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दीपावली पर विशेष - गौवंश रहेगा तभी तक है मानवता और धरती का अस्तित्व

Deepak Acharya
Deepak Acharya
November 4, 2021
दीपावली पर विशेष - गौवंश रहेगा तभी तक है मानवता और धरती का अस्तित्व

हर कोई चाहता है लक्ष्मी। और इसीलिए पूरी जिन्दगी लक्ष्मीजी को प्रसन्न करने और रखने के बहुविध जतन में सभी लगे रहते हैं। और दीपावली तो लक्ष्मीजी को प्रसन्न करने का महापर्व है। हर तरफ पसरा होता है रोशनी का मंजर, और पूरा का पूरा समुदाय लक्ष्मी अनुष्ठानों से लक्ष्मीजी को रिझाने के भरसक उपायों में जी जान से जुटा रहता है।

बीते युगों में लक्ष्मीजी द्वारा खूब प्रसन्नतापूर्वक धन-वैभव और सभी प्रकार की समृद्धि बाँटते रहने के कई पौराणिक कथानक मिलते हैं। लक्ष्मीजी को खुश करने के लिए सर्वोपरि रहस्यमय उपाय सदियों से रहा है और वह है गौमाता की प्रसन्नता।

गाय साक्षात लक्ष्मी है जिसमें सभी देवी-देवताओं का निवास माना गया है। गाय यदि प्रसन्न है तो उस क्षेत्र में लक्ष्मीजी खुश रहती हैं। घर-परिवार, मोहल्लों, ढाणियों, गांवों और शहरों में जहाँ गौवंश को आदर के साथ रखा जाता है, उनके लिए खान-पान व आवास की अच्छी व्यवस्था रहती है, जहां गौवंश को किसी भी प्रकार की तकलीफ नहीं होती, वहाँ पर लक्ष्मीजी भरपूर प्रसन्न रहा करती हैं। उन क्षेत्रों मेंं प्राकृतिक ही नहीं बल्कि दैहिक, दैविक और भौतिक ताप शून्य रहते हैं अथवा न्यूनता रहती है।

गौवंश खुश तो जीव-जगत सब खुश, और लक्ष्मीजी प्रसन्न। इस मूल मंत्र को सामने रखकर लक्ष्मी आराधना की जाए, जो इसका बहुगुणित फल प्राप्त होता है। गौवंश की रक्षा और पालन केवल नारों, बातों और सांसारिक लाभ-हानि के दायरों में कैद नहीं रहना चाहिए बल्कि वास्तव में गौसेवा और गौपालन के आदर्श संस्कारों का सहज और निष्काम प्रकटीकरण सामने आना चाहिए।

आज बच्चों को बुद्धि बढ़ाने के लिए विदेशी टॉनिकों को अपनाया जा रहा है। इसकी बजाय यदि बचपन से ही गौदुग्ध का प्रयोग किया जाए तो बच्चे स्वाभाविक रूप से मेधावी होते हैं। इसमें कोई संशय नहीं। यही नहीं तो इनकी बुद्धि सात्ति्वक और विचार तथा भाव सदैव कल्याणकारी रहते हैं और जीवों तथा जगत के कल्याण के कार्यों में सदैव निष्काम भाव से उद्यत रहते हैं।

गायों के दूध और मल-मूत्र में दिव्य एवं औषधीय रसायन होते हैं जो कि मनुष्य के शरीर को हृष्ट-पुष्ट रखने के साथ ही आज की कई सारी बीमारियों, वायरसों, बैक्टीरिया और तमाम प्रकार के प्रदूषणों से दूर रखते हैं। लेकिन होनी चाहिए देशी गाय। गाय पर हाथ फेरने और उसका स्पर्श करने से कई बीेमारियां दूर हो जाती हैं। विदेशी नस्ल की संकर गायों का दूध पीने से वर्ण संकरता के जीन बढ़ते हैं और ऎसे लोग वर्णसंकरों की तरह व्यवहार करने लगते हैं।

देशी गाय की रीढ़ की हड्डी में सूर्य केतु नाड़ी होती है जिस पर सूर्य की किरणें पड़ने से स्वर्ण तत्व झरने लगता है। और यह गाय के दूध में घुलता रहता है। यही कारण है कि गाय का दूध हल्का सा पीलापन लिए हुए होता है। इसका जो पान करता है उस पर स्वर्ण भस्म का प्रयोग करने के बराबर गुण व असर होता है।

