युवा दिवस - स्वामी विवेकानंद की मानें, अवसर दें युवाओं को


स्वामी विवेकानंद जयन्ती के दिन हमें युवाओं की खूब याद आती है। इस दिन युवाओं की ही चर्चा होती है और युवाओं के उत्थान से जुड़े आयोजनों की परंपरा रही है। बरसों से हम यही सब कुछ करते आ रहे हैं।
कभी स्वामी विवेकानंद के जयघोष लगाने में हम आगे ही आगे रहते हैं और कभी थोड़ा पीछे हट जाते हैं। समय-समय का फेर है। देश, काल और परिस्थितियों के अनुसार हमारे स्वर, ताकत और रंग-ढंग बदलते रहते हैं।
कभी हम तीव्रतर राष्ट्रवादी और संस्कारवान हो जाते हैं और कभी फिसड्डी। फिर भी इतना अवश्य है कि स्वामी विवेकानंद हमारे मन में रचे बसे हैं और उनके प्रति उन सभी लोगों में आदर-सम्मान और श्रद्धा है जो इस देश की संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों को अपना मानते हैं, अनुकरण करते हैं और अनुपालन भी।
स्वामी विवेकानंद और युवा दिवस के बीच गहरा रिश्ता है किन्तु इसके मूल मर्म को आत्मसात करना न हम चाहते हैं और न सीख पाए हैं। युवाओं की बात इसलिए जरूरी और अहम् है क्योंकि युवाओं के जिम्मे ही देश का भविष्य टिका हुआ है लेकिन युवाओं की स्थिति आज कैसी है, इस बारे में बताने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि हम सभी जानते हैं।
युवावस्था की दहलीज और आनंद को पार करते हुए वानप्रस्थाश्रम और संन्यास आश्रम तक पहुंचे हुए सारे लोग युवा जीवन की हकीकत को अनुभव कर चुके हैं। युवाओं के सामने आज ढेर सारी चुनौतियाँ हैं, युवाओं को सुखद और सुनहरे भविष्य के लिए मजबूत नींव की तलाश है और उन्हें ऎसा मंच चाहिए जिसके माध्यम से समाज और देश की सेवा का ज़ज़्बा पूरा कर सकें।
दोष केवल समाज या व्यवस्था का नहीं बल्कि युवाओं का भी है जिन्होंने पाश्चात्य अपसंस्कृति को श्रेष्ठ और वरेण्य मान लिया है और भोगवादी संस्कारों में इतने डूबते जा रहे हैं कि उन्हें भारतीय संस्कृति, सभ्यता और परंपराओं की विलक्षणता की न जानकारी है, और न ही जानकारी पाना चाहते हैं।
आशा-निराशा, सफलता-विफलता के भंवर में फंसे हुए युवाओं के लिए या तो प्रतिभाओं से अधिक उच्चाकांक्षाओं के पाश कसे हुए हैं अथवा उन्हें अपने लायक अवसर प्राप्त नहीं हो रहे हैं। युवाओं के लिए सर्वाधिक कहर ढाने में वे लोग भी कम जिम्मेदार नहीं हैं जो अवधिपार और निवृत्त हो चुके हैं किन्तु अभी तक अपने आपको युवा माने बैठे हैं।
खूब सारी अनुभवी और बुर्जुआ भीड़ ऎसी है जो प्रौढ़ावस्था और इससे भी पार अवस्था पा चुकी है किन्तु अपने आपको युवा मानने और मनवाने पर तुली हुई है। सर पर खिजाब लगाए, टोपी, साफों और पगड़ियों से बुढ़ापे को ढकने का शगल पाले हुए ये लोग खुद की आत्मा के साथ भी दगा कर रहे हैं और आम अवाम को भी भ्रमित कर रहे हैं।
ऎसे में युवाओं के लिए स्थान कहाँ आरक्षित है। नश्वर शरीर के जीवन और मृत्यु से अनभिज्ञ और मरणधर्मा होकर अमर रहने की इच्छाओं के दासत्व बोझ से भरे हुए लोग कुण्डली मारकर मरते दम तक वहीं जमे रहना चाहते हैं जहां उन्हें आनंद, प्रतिष्ठा और वैभव की प्राप्ति होती है।
कई क्षेत्रों में लगता है कि जैसे युवाओं के लिए ट्रॉफिक जाम की स्थिति है और जाम करने वाले बाहर से नहीं आए हैं बल्कि अपने ही वे लोग हैं जो नए पानी की बजाय खुद को सर्वसमर्थ और सक्षम मान बैठे हैं।
प्रतिभावान और हुनरमन्द युवाओं के अवमूल्यन के आदी हो चुके लोग ईश्वर और रत्नगर्भा वसुन्धरा को भी अपमानित कर रहे हैं और यह मान बैठे हैं कि उनके बाद ऎसा कोई नहीं बचा है जो कि समाज और देश का नवनिर्माण कर सके या कि चला सके।
युवा दिवस पर उन सभी लोगों को युवाओं की मुख्य धारा से हट जाने का संकल्प लेना होगा जो कि अवधिपार युवा हो चुके हैं और युवा मानकर स्पीड़ ब्रेकर या बेरियर बने हुए हैं। स्वामी विवेकानंद के बारे में उपदेशों, भाषणों और उनसे सीख लेने की पुरानी और परंपरागत बातों को छोड़कर जरूरी यह है कि युवा अपने आपको स्वामी विवेकानंद बनाने का प्रयास करें।
केवल बातों और आयोजनों से काम नहीं चलने वाला। इस बार का युवा दिवस ऎसा मनाएं कि युवाओं के लिए आने वाले वर्ष का युवा दिवस उपलब्धियों के जयगान का अवसर हो और समाज तथा देश को भी लगे कि स्वामी विवेकानन्द और युवाओं के बीच गहरा और सनातन रिश्ता है तथा स्वामी विवेकानंद का नाम ही काफी है युवाओं में जागृति और नवसंचार के लिए।
स्वामी विवेकानंद जयन्ती पर हार्दिक शुभकामनाएं और युवाओं के सुनहरे इन्द्रधनुषी भविष्य के लिए मंगलकामनाएं।
