उत्सवी मनोरंजन में बदल गया है गणेशोत्सव


भारतीय संस्कृति में विभिन्न देवी-देवताओं से संबंधित पर्व और त्योहारों को मनाने का मूल लक्ष्य था संदर्भित देव या देवी की कृपा प्राप्त के लिए साधना विशेष को अंगीकार कर दैवीय और दिव्य ऊर्जाओं का आवाहन और अपने शरीर की क्षमताओं का विस्तार करना, ताकि जीवन में दैवीय भावों और दैवीय परंपराओं के कार्यों में सहभागिता बढ़ाते हुए सनातन धर्म के प्रति आस्था में अभिवृद्धि और परिवेश में विराट ऊर्जा का प्रसार करना, ताकि विश्व कल्याण की गतिविधियां परिपुष्ट होकर ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे निरामया’ के सार्वभौमिक उद्देश्य की प्राप्ति।
ताकि हर व्यक्ति का जीवन भगवत् कृपा से आशातीत सफल एवं उपलब्धिमूलक हो सके। भारतीय संस्कृति और सनातन परंपराओं में आद्य शंकराचार्य द्वारा स्थापित पंच देवोपासना के पीछे यही भावना थी कि सभी सनातनी पारस्परिक प्रेम भाव और सामूहिक प्रयासों से अपने-अपने ईष्ट देव को साधना के माध्यम से प्रसन्न करते हुए जीवन का विकास कर सकें तथा अपने आस-पास के बंधुओं-भगिनियों, परिवेश, क्षेत्र और राष्ट्र के लिए उन्नतिकारक योगदान दे सकें।
इस मामले में तीन तरह के कर्म निहित हैं। नित्य कर्म, नैमित्तिक कर्म और काम्य कर्म। इन्हीं को लेकर साधना-उपासना का विधान है। निर्धारित नित्य कर्म सभी के लिए निर्धारित हैं, जिसे रोजाना अनिवार्य रूप से करना ही करना होता है। इसके बाद आता है नैमित्तिक कर्म, अर्थात किसी पर्व, त्योहार एवं उत्सव के निमित्त उससे संदर्भित देवी-देवता की विशेष साधना। और वह भी उसी व्यक्ति द्वारा जिसका ईष्ट हो। शेष सभी के लिए सामान्य साधना या भागीदारी का विधान है। पर हमारे यहाँ साधना के मामले में सब कुछ गड्ड-मड्ड हो गया है।
जब भी कोई पर्व-त्योहार और उत्सव आता है, सारे के सारे लोग ऎसे मिल पड़ते हैं, जैसे कि उनकी ईष्ट की विशेष साधना का काल आ गया हो। जबकि होना यह चाहिए कि अपना ईष्ट एक होना चाहिए। और उसी पर सर्वाधिक ध्यान दिया जाना चाहिए, शेष के प्रति श्रद्धा, आस्था और भावना जरूर हो, लेकिन ऎसा नहीं है कि साल भर में जो भी तिथियां, पर्व और त्योहार आ जाएं, उनमें डूब जाएं।
इससे अपना ईष्ट बल भी उतना पूरा नहीं हो पाता, जितना होना चाहिए। इसी प्रकार काम्य कर्म हैं। इनमें किसी कामना विशेष की पूर्ति के लिए साधना का विधान है। इस साधना से संचित ऊर्जा कर्म की पूर्णता पर पूरी खर्च हो जाती है। नियम तो यह भी है कि नैमित्तिक और काम्य कर्म का अधिकार उसी साधक को है जो नित्य कर्म में रत रहते हैं और किसी भी दिन अपनी वंश परम्परा और कुल परम्परा से चली आ रही पुरखों की अपनायी साधना में रमे रहते हैं।