जिस स्थान पर गाय मल-मूत्र करती है उसक स्थान की परिधि का पूरा क्षेत्र पवित्र हो जाता है। केवल वह स्थान विशेष ही नहीं बल्कि उस कुछ फीट स्थान की सीध में ऊपर के सभी भुव, स्व, मह, जन, तप और सत्यम् आदि तमाम लोक और नीचे के सभी पाताल लोक तक भी पवित्र हो जाते हैं।

वह पवित्र स्थान दिव्यता और दैवीय ऊर्जा से भर जाता है। वहाँ सभी प्रकार की लक्ष्मी अर्थात् ऎश्वर्य का स्वाभाविक रूप से आवाहन हो सकता है। इसीलिए कहा गया है - ‘गोमय वसते लक्ष्मी।’ अर्थात् जहां गाय मल-मूत्र करती है वहां की पवित्र भूमि पर लक्ष्मी का वास होता है। लेकिन आज के भौतिकवादी लोग इस सत्य को समझना ही नहीं चाहते, वे गौवंश को डण्डों को भगा देते हैं और प्रताड़ित करते हैं। गौवंश की हत्या, अत्याचार, इन पर प्रताड़ना और इनके नाम आने वाले पैसों को खा जाने वाले लोगों को लक्ष्मी उपासना का कोई अधिकार नहीं है।

सर्वाधिक दुर्भाग्यशाली हालात यह हैं कि शिवालयों में हम नन्दी की पूजा करते हैं, बछ बारस, गोवर्धन पूजा आदि अवसरों पर गौवंश तलाशते हैं, गोबर ढूंढ़ते हैं और इनके अलावा के समय में साल भर गौवंश पर अत्याचार करते हैं यहाँ तक कि कई मन्दिरों में गोबर और गौमूत्र से बचने के लिए गौवंश के प्रवेश एवं विश्राम तक को बाधित कर दिया जाता है, चाहे उनके कितने की विस्तृत परिसर ही क्यों न हों।

मन्दिरों के गंवार पुजारी और तथाकथित भक्त मन्दिरों की साफ-सफाई बनाए रखने के लिए गौवंश को अपने मैदानी परिसरों में घुसने नहीं देते क्योंकि उन्हें सफाई करने में अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है। जबकि इन मूर्खों को यह पता नहीं होता कि गाय का गोबर और मूत्र जहाँ गिरता है वह स्थान अपने आप पवित्र, शुद्ध और दिव्य ऊर्जाओं से भर जाता है। संत-महंत, महामण्डलेश्वर और बाबाओं की भी ऎसी जमातें आ गई हैं जिन्हें गौवंश की महिमा से कोई सरोकार नहीं है, केवल अपने आश्रमों और मन्दिरों को टकसाल के रूप में इस्तेमाल करने की ही धुन सवार है।

ऎसे लोग हिंसक कर्मों के बूते जो पैसा प्राप्त करते हैं वह अलक्ष्मी ही है जो इनके पूरे वंश को ले डूबती है। खूब सारी भीड़ दीपावली पर लक्ष्मी उपासना में रमी रहती है लेकिन लाख प्रयत्नों और उपायों के बावजूद लक्ष्मी प्राप्त नहीं होती, तब विचलित हो जाते हैं।

वे इस रहस्य को ताजिन्दगी समझ ही नहीं पाते कि गौवंश की रक्षा, पालन और सम्मान लक्ष्मी उपासना का आरंभिक और अनिवार्य चरण है जिसकी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। विश्व भर में गंगाजल और गौ मूत्र के बराबर ऎसा कोई दिव्य और पवित्र अमृत है ही नहीं, जो कि मन-मस्तिष्क और शरीर को कुछ ही दिन में परिशुद्ध करने की क्षमता रखता है।

परमात्मा और आरोग्य को पाने के लिए चित्त की शुद्धि जरूरी है और यह केवल और केवल इनसे ही संभव है। यह भी तय मानकर चलें कि गौवंश है, तभी जीवन है अन्यथा गौवंश के न रहने पर कलियुग का वह वीभत्स और भयानक स्वरूप सामने आएगा जब इंसान ही इंसान को नोंच कर खाने लगेगा। गौवंश की बदौलत ही धर्म बचा हुआ है।

लक्ष्मी उपासना तभी सार्थक और सिद्ध है जब हम गौवंश के जीवन और व्यवहार के प्रति गंभीर रहें, गौवंश के संरक्षण-संवर्धन और पालन के उपायों में जुटें, प्रोत्साहित करें अन्यथा हमारी लक्ष्मी उपासना केवल और केवल आडम्बर और पाखण्ड से अधिक कुछ नहीं। यह बात सभी को सोचनी होगी।