भूत-प्रेत और अतृप्त आत्माओं को भी रहता है 31 दिसम्बर का इंतजार


बातकुछ अटपटी लग सकती है लेकिन है सोलह आने सही। जिस तरह से दिवंगत पितरों को साल भर श्राद्ध का इंतजार रहता है उसी तरह भूत-प्रेतों और अतृप्त आत्माओं को रहता है 31 दिसम्बर का इंतजार।
किसीने इस पर गौर नहीं किया होगा कि 31 दिसम्बर को दुर्घटनाएं व मौतें अपेक्षाकृत अधिक होती हैं। इसका मूल कारण ही यह है कि इस दिन अतृप्त आत्माओं और भूत-प्रेतों का विचरण सामान्य दिनों की अपेक्षा अधिक होता है।
पुराणोंऔर शास्त्रों की मानी जाए तो जो भोगी-विलासी, अतृप्त और आसुरी वृत्ति वाले लोग आकस्मिक मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं वे सारे भूत-प्रेत और पिशाच योनि को प्राप्त करते हैं और वर्षों तक भटकते रहते हैं। अपनी अतृप्त वासनाओं को वे स्वयं भोग नहीं सकते हैं। इसके लिए उन्हें कोई न कोई माध्यम चाहिए होता है। शराबियों, मांसाहारियों और उन्मुक्त भोग-विलास में रमे रहने वाले अतृप्त लोग मृत्यु के उपरान्त भूत-प्रेत ही बनते हैं और अर्से तक अतृप्त बने रहकर इधर-उधर भटकने को विवश रहा करते हैं।
ऎसीसभी अतृप्त आत्माओं के लिए 31 दिसम्बर का दिन और रात महापर्व की तरह होता है क्योंकि इस दिन बड़ी संख्या में लोग मौज-शौक के चक्कर में वह सब कुछ करने में आनंद प्राप्त करते हैं जो सामान्य दिनों में सामूहिक रूप से नहीं हो पाता।
इसदिन भोग-विलास को ही जीवन का सत्य समझने वाले लोग देर रात तक मौज करते हैं। फिर चाहे सुरा-सुन्दरी हो या माँसाहार, या और कोई नशा। भूत-प्रेतों को इस दिन बहुत बड़ी संख्या में ऎसे लोग माध्यम के रूप में मिल जाते हैं जिनका उपयोग करके वे क्षणिक तृप्ति का अहसास कर लिया करते हैं।
यहीएक वह सामूहिक पर्व है जिसमें शराबियों, मांसाहारियों और उन्मुक्त भोगी-विलासियों का निशाचरी कुंभ उमड़ा हुआ दिखाई देता है। इसलिए भूत-प्रेतों और अतृप्त आत्माओं को मनचाही वासनाओं को पूरी करने के लिए व्यापक पैमाने पर माध्यम सुलभ हो जाया करते हैं।
सूक्ष्म दृष्टि से विवेचन करें तो वर्ष की अंतिम रात्रि को जहां कहीं भोग-विलास और दैहिक आनन्द का माहौल उपलब्ध होता है वहां अतृप्त आत्माओं का डेरा सजा रहता है।
इसदृष्टिसेवर्षकीइसअंतिमरात्रिकोभूत-प्रेत और अतृप्त आत्माएं निशाचरी आनन्दोत्सव के रूप में लेकर आनंद पाते हैं। और इस आनंद में ही जब खुमारी ज्यादा चढ़ जाया करती हैं तब दुर्घटनाओं की संभावनाएं भी बनी रहती हैं।
