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धर्म-अध्यात्म में आत्मघाती है धंधेबाजी मानसिकता

Deepak Acharya
Deepak Acharya
January 12, 2026
धर्म-अध्यात्म में आत्मघाती है धंधेबाजी मानसिकता

प्राच्यविद्यामर्मज्ञ डॉ. भगवतीशंकर व्यास से बातचीत के प्रमुख अंश

अधर्म को बढ़ावा दे रहा है शास्त्रविहित मर्यादाओं का उल्लंघन

समृद्ध है सनातन परम्पराओं का महामंगलकारी स्वरूप

नक्षत्र ज्योतिष एवं शोध संस्थान, उदयपुर के अध्यक्ष, प्रसिद्ध ज्योतिर्विद एवं कर्मकाण्डी पण्डित डॉ. भगवतीशंकर व्यास ने हाल ही बांसवाड़ा यात्रा के दौरान् यहां श्री पीताम्बरा आश्रम में सनातन धर्म, संस्कृति और परम्पराओं में आ रही विकृतियों पर बेबाक बातचीत की और यथार्थ को सामने रखते हुए मौलिक स्थितियों को अपनाने पर जोर दिया।

उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश इस प्रकार हैं -

वर्तमान में सर्वत्र व्यवसायिक मानसिकता का दौर हावी होता जा रहा है और इसने दैवीय और दिव्य विद्याओं को भी नहीं छोड़ा है। आजकल ज्योतिष और कर्मकाण्ड से लेकर सभी भगवदीय पहलुओं में धंधेबाजी का समावेश होता जा रहा है। यह स्थिति समाज और देश के लिए आत्मघाती है और इसके भयंकर दुष्परिणाम आने वाले समय में सामने आएंगे।’

शास्त्रोक्त कर्म का परिपालन अनिवार्य

शास्त्रीय उद्धरण ‘देवा भूत्वा देव यजेत...’ के अनुसार द्विज मात्र के लिए स्व नित्य कर्म व गायत्री जप का साधन जरूरी है। वैयक्तिक साधना और ईष्ट बल के अभाव में आजकल के अनुष्ठानों में से अधिकांश का कोई फल प्राप्त नहीं हो पा रहा है और पूजा-पाठ एवं अनुष्ठानों के नाम पर धन, श्रम और समय का व्यय व्यर्थ जा रहा है।

साधना, शुचितापूर्ण संसाधनों और साध्य, आचरण की शुद्धता, दैवत्व और दिव्यत्व प्राप्ति के निरन्तर प्रयासों और लोक मंगलकारी भावनाओं को आत्मसात करने पर बल दिए जाने के साथ ही यह जरूरी है कि प्राच्यविद्याओं को बेचने और इसे धनार्जन का स्रोत बनाने की बजाय निष्काम कर्मयोग को अपनाया जाए। यही श्रेयस्कर है।

वैदिक एवं पौराणिक परम्पराओं से जुड़ी कर्मकाण्ड और अन्य तमाम विधाएं जीवों और जगत के कल्याण के लिए हैं और निष्काम भाव से अपनाए जाने पर ही इनके समुचित प्रभावकारी परिणाम सामने आ सकते हैं। कर्मकाण्ड को विलासिता एवं धनार्जन का जरिया मानकर धंधेबाजी के स्वरूप में ढाल दिए जाने पर इसके दिव्य सूक्ष्म तत्त्वों का प्रभाव क्षीण हो जाता है और यह अर्थवत्ता खो देता है।

ईष्ट साधना की ओर मोड़ें

ज्योतिष की ओर ध्यान दें तो जातक का बहुविध कल्याण चाहने के लिए इसे ईष्ट की आराधना की ओर मोड़ें, तभी ग्रह साधना का फल भी प्राप्त हो सकता है। भगवान की कृपा से सभी स्थितियां अपने अनुकूल हो जाती हैं।

