और परोपकार से हमारा कितना वास्ता रह गया है, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है।

जब तक सदाचार, सांस्कृतिक मूल्यों, मानवीय संवेदनाओं को अपनाने तथा समाज और देश के लिए जीने का प्रण नहीं लेंगे तब तक हमारे सारे कर्म केवल और केवल पब्लिसिटी के फण्डे और आत्म प्रशस्ति के चोंचलों से अधिक कुछ नहीं।