सार्थक बहस - सरकारी काम-काज में गलत है मंत्री और पार्षद शब्दों का प्रयोग


एक तरफ पूरे देश में संविधान की रक्षा, साम्प्रदायिकता के उन्मूलन और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धान्तों और मूल्यों को अंगीकार करने का शोरगुल हो रहा है वहीं दूसरी ओर राजनीति से लेकर शासन-प्रशासन तक में कई ऐसे शब्दों का प्रयोग अर्से से हो रहा है जिनमें हिन्दूधर्म की पुरातन परम्पराओं का समावेश देखा जा रहा है।
इस बारे में कुछ वर्ष पूर्व वागड़ अंचल के प्रमुख लोक कलाकार एवं साहित्यकार श्री भागवत कुन्दन ने मन्त्री शब्द को राजाशाही का द्योतक बताते हुए इसे लोकतांत्रिक राज्य व्यवस्था के लिए आपत्तिजनक बताया और उस समय मन्त्री शब्द के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिका भी भिजवाने की बात कही थी। जिसमें कहा गया था कि इस शब्द के प्रयोग पर तत्काल रोक लगाई जाए।
श्री भागवत कुन्दन
उनकी इस अनूठी दलील ने बुद्धिजीवियों में बहस शुरू कर दी थी लेकिन बाद में मामला ठण्डा पड़ गया। श्री भागवत कुन्दन के अनुसार 15 अगस्त 1947 से पूर्व भारत में अंग्रेजों एवं राजा-महाराजाओं का राज्य था। याने एकतन्त्र अर्थात् राजतंत्र का साम्राज्य था। तब प्रजा के लिए राजा का पद अनिवार्य रूप से उपयोगी था।
राजा शब्द वज़नी था तथा उसकी अहमियत् थी। ’’एक राजा था तथा उसके कई मंत्री थे’’ ऐसी लाखों कहानियाँ किताबों एवं लोगों की ज़बान पर आज भी मौजूद हैं। राजा और मंत्री, पद तथा शब्द, चोली-दामन का साथ था।
यह सम्बन्ध अविभाज्य था। मंत्री एवं राजा एक दूसरे के अनिवार्य अंग थे, जो पिछले तीनों युगों सतयुग, द्वापर एवं त्रैता युग एवं कलियुग के प्रथम चरणकाल में भी हजारों साल तक साथ-साथ रहे।
कुन्दन ने लिखा कि पौराणिक इतिहास के अनुसार पृथ्वी पर वैदिक धर्म सबसे पहले प्रकट हुआ। उसके बाद उपनिषदों एवं पुराणों की रचना हुई। इन सभी धर्मग्रंथों में देवताओं की स्तुति, मनुष्य जाति के लिए नैतिकता के पाठ एवं राजकार्यों को चलाने के लिए नीति-निर्देशक तत्व इनमें भरे पड़े हैं।
भारतीय संविधान बनने से पूर्व धर्मी राजा अपनी शासन व्यवस्था धर्मग्रंथों के आधार पर ही चलाते थे। तब मंत्रियों का चुनाव मतदान के आधार पर नहीं होता था। स्वस्थ, चरित्रवान एवं विभिन्न शास्त्रों के ज्ञाताओं को ही मंत्रियों के पद पर आसीन किया जाता था।
अगर कोई राजा धर्मशास्त्र के विरूद्ध आचरण करता तो धर्मात्मा मंत्री उसको मरवा देते थे अन्यथा स्वयं पद अथवा देश छोड़ देते थे। तब शास्त्रों को संविधान के रूप में भी जाना एवं माना एवं पूजा जाता था।