ऎसा करने से पूर्वजों द्वारा की गई साधनों का काफी कुछ अंश साधक को अपने आप प्राप्त हो जाता है। उसे कुल परम्परा से चली आ रही साधना का आश्रय प्राप्त कर लेने पर सिद्धियां और ईच्छित कर्मों में सफलता बहुत जल्दी प्राप्त होती है। इस कार्य में दिवंगत पितरों की ओर से भी वांछित ऊर्जा अपने वंशजों को सूक्ष्म रूप से प्राप्त होने लगती है।
लेकिन आज की स्थिति में न हम वंश परंपरा से चली आ रही पूजा-उपासना को अंगीकार कर पाए हैं, न ईष्ट साधना के प्रति गंभीर हैं। जिस समय जो सामने आ गया, जिसने कुछ कह दिया, उसी के पीछे भेड़चाल से पिछलग्गू होकर चलते हुए अंधी दौड़ में शामिल हो जाया करते हैं।
इससे होता यह है कि कुल और वंश परम्परा के देवी-देवता तथा इनकी उपासना करते हुए ऊर्जा के भण्डारों को प्राप्त करने वाले हमारे पूर्वज और पितरों तथा दिवंगत गुरुओं का हमसे साधनात्मक और ऊर्जा प्रवाह का संबंध या सेतु टूट जाता है। और हम सारे लोग कुछ-कुछ महीनों या वर्षों में अपने-अपने हिसाब से अपनी तुच्छ कामनाओं को सामने रखकर अपने उपास्य देव अर्थात ईष्ट को बदलते रहते हैं।
अधिकांश लोग ताजिन्दगी यही करते रहते हैं और अन्त में ईष्ट की सिद्धि के बिना परलोक सिधार जाते हैं और उनकी मुक्ति नहीं हो पाती। हमारे जीवन की तमाम समस्याओं का यही मूल राज है जिसकी वजह से धर्म, त्योहारों और पर्वों के नाम पर इतना सब कुछ दिखावा, समय, पैसा और श्रम खर्च करते हुए रमे रहने के बावजूद कुछ हासिल नहीं हो पाता और अंतिम समय तक भी दैवीय कृपा और ऊर्जा के मामले में ठनठनगोपाल ही बने रहते हैं।
खूब सारे लोग हैं जिन्हें इस सत्य का भान तब होता है जब वे मरणासन्न अवस्था में पहुँच जाते हैं। और इस अवस्था में ये कुछ नहीं कर पाते, आत्मा कुलबुलाती है, पूरा का पूरा जीवन निरर्थक लगता है, और एक दिन अनचाहे ही राम नाम सत्य हो जाता है।
यह स्थिति इनके लिए भी घातक होती है, उनके पूर्वजों तथा वंशजों के लिए भी घातक होती है, क्योंकि इस स्थिति में ऊर्जाहीनता के भंवर में फंसे रहने की वजह से पूरी की पूरी श्रृंखला मुक्ति से दूर रहकर भटकती रहती है और धरतीवासी अपनी संतति को परेशान करते हुए मुक्ति के उपाय करने के लिए संकेत देती रहती है।
इन दिनों गणेशोत्सव चल रहा है। यह गणेशात्सव हालांकि सभी के लिए नैमित्तिक कर्म की श्रेणी में आता है जिसमें यथाशक्ति योगदान और भागीदारी करनी चाहिए। लेकिन मूल रूप से यह गणपति साधकों का ऊर्जा संग्रहण पर्व है जिसमें गणेशजी की साधना की स्तुतियों, मंत्रों और पूजन परंपराओं पर जोर दिया जाना चाहिए। लेकिन अधिकांश लोगों को इससे कोई सरोकार नहीं है।
सारे के सारे आजकल गणेशोत्सव को उत्सवी मनोरंजन के रूप में ले रहे हैं और जिस तरह से माहौल बनता है, उसे देख यह अनुभव में आता है कि यह गणेशोत्सव भक्ति का पर्व न होकर उत्सवी मनोरंजन का महापर्व ही है, जहाँ साधना, पूजा-पाठ और भक्ति गौण है और धींगामस्ती तथा मनोरंजन का परिमाण कहीं अधिक।
