सोशल मीडिया पर आवाराओं और लोफरों की भरमार


बर्दाश्तगी के बाहर है यह उन्मुक्त स्वेच्छाचार
समाज हो या कोई सी सामाजिक, धार्मिक या रचनात्मक संस्था अथवा कोई सा संगठन। इनके ग्रुप में भगवान के फोटो, वीडियो, फालतू के उपदेश, सुविचार आदि के कारण उन लोगों को दिक्कतें आती हैं जो कई ग्रुप्स में जुड़े हुए हैं। और तकरीबन सारे ही ग्रुप्स में इस तरह की स्थितियां व्याप्त हैं।
ग्रुप एडमिन भी इन स्थितियों पर यह समझ कर चुप्पी साधे रहते हैं कि कौन बुरा बने। आजकल हर इंसान अजातशत्रु बनना और दिखाना चाहता है लेकिन मनुष्यों के भीतर जिस कदर पैशाचिक भाव जमे हुए हैं उससे सभी को खुश करना कभी संभव नहीं है। बुरे कार्य होंगे तो लोग मन ही मन या चन्द लोगों की बीच बुराई कर लेंगे लेकिन जहां कहीं कोई अच्छा कार्य होता है वहां ऐसे निन्दकों, आलोचकों और नुगरे नालायकों की फौज उमड़ पड़ती है सार्वजनिक विरोध या निन्दा के लिए। इन्हें अच्छी तरह पता होता है कि बुरा इंसान निन्दा सुनते ही ठुकाई कर देगा, हुक्का-पानी बन्द कर देगा लेकिन भले आदमी चुपचाप सहते रहते हैं।
कोई सा ग्रुप हो इसके एडमिन को चाहिए कि इस प्रकार की प्रवृत्ति पर तत्काल प्रभाव से अंकुश लगाएं और यह सुनिश्चित करें कि ग्रुप में केवल समाज, संस्था या संगठन अथवा किसी विशेष आयेजन से संबंधित सूचनाएं ही पोस्ट हों, तभी ग्रुप का उद्देश्य बरकरार रह सकेगा।
ग्रुप में अनुशासन बनाए रखना ग्रुप एडमिन का कर्तव्य है। सनातनी समाजों की दुर्दशा और दुर्गति का मूल कारण हमारी ऊर्जाओं का अनावश्यक क्षरण ही है। हम सनातनियों को चाहिए कि फालतू के संदेशों, भगवान के फोटो-वीडियो और धार्मिक विचारों के आयात-निर्यात की बजाय अपनी ऊर्जा को समाज, अपने क्षेत्र और देश के कल्याण के लिए वैचारिक चिन्तन और लोक जागृति संचार में लगाएं।
जितना समय हम फालतू के संदेशों की चोरी और फॉरवर्ड करने में लगाते हैं उसका आधा समय भी नित्यकर्म और साधना में लगाएं, समाज की सेवा के किसी न किसी काम में लगाएं तो खुद की काया का कल्याण भी हो जाए और समाज एवं अपना क्षेत्र और देश भी तरक्की की राह पर चलने लगे।
पता नहीं हमारे ऊर्जावान और महामेधावी बुद्धिजीवियों को इतना समय कैसे मिल जाता है कि कॉपी-पेस्ट और फॉरवर्ड करते हुए अपनी विद्वत्ता की बौछार करते रहते हैं। इन्हें पता नहीं है कि उनकी इस ओलावृष्टि से दूसरे कितने सारे लोगों का समय इन अनावश्यक और दूसरे ग्रुप्स से चुराए हुए फोटो और वीडियो आदि को रिमूव करने में लगता है। इतना ही विद्वत्ता झाड़ने का शौक हो तो स्वयं की बुद्धि का उपयोग करते हुए मौलिक पोस्ट करने पर ध्यान दें।
समाज और क्षेत्र के प्रति हमारी कितनी जिम्मेदारी है इसका ज्वलन्त उदाहरण किसी भी आयोजन में देखा जा सकता है। सोशल मीडिया पर हजारों फोलोवर्स होते हैं, पर आयोजनों तक कोई नहीं आता। ऐसे आयोजनों में सोशल मीडिया पर पोस्ट्स की बारिश करने वालों से लेकर सेल्फि का मजा लेने वालों की पावन उपस्थिति भी काफी देर बाद ही होती दिखती रही है।
इसी प्रकार मन्दिरों और मूर्तियों के फोटो भेजने वाले फैशनी और दिखावटी भक्तों की कोई कमी नहीं है जो रोजाना कई-कई बार धार्मिक पोस्ट करते रहते हैं मगर पास के मन्दिर में कभी नहीं जाते।
समाज, क्षेत्र एवं देश को आगे बढ़ाना हो तो कठोर अनुशासन का पालन करना हम सभी का फर्ज है। इस विषय पर गंभीर चिन्तन की आवश्यकता है।
हम सभी को आत्म अनुशासन और रचनात्मक गतिविधियों में अधिकाधिक एवं निष्काम सहभागिता की आवश्यकता है। ऐसा आज नहीं हो पाया तो हमारी आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करने वाली।
