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सभी को है शिवलिंग पूजा का अधिकार

Deepak Acharya
Deepak Acharya
January 1, 2022
सभी को है शिवलिंग पूजा का अधिकार

धर्म का सीधा संबंध आत्मा से है। इसमें शरीर का कोई भेद कभी नहीं रहा। धर्म से लेकर कर्मकाण्ड के तमाम पहलुओं में परमात्मा का संबंध किसी शरीर से नहीं होता बल्कि आत्मा से ही होता है।

उपासना पद्धतियां जीवात्मा को शुद्ध भावभूमि पर लाकर परमात्मा के अवतरण अथवा दैवीय शक्तियों के प्राकटय के लिए जमीन तैयार करती हैं। शरीर के भीतर जो भी चक्र होते हैं वे स्त्री और पुरुष सभी में समान होते हैं और इनके जागरण तथा इन्हें दिव्यावस्था प्रदान करने के लिए शरीर का शुद्ध एवं पवित्र होना अत्यन्त जरूरी होता है। ऎसा होने पर ही ये चक्र दिव्यता और पवित्रता से पूर्ण होते हैं। इसके बाद ही इन चक्रों का स्वाभाविक जागरण आरंभ होता है।

उपासना की पद्धति कोई सी हो, इसका अंतिम और निर्णायक दौर योग मार्ग की ओर ही प्रवृत्त करने वाला होता है और योग मार्ग का आश्रय ग्रहण करने के बाद ही जीवात्मा और परमात्मा के बीच दिव्य और अदृश्य सेतु का निर्माण होता है जिससे होकर ईश्वरीय ऊर्जाएं और शक्तियाँ जीवात्मा को और अधिक पावन करती हुई ईश्वरीय क्षमताओं और सामथ्र्य से भरने लगती है।

परमात्मा को पाने के लिए प्रत्येक जीवात्मा को प्रयत्न करना चाहिए किन्तु माया के वश में होकर जीवात्मा सत्य, धर्म,न्याय और दैवीय शक्तियों का अवलम्बन नहीं कर पाते हैं। लेकिन बहुत सारे लोग ऎसे होते हैं जो संसार के कर्म करते हुए भी परमात्मा का स्मरण, ध्यान, पूजा-पाठ और उपासना नहीं छोड़ते। अपने-अपने हिसाब से पूजा की विभिन्न पद्धतियों को आत्मसात करते हुए आगे बढ़ते हैं।

ईश्वर की कैसी भी उपासना पद्धति हो, इसमें केवल पुरुषों का ही अधिकार नहीं है बल्कि पुरुषों से कहीं ज्यादा अधिकार स्ति्रयों को हैं। स्त्री को आदिकाल से शक्ति माना गया और पुरुष को शिव। मूलाधार चक्र में विराजमान कुण्डलिनी शक्ति का सहस्रार चक्र में अवस्थित शिव से मिलन ही समाधि की उच्चावस्था और परमात्मा से संयोग होने का स्पष्ट प्रतीक है।

शिव और शक्ति का संयोग ही सृष्टि का मूलाधार है और यह स्थिति ब्रह्माण्ड से लेकर पिण्ड सभी तक समान अवस्था में स्वीकारी जानी चाहिए। स्त्री शक्ति के बारे में वेदों, पुराणों, उपनिषदों से लेकर सभी प्राच्य ग्रंथों में विशेष महिमा बताई गई है।

यहाँ तक कि आदि शंकराचार्य ने भी श्रीविद्या की उपासना पद्धति में शक्ति को शिव के जागरण के लिए जरूरी माना है। आद्यशंकराचार्य विरचित सौन्दर्य लहरी में तो पहला श्लोक ही भगवती को समर्पित है जिसमें उन्होंने स्पष्ट कहा है कि शक्ति से युक्त होने पर ही शिव शिव हैं। यह भी कहा गया है - शक्ति विना महेशानि सदाहं शवरूपकः। अर्थात शक्ति के बिना शिव शव ही है। शिव में से ई कार को हटा दिया जाए तो शव ही शेष बचा रहता है।

आजकल खूब सारे मन्दिरों में धर्म और शैव महिमा से बेखबर लोग मनुष्य बुद्धि से विचार करते हुए शिव के लिंग को जिस दृष्टि से देखते हैं और महिलाओं को शिवलिंग की पूजा से दूर रखते हैं, वह अपने आप में शक्ति का भी अपमान है और शिव का भी। जहाँ शक्ति का अपमान होता है वहाँ शिव की भी कृपा नहीं रह पाती बल्कि शक्ति के अपमान से शिव भी नाराज होते हैं और जिन स्थानों पर ऎसा होता है वहाँ होने वाली शिव पूजा का कोई अर्थ नहीं है। इस मूल मर्म को आत्मसात करने की आवश्यकता है।