यह पद्धति लाखों वर्ष तक भारत में सफलतापूर्वक अपनाई जाती रही। कुन्दन के अनुसार धर्मग्रंथों की सबसे महत्त्वपूर्ण शब्द रचना है ’’मंत्र’’ जो कालजयी अकाट्य विधान है एवं विधि भी, जिसमें सम्पूर्ण मानवता एवं पर्यावरण का हित समाहित है। जो उन मंत्रों को पढ़कर तथा उनका सकारात्मक अर्थ समझकर राजकार्य चलाने हेतु राजा से मंत्रणा करते थे वे ‘मंत्री’ कहलाते थे।
मंत्र शब्द वेदों की देन है। मंत्र से बना मंत्री शब्द, एवं मंत्री शब्द से बना मंत्रणा। कुन्दन ने लिखा कि वर्तमान लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था में मंत्री शब्द साम्प्रदायिक है। ‘मंत्री’ शब्द में राजशाही झलकती है। ‘मंत्री’ शब्द में सामन्तवाद की बू आती है।
जब आजाद भारत के संविधान ने राजा शब्द ही स्वीकार नहीं किया तो मंत्री शब्द को क्यों माना गया? उन्होंने यह भी लिखा था कि भारत के मंत्रियों को वजीर कहना भी अनुचित है क्योंकि यह शब्द भी बादशाहत का अभिन्न अंग है तथा लोकतंत्र में बादशाह का पद अथवा शब्द का कोई अस्तित्व नहीं है।
वजीर एवं मंत्री शब्द पुरातन शासन व्यवस्था के मज़हबी शब्द हैं। ये शब्द धर्म निरपेक्ष शासन प्रणाली के लिए योग्य नहीं है। अतः वजीर एवं मंत्री शब्द लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था से तत्काल हटाए जाने चाहिएं।
उन्होंने लिखा कि देश की सुरक्षा एवं विकास के लिए कोई भी सरकार किसी भी धर्मग्रंथ को अपना आधार नहीं बनाती। भारतीय गणतंत्र में राजा शब्द की कोई वैल्यू नहीं है। राजा नामक पद भारत में कहीं नहीं है।
भारतीय नेताओं की दृष्टि में वैदिक/पौराणिक ग्रंथ साम्प्रदायिक हैं। हमारे नेता धर्मग्रंथ पढ़कर मंत्रणा नहीं करते। हमारी विधान एवं लोकसभाओं में तो बहस, वाकयुद्ध, वाक आउट, हाथापाई एवं हिंसा होती है क्योंकि इनमें राजा नहीं है इसलिए हम संसद को राज दरबार नहीं मानते। अतः हमारे देश के नेता ‘मंत्री ’कहलाने के कतई अधिकारी नहीं है। इनके लिए मिनिस्टर एवं तंत्री शब्द का उपयोग होना चाहिए।
उन्होंने मंत्री शब्द की व्याख्या करते हुए लिखा था कि यह सत्य है जो पहरेदारी करे वह संत्री, जो यंत्र से संबंधित कार्य करे वह यंत्री, जो मंत्र से पढ़कर मंत्रणा करे वह मंत्री, तथा जो किसी तंत्र से सम्बन्धित कार्य करे वह तंत्री एवं उसका विभाग तंत्र। लोकतंत्र में लोकतंत्री, लोक तंत्रालय शब्द ही सही मायने में सार्थक होंगे।
श्री कुन्दन के मुताबिक जिन्होंने इतिहास में हुए महान मंत्रियों के चरित्र चित्रण नहीं पढे़ तथा जो मंत्र नहीं जानते उन्हें मंत्री कहना मंत्र शब्द का अपमान है। मंत्री शब्द तो राजतंत्र के राजा के साथ ही मेल खाता था जो लोकतंत्र में नहीं हो सकता। संवैधानिक नेताओं की तो तंत्र एवं यंत्र में ही आस्था है अतः वैदिक मंत्र पढ़कर उन्हें सिद्ध करके देश को लाभान्वित करना इस लोकतंत्र में संभव नहीं है अतः ये मंत्री कहलाने के काबिल नहीं है।