एक अध्ययन कर लें कि कितने ऎसे लोग हैं जो गणेशोत्सव में रमे हुए हैं और उनका गणेश साधना बल है या गणेशजी की पूजा और साधना पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। शायद कुछ फीसदी ही सामने आएंगे अन्यथा अधिकांश लोग माईक पर भजनों और आरतियों, नैवेद्य आदि में ही रमे हुए हैं।
यही वजह है कि लाखों-करोड़ों लोग गणेशोत्सव के आनंद, उत्सव और उल्लास में डूबे हुए हैं किन्तु न उनके जीवन में सुख-समृद्धि दिख रही है, न समाज में खुशहाली आ पा रही है, और न ही राष्ट्र की उन्नति में कोई बदलाव आ पाया है।
गणेशजी को विध्नविनाशक माना गया है। ऎसे में गणेशोत्सव में रमे हुए सारे लोग थोड़ी संख्या में ही गणेश साधना को अपना लें तो देश से आतंकवाद, समस्याएं और आस-पास के शत्रु देश अपने आप ठिकाने लग जाएं।
गणेशोत्सव में डूबे हुए लोग भी उत्सव के बाद जैसे थे वैसे दिखते हैं, उनके जीवन में कोई सकारात्मक बदलाव तक नहीं दिखता, जबकि बरसों से वे ऎसा कर रहे हैं। हमारे सारे पर्व और त्योहार अब उत्सवी मनोरंजन और क्षणिक आनन्द पाने की भेंट चढ़ चुके हैं।
देशवासियों और भारतवर्ष के लिए यही दुर्भाग्य की बात है अन्यथा साल भर आने वाले पर्व-त्योहार दैवीय शक्तियों के आवाहन और ऊर्जा संग्रह के माध्यम होते हैं पर इस शाश्वत मर्म को कोई समझ नहीं पा रहा। फिर देश में उन लोगों की भी कोई कमी नहीं है जो कि सनातन संस्कृति के उत्सवों, पर्वों और अन्य अवसरों पर गणेश साधकों को साधना की फुरसत नहीं देकर जानबूझकर दूसरे कामों में उलझाए रखते हैं। यह सनातनियों को शक्तिहीन बनाए रखने का षड़यंत्र है जिसे लोग समझ नहीं पा रहे हैं।
सारे के सारे तथाकथित भक्तगण मनोरंजनिया भेड़चाल का हिस्सा बने हुए धर्म और पर्व-त्योहारों के नाम पर इतना सब कुछ करने के बावजूद निर्बल, असहाय और मूकद्रष्टा होकर जी रहे हैं। हर पर्व और त्योहार पर साधना पक्ष को प्रधानता दी जानी जरूरी है।
आजकल बाबाओं, महंतों, महामण्डलेश्वरों और कर्मकाण्डियों तथा धर्म के नाम पर धंधे चलाने वाले भी साधना प़क्ष को गौण मानकर मन्दिर और भवनों के निर्माण, व्यवसायिकता भरे आयोजनों और कारोबारी मानसिकता पर जोर देते रहे हैं।
इसके अलावा कुछ लोगों के लिए इस प्रकार के हर पर्व और त्योहार धंधे का रूप ले चुके हैं। इन्हें न समाज से कोई मतलब है, न देश से। और खूब सारे लोग पराए पैसों से मौज उड़ाने के लिए जुट जाते हैं। जबकि साधना और भक्ति का सर्वोपरि नियम यह है कि जो कुछ किया जाए वह खुद के द्वारा अर्जित धन से होना चाहिए।
पराए पैसों से होने वाले कोई से धार्मिक अनुष्ठान, उत्सव और आयोजन किसी काम के नहीं। यही कारण है कि साल भर धर्म के नाम पर इतना कुछ हो रहा है फिर भी लोगों में न धार्मिकता आ रही है, न शुचिता या दिव्यता। दैवीय कृपा और ऊर्जा की बात तो दूर है। इससे समाज और राष्ट्र का अप्रत्यक्ष रूप से बड़ा भारी नुकसान हो रहा है। इस गंभीर स्थिति पर चिन्तन करने की आवश्यकता है।