समुचित सटीक आकलन का अभाव

ज्योतिष के क्षेत्र में आजकल सबसे अधिक दुर्भाग्यजनक स्थितियां दिख रही हैं। गूगल और यू ट्यूब से जानकारी पाकर अपने आपको ज्योतिषी सिद्ध कर रहे अधकचरे ज्योतिषियों को न सिद्धान्त ज्योतिष से सरोकार है, न ज्योतिष के गूढ़ तत्त्वों और सूक्ष्म विषयों से। इस वजह से लोग वर्षों तक भटकते हैं, इससे आस्था और विश्वास में कमी सनातन के प्रति श्रृद्धा भाव को कमजोर कर रहे हैं।

दैव आराधन और आसन सिद्धि परमावश्यक

ज्योतिष के क्षेत्र में आशातीत सफलता पाने के इच्छुकों को चाहिए कि वे प्रत्यक्ष देव सूर्य की आराधना करें, संध्या व गायत्री करें, पंचागुली साधनापूर्वक ज्योतिष विधान करें। ज्योतिष विधा से सटीक गणित और फलित के लिए निश्चित स्थान और आसन सिद्धि जरूरी है। आजकल के तथाकथित ज्योतिषी रास्ते चलते कुण्डली भी देखने लग गए हैं और हस्तरेखा पठन भी।

नक्षत्र ज्योतिष को समझें, अपनाएं

कुण्डली में केवल ग्रहों की स्थिति को ही देख लेना काफी नहीं है, इसके लिए नक्षत्र ज्योतिष पर ध्यान देना चाहिए। इसके लिए जातक के जन्म नक्षत्र से संबंधित पौध लगवाया जाना चाहिए। इस पौधे की अभिवृद्धि के साथ ही जातक को सुख-समृद्धि प्राप्त होती जाती है। मूल, त्रिक, पंचम व नवम् आदि का अध्ययन कर जातक को ईष्ट साधना करवानी चाहिए।

अनिष्टकारी ग्रहों के कुप्रभावों को समाप्त करने के उपाय बताने वाले ज्योतिषियों पर भी उन ग्रहों का खराब प्रभाव पड़ता है।

दक्षिणा के मूल मर्म को आत्मसात करें

पूजा-पाठ और ज्योतिष के नाम पर भाव-ताव, रेट लिस्ट और धन संग्रह की ऐषणा को विडम्बनाजनक बताया और कहा कि दैवीय कार्यों के लिए राशि का निर्धारण अनुचित है। दक्षिणा का स्थान आजकल मुंहमांगा पारिश्रमिक लेता जा रहा है। स्पष्ट तौर पर दक्षिणा और पारिश्रमिक में दिन-रात का अंतर है।

उपयोग हुई सामग्री का पुनः प्रयोग अनिष्टकारक

पूजा-पाठ और अनुष्ठानों में पूर्व से उपयोग की हुई सामग्री का दुबारा और बार-बार उपयोग होने लगा है और इससे पूजा-पाठ इतना अधिक प्रदूषित हो गया है कि उसका फल प्राप्त होना तो दूर, उल्टे ग्रहों व देवी-देवताओं के कोप का कुफल भोगना पड़ता है। पण्डित और कर्मकाण्डी उपयोग की हुई सामग्री अपने लाभ के लिए एक से दूसरे यजमान की पूजा में चलाते रहते हैं। यह स्थिति दुर्भाग्यजनक है। पूजा-पाठ और अनुष्ठानों में प्रयुक्त होने वाली सभी प्रकार की सामग्री शुद्ध एवं नवीन होनी चाहिए।

दान लें, दान दें भी

पाण्डित्य, कर्मकाण्ड एवं आचार्यत्व करने वाले विप्रवरों के लिए भी यह जरूरी है कि शास्त्र के अनुसार वे इससे प्राप्त आय में से कम से कम 20वां हिस्सा स्वयं दान करें। केवल लेना ही लेना चलता रहा तो लौकिक एवं पारलौकिक दुर्गति निश्चित है व इससे ऐसे विप्रों की पारिवारिक स्थितियां बिगड़ने के साथ ही संतति समस्याओं और अभावों से घिरने लगती है। एकतरफा प्राप्ति के लोभी-लालची ऐसे विप्रों के पूजा-पाठ का कोई फल प्राप्त नहीं होता। दान देना भी ब्राह्मण के कर्त्तव्यों में शामिल है।

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