साहित्यिक यात्रा में वापस
साहित्य
8 min read

समय आ गया है होलिकाओं और हिरण्यकश्यपों के संहार का

Deepak Acharya
Deepak Acharya
March 17, 2022
समय आ गया है होलिकाओं और हिरण्यकश्यपों के संहार का

उस जमाने में दानवी संस्कृति के परिचायक हिरण्यकश्यप भी थे और सत्ता के मद भरी फायरप्रूफ होलिकाएं भी। अंधे मोह और मद भरी कुर्सियों का वजूद तब भी था और अब भी है। अन्तर सिर्फ इतना भर हो गया है कि तब एक हिरण्यकश्यप था, एक होलिका थी। आज कई शक्लोें और लिबासों में हिरण्यकश्यपों की जमातें हैं, कुर्सी को शाश्वत और अनश्वर मानने वाली होलिकाएं भिन्न-भिन्न रूपों और विचित्र स्वरूपों में हमारे सामने हैं।

इनके रंग अलग-अलग हैं जो होली पर ही नहीं बल्कि पूरे साल भर गिरगिटों को भी छकाते लगते हैं। वो जमाना था जहाँ दैत्यों से लेकर देवताओं तक की कथनी और करनी में कोई अन्तर नहीं हुआ करता था।

छल-फरेब तो था ही लेकिन इससे भी आगे बढ़कर सच यह था कि जो जैसा है वैसा दीखता भी था और होता भी था। आज सब कुछ उलटा-पुलटा हो चला है। आदमी अन्दर से कुछ और है, बाहर से कुछ और, यहाँ तक कि दाँये से कुछ और है, और बाँये से कुछ और। ऑक्टोपस की तरह इंसान अपना आकार-प्रकार बदलते हुए, जमाने भर को गुमराह करते हुए अपने उल्लूओं और उनके पट्ठों को सीधे करने से लेकर पटाने तक में जुटा हुआ है। इस मामले में इंसान ने कॉलगल्र्स, वैश्याओं, बहुरुपियों से लेकर सभी को पीछे छोड़ दिया है। लगता है जैसे पुराने जमाने के शक्ल और सूरत बदलने वाले असुरों का नए अवतारों में आविर्भाव हो चला है।

जो सामान्य हैं वे भी, और असामान्य हैं वे भी, सारे के सारे जाने कितने चेहरों, चाल और चलन से एक साथ नॉन स्टॉप कुलाँचे भरते जा रहे हैं। जाने कितने रंगों के एक साथ घालमेल ने आदमी के मन को इतना बदरंग बना डाला है कि पता ही नहीं चलता कि असली रंग आखिर है कौनसा।

सच कहें तो आदमी का अपना रंग कहीं खो चला है और आयातित रंगों और रसों के सहारे वह शिखरों को छू लेने का स्वप्न संजोये कभी किसी को पछाड़ देता है, कभी किसी को रुला देता है। इस अंधी दौड़ में उसे न अपनों का बोध है, न परायों का।

हर कोई लगता है जैसे जीवंत अभिनय का महारथी बहुरूपिया ही हो। रोजाना ढेरों किरदारों को जीते हुए, लोगों को मुगालते में रखते हुए आदमी खुद को भी नहीं समझ पा रहा है कि आखिर वह है क्या, और क्या होता जा रहा है।

पॉवर फुल और पॉवरलेस दोनों तरह के आदमी बहुरूपियों को भी उन्नीस ठहराने लगे हैं। सत्ता की होलिकाओं की गोद में एकदम निर्भय बन बैठे उन लोगों के लिए कुर्सिया अभेद्य सुरक्षा कवच ही हो गई हैं जिनमें धँसे रहकर वे जमाने पर कुछ भी सितम ढाने के आदी हो गए हैं।

अपने अस्तित्व को पाने और फिर बरकरार रखने के लिए जब आदमी सारे नैतिक मूल्यों और आदर्शों को स्वाहा करते हुए आगे बढ़ने का भ्रम पाल लेता है तब उसके लिए मनुष्य होने का बोध जगने का कभी प्रश्न ही पैदा नहीं होता।

अपने आस-पास नज़र घुमाएं तो दिखेगा कि लोग कितनी दोहरी-तिहरी या बहुरूपिया जिन्दगी जीते हैं। उच्चाकांक्षाओं के फरेबों से भरे फेर में लगातार मानवीय मूल्यों को रौंदते हुए आगे बढ़ते हुए दीखने वाले इन लोगों के लिए भ्रम में जीना और भ्रम फैलाते हुए आगे निकल जाना ही एकमेव जीवन लक्ष्य है।

इन लोगों के हर कर्म और व्यवहार में साफ झलकता है दिखावा। कहते कुछ हैं, करते कुछ और, होता है कुछ और। षड़यंत्रों और फरेब की बुनियाद पर टिके इन लोगों की सारी खिड़कियाँ और दरवाजे अन्दर की ओर ही खुलते हैं।

इन्हें कोई सरोकार नहीं जमाने की प्रतिक्रियाओं या परिवेश पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का। कुर्सी की होलिकाओं के फायर प्रूफ आवरण ने इन्हें इतना निर्भय बना दिया है कि इनके लिए कुछ भी करना अस्पृश्य नहीं है। जो जिस रंग के लिबास में बैठा है उस रंग की वाह-वाह करते हुए जनमानस को भ्रमित करता हुआ अपने उल्लू सीधा कर रहा है। जनता की आह-कराह की उसे फिकर है ही कहाँ।

अब बहुत हो चुका है। होलिकाओं को दिया वरदान क्षीण होने लगा है, प्रह्लाद की पुकार अब ताकत पाने लगी है, हर कोने-कोने से आहट आनी शुरू हो गई है, हिरण्यकश्यपों को चेत जाना चाहिए वरना अब समय करीब आ गया है, कितना कुछ हजम कर चुकने के बाद भी डकार तक नहीं लेने वाला उनका पेट अब ज्यादा दिन सुरक्षित नहीं है, जनशक्ति के रूप में हौले-हौले बढ़ चला है कोई उनकी तरफ... ।

प्रकृति भी अब अपनी पर उतर आयी है। वह भी अबसमझाती नहीं, सबक देने लगी है। लद गया वह जमाना जब सब कुछ चल जाता था, चला दिया जाता था। अब दुनिया करवट ले रही है। महापरिवर्तन का आगाज हो चुका है। सब तरफ धरती हिलने लगी है कुछ नया और सुनहरा सुकूनदायी मंजर दिखाने के लिए। जो हो रहा है उसे दिल थाम कर द्रष्टा भाव से देखते जाईये।