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संस्मरणात्मक आत्मकथ्य - भेड़ियों की पहली पसन्द भीड़

Deepak Acharya
Deepak Acharya
March 9, 2025
संस्मरणात्मक आत्मकथ्य - भेड़ियों की पहली पसन्द भीड़

राजनेताओं के लिए भीड़ प्राणवायु का काम करती है। उन्हें हर कहीं भीड़ चाहिए। भारी भीड़ हो तभी उन्हें लगता है कि उनकी लोकप्रियता और लोकमान्यता सातवें आसमान पर चढ़ चुकी है। राजनेताओं के लिए भीड़ सबसे पहली पसन्द होती है, फिर चाहे वह राष्ट्रवादी भगवा पार्टी का हो, या फिर गांधीजी के नाम पर चल रहा अथवा महात्मा गांधी का क्लोन कहा जाने वाला नेता। इन्हें अपने पर विश्वास ही तभी होता है जब चमचों-चापलुसों और जयगान करते रहने वालों का मजमा हो, साथ ही जहां जाएं वहाँ भीड़ के दर्शन हो जाएं।

ये नेता किसी भी आयोजन में आने से पहले पूछते हैं कि भीड़ जुटी या नहीं, कितनी भीड़ जमा हो चुकी है। आयोजकों को इन राजनेताओं की ओर से सीधी और स्पष्ट हिदायत होती है कि वांछित भीड़ इकट्ठा हो जाए तब बुला लेना।

उद्घाटन, शिलान्यास और कोई सा सरकारी कार्यक्रम हो, अथवा चुनावों के दिन हों, जितना बड़ा राजनेता और पद धारी हो, उतनी अधिक भीड़ की अपेक्षा और इंतजाम ही सर्वोपरि होते हैं। और इस भीड़ को जुटाने के लिए जो बहुआयामी जतन किए जाते रहे हैं, इसके रहस्य को तकरीबन सभी जागरुक प्रजाजन अच्छी तरह जानते हैं।

यों भी अपने देश में भीड़ के लिए अपार संभावनाएं हैं। दिहाड़ी मजदूरी के साथ ही आने-जाने से लेकर भोजन तक की सारी सुविधाएं वे उपलब्ध कराते हैं जो भीड़ का इंतजाम करते हैं। लोगों का क्या, उनका तो दिन निकल जाता है बिना कुछ खर्च किए सब कुछ पा जाने का।

फिर यह भी निर्देश होते हैं कि भीड़ हर क्षेत्र से आनी चाहिए, ताकि नेताजी के वोटर और आम लोग प्रशंसकों की भीड़ में रूपान्तरित हो सकें। इस भीड़ का इंतजाम करने का काम छुटभैये नेताओं से लेकर बड़े-बड़े ओहदेधारियों के जिम्मे होता है। इसमें हरसंभव मदद वे लोग करते हैं जिन्हें नेताजी की कृपा से जनता की सेवाओं और अपने विकास, प्रमोशन का मौका मिलता है।

इन कर्णधारों को यह भी पता रहता है कि कौन-कौन से सरकारी कामों के मजदूरों को भीड़ का हिस्सा बनाया जा सकता है। और तो और कई जगहों पर तो सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को भी मौखिक निर्देश मिलते रहते हैं कि नेताजी के सार्वजनिक कार्यक्रमों में अनिवार्य रूप से उपस्थित रहकर भीड़ का हिस्सा बनें ताकि नेताजी खुश रह सकें। यह भीड़ ही तय करती है कि कौन कितना बड़ा और कृपा पात्र साहब है नेताजी का।

ये सारे मिलकर भीड़ का इंतजाम करते रहकर इतने माहिर हो जाते हैं कि भीड़ जुटाने के वैश्विक एनजीओ का सृजन तक कर सकते हैं। राजनेताओं के आयोजनों में जुटायी जाने वाली भीड़ में से अधिकांश अनपढ़ होते हैं।

उन्हें आयोजन स्थल पर हर कोने तथा बीच में कई खण्डों में बिठा दिया जाता है। इस भीड़ को पहले से ही समझा दिया जाता है कि सबसे बड़े नेताजी के भाषण के समय थोड़ी-थोड़ी देर में ताली बजाकर खुशी जाहिर करने में पीछे न रहें।

कई बार देखा गया है कि जब-जब भी जहां कहीं नेताजी के भाषण होते हैं वहां नेताजी अपने भाषण के बीच किसी को श्रृद्धान्जलि या किसी दुर्घटना का जिक्र करते हैं, फालतू की बातें बताते हैं या अप्रासंगिक बातें बोलते हैं तब भी लोग तालियां बजाने लगते हैं।

ऐसा ही एक वाकया भीड़ के चरित्र को दर्शाने वाला सामने आया। एक संभाग मुख्यालय पर चुनाव से ठीक पहले आयोजित विराट समारोह में प्रदेश के सबसे बड़े नेताजी का भाषण शुरू हुआ। नेताजी ने किसी बात पर दूसरे नेताओं को टोक दिया। तभी जगह-जगह पसरी भीड़ के समूहों ने जमकर तालियां बजानी शुरू कर दी।

ऐसे में नेताजी को गुस्सा ही आ गया और उन्होंने भीड़ को ही फटकार दिया। ऐसे कई अवसर सामने आते हैं जब भीड़ अपने वाली कर डालती है। अब किराये से लायी गई भीड़ को क्या पता कि किस समय ताली बजानी है, किस समय चुपचाप सुनते जाना है।

कई बार जब आयोजन लम्बा चलता है और नेताजी विलम्ब से आते हैं तब भी घर जाने और भोजन के पैकेट पाने को उतावली यह भीड़ जानबूझकर भी नेताजी के भाषण में तालियों की गड़गड़ाहट करती रहती है ताकि इस इशारे को भाषण झाड़ रहे नेताजी समझ जाएं और कार्यक्रम से मुक्ति मिल जाए।

वह दिन दूर नहीं जब चुनावों और सरकारी आयोजनों में भीड़ जुटाने के लिए जगह-जगह एनजीओ और कंपनियों की स्थापना हो जाएगी और इससे रोजगार की अपार संभावनाएं साकार होंगी।

भीड़ से ही नापा जाता है राजनेताओं का कद। जितनी अधिक भीड़ उतना अधिक लोकप्रियता का भ्रम। लोकतंत्र दिन ब दिन भीड़ तंत्र में बदलता जा रहा है और हर कहीं भीड़ भाड़ को ही पसन्द किया जाने लगा है। यह भीड़ ही है जो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को जिन्दा रखे हुए है।