
गौसेवक कर रहे हैं डेयरी संचालकों को मालामाल
विभिन्न मन्दिरों के आस-पास प्रायःतर देखा जा रहा है कि जो धर्मावलम्बी मन्दिरों में दर्शन-पूजन के लिए आते हैं वे गौसेवा का पुण्य कमाने के लिए मन्दिरों के आस-पास सड़कों पर विचरण करने वाली गायों को चारा डालकर पुण्य कमाने में भिड़े रहते हैं।
आम तौर पर यह नजारा रोजाना सवेरे 6 बजे से लगाकर दोपहर 10-11 बजे तक चलता रहता है। धर्म और पुण्य के नाम पर लोग इन गायों को चारा डालते रहते हैं। ये गायें मस्ती से धर्म का मुफतिया चारा खाकर चार-पांच घण्टे इन मन्दिरों के आस-पास सड़कों पर घूमती हुई पुष्ट होती जा रही हैं।
इन मूर्ख धर्मावलम्बियों को यह पता ही नहीं है कि वे जिन मोटी-तगड़ी गायों को चारा डालकर पुण्य कमा रहे हैं वे सारी की सारी गायें डेयरी चलाने वालों की हैं। इन सभी के कान पर टैग लगे हुए हैं।
डेयरी वालों को पता है कि उनकी गायों के लिए रोजाना पर्याप्त चारे की व्यवस्था ये धर्मान्ध लोग मुफ्त में करते रहे हैं। इसलिए ये डेयरी वाले सवेरे छह बजे से पहले अपनी गायों का दूध दूहकर इन गायों को छोड़ देते हैं।
गायें भी इनकी तरह ही चालाक हो गई हैं। इन्हें पता है कि रोजाना उन्हें भरपेट चारा इन मन्दिरों के आस-पास मिल जाता है। इसलिए वे डेयरी से छूटते ही सीधे मन्दिरों के आस-पास आकर जमा हो जाती हैं। भक्तगण मन्दिर आते हैं तब गायों को चारा डालकर पुण्य कमाने में जुट जाते हैं। काफी संख्या में भक्त रोजाना ऐसा करते रहे हैं।
डेयरी वालों की गायों के लिए रोजाना मुफ्त के चारे का इंतजाम हो जाता है और इससे उन्हें अपनी गायों के लिए दाना-पानी का कोई खर्च नहीं आता। उनके पास केवल एक ही काम रह गया है गायों का दूध दूहों और बेचकर कमाई करो। उन्हें अपनी गायों के चारे के लिए कोई पैसा खर्च नहीं करना पड़ रहा है। गौसेवा के नाम पर धर्मान्ध लोग इसकी सारी व्यवस्था करते ही हैं।
एक तरफ भोले-भाले लोग धर्म और पुण्य के नाम पर गायों को चारा खिलाकर खुश हो रहे हैं और उधर डेयरी वाले भी खुश। धर्म का चारा उन्हें कमाई दे रहा है। पुण्य देने वाली ये गायें सड़कों पर धींगामस्ती करते हुए आवागमन बाधित करती रहती हैं, इससे न पुण्य कमाने वालों को कोई सरोकार है, न डेयरी का धंधा चलाने वाले।
चारा डालने वाले चारा डालकर अपने-अपने काम-धंधों और घरों की ओर चले जाते हैं। और इधर गायें लोगों को तंग करती रहती हैं।
गायें भी खुश, डेयरी वाले भी खुश, और गौसेवा के नाम पर डेयरी की गायों को हृष्ट-पुष्ट कर दूध का धंधा करने वाले उदारमना गौसेवक भी प्रसन्न।
दुःखी हैं तो वे गायें जिनका कोई नहीं है। खूब सारी निराश्रित गायें कृशकाय होती जा रही हैं। गज़ब़ की गौसेवा है यह। सारे धर्मान्ध लोग मिलकर डेयरी वालों को समृद्ध बना रहे हैं। आखिर मानना ही पड़ेगा डेयरी संचालकों की चतुराई को।
यह सब नज़ारा देखना हो तो बांसवाड़ा शहर में महालक्ष्मी चौक के आस-पास का क्षेत्र देखना न भूलें। कारोबार और पुण्य का मिलाजुला मंजर यहां रोजाना देखा जा सकता है।

