
दुनिया के तमाम प्रपंचों और निराशाओं को त्याग कर भगवान की भक्ति और साधना मार्ग अपनाकर ही व्यष्टि और समष्टि का कल्याण संभव है। इसलिए अन्तः वस्त्रों की मुफतिया धुलाई और अन्तःपुर के रहस्यमयी क्रियाकर्मों की चरम दक्षता की बदौलत पराए पॉवर से फल-फूल रहे नुमाइन्दों और तथाकथित प्रभावशाली लोगों की जी हूजूरी छोड़कर परम सत्ता का आश्रय प्राप्त करके ही संसार का आनंद प्राप्त किया जा सकता है।
लौकिक कामनाओं के वशीभूत होकर तथाकथित बड़े कहे जाने वाले छद्मचरित्र बहुरूपिये लोगों के पीछे भागने की मनोवृत्ति छोड़कर सर्वशक्तिमान परमात्मा का चिन्तन और आराधन करना चाहिए।
जो मांगना है वह परमात्मा से ही मांगें, वही सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाला है। उन लोगों से मांगना छोड़िएं जो दूसरों के सामने मंगतों से भी गए-बीते होकर स्वाभिमान, लज्जा और संस्कारों से लेकर सर्वस्व समर्पण