अपनी याचिका में साहित्यकार एवं जागरुक श्री नागरिक कुंदन ने लिखा था कि आज देश में मंत्री शब्द पद के वास्तविक अधिकारी वे लोग हैं जो धर्मग्रंथों के मंत्र पढ़कर उपदेश एवं प्रवचन के रूप में जनता से मंत्रणा कर रहे हैं। जहाँ मंत्र होता है वहाँ यज्ञ भी होता है। भारत सरकारें कोई यज्ञ नहीं करवाती।
अगर भारतीय संविधान मंत्री शब्द को रखना चाहता है तो देश के सभी नेताओं के लिए वेद, पुराण एवं उपनिषदों को पढ़ने-पढ़ाने की शिक्षण व्यवस्था अनिवार्य रूप से होनी चाहिए। केवल तंत्र एवं यंत्रों से भारत का सर्वांगीण विकास, उत्थान, उत्कर्ष, उद्धार एवं कल्याण होना असंभव है। मंत्रों के अभाव में भ्रष्टाचार एवं प्रदूषण का ग्राफ बढ़ता ही जाएगा।
देश के निरन्तर बिगड़ते हुए वातावरण एवं पर्यावरण को मंत्रों के सदुपयोग से भी सुधारा जा सकता है। अगर लोकतंत्र को मंत्र पसन्द नहीं है तो मंत्री शब्द को भी तिलांजलि दे देनी चाहिए या देश के प्रत्येक ग्राम पंचायत मुख्यालय पर एक धर्मग्रंथ वाचनालय खोला जाना चाहिए।
श्री कुन्दन ने राजा एवं प्रजा शब्दों को त्यागकर बीच वाले मंत्री शब्द के उपयोग को अधूरा, अटपटा एवं बेमेल बताते हुए सुप्रीम कोर्ट से यह दरख़्वास्त की है कि सरकारी तंत्र के प्रचलन, प्रकाशन, प्रसारण में मंत्री शब्द का उपयोग बन्द किया जाए ताकि देश की भावी एवं वर्तमान पीढ़ी मंत्री शब्द का शब्दार्थ, भावार्थ एवं गूढ़ार्थ समझ सके।
शब्दों की सही परिभाषा एवं उपयोग समझना एवं समझाना बहुजन हिताय कार्य है। उन दिनों उन्होंने अपनी अर्जी को जनहित याचिका से बढ़कर माने जाने का आग्रह किया था। हालांकि उनकी अर्जी पर कुछ हो नहीं पाया लेकिन श्री भागवत कुन्दन ने यह सिद्ध कर दिखाया कि असली सामाजिक चिन्तन भरे वे बुद्धिजीवी हैं जो तटस्थ न होकर हर विषय पर गहरा चिन्तन करते हैं और अपने विचारों को सार्वजनीन करने में कोई परहेज नहीं करते।
उन्होंने खुलकर कहा था कि भारतीय संविधान के निर्माण में सनातन धर्मग्रंथों का नहीं बल्कि विदेशी संविधानों का सहारा लिया गया है। अतः अंग्रेजी के मिनिस्टर शब्द का अर्थ हिन्दी में मंत्री लगा लेना भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के विरूद्ध है।
इसी प्रकार हमारी दृष्टि में मंत्री शब्द के साथ ही पार्षद शब्द भी धर्मनिरपेक्षता के सिद्धान्तों के खिलाफ है। पार्षद केवल भगवान के होते हैं उनकी तुलना आज के पार्षदों (नगर निकायों के वार्ड पंचों) से करना इस देश की धर्म और संस्कृति से भरी-पूरी परम्परा का अपमान है। इसी प्रकार कई मंत्री और जन प्रतिनिधि जनता दरबार लगाते हैं, यह भी सामन्तवादी मानसिकता का प्रतीक है। ऐसे ही विषयों पर चिन्तन करें और अपने मौलिक विचारों से देशवासियों को जागृत करते रहें।
