विनम्र जिज्ञासा - श्रावण मास का व्रतोद्यापन किस दिन किया जाना चाहिए ?


सनातन के छछून्दरों की धमाल
इन दिनों श्रावण मास चल रहा है। इसका समापन होने के उपरान्त इस माह भर के व्रत को लेकर सामूहिक भोज इत्यादि पूर्णिमा या अमावास्या को ही करने चाहिएं या अगले दिन। इस बारे में हम जैसे तथाकथित शिवभक्तों को तथ्यात्मक जानकारी की अपेक्षा है।
शिव भक्ति प्रधान श्रावण मास पूर्णिमान्त पद्धति वाले इलाकों में पूर्णिमा को तथा अमान्त पद्धति वाले क्षेत्रों में अमावास्या को पूर्ण होता है। जो लोग महीने भर श्रावण मास के अनुष्ठान, व्रतादि करते हैं उनका श्रावण मासीय सम्पूर्ण व्रत पूर्णिमा को अथवा अमावास्या को पूर्ण माना जाता है।
मेरे व्यक्तिगत विचारों में इस एक माह के व्रत का उद्यापन श्रावण मास पूर्णता हो जाने के अगले दिन होना चाहिए लेकिन कई जगह, ख़ासकर अमान्त पद्धति वाले वागड़ क्षेत्र में देखा यह गया है कि श्रावण मास का व्रतोद्यापन श्रावण मास के अंतिम दिन अमावास्या को ही कर दिया जाता है।
इस दिन यज्ञ-यागादि, सामूहिक भोज आदि के साथ व्रतोद्यापन कर देते हैं। जबकि श्रावण मास के व्रत में अमावास्या का दिन भी शामिल होता है तभी पूरा माह होता है।
इस तरह अमावास्या को ही व्रतोद्यापन कर देने से श्रावण मास का पूरा व्रत एक दिन कम होकर खण्डित रह जाता है। होना यह चाहिए कि श्रावण मास की अमावास्या को समाप्ति के उपरान्त अगले दिन व्रतोद्यापन, सामूहिक भोज इत्यादि का आयोजन होना चाहिए।
इस बारे में प्रामाणिक जानकारी कर्मकाण्ड और धर्म कर्म के आचार्य, कर्मकाण्डी पण्डित और शिवभक्त ही दे सकते हैं कि इस तथ्य में कितना दम है। विद्वानों के विचारों का स्वागत है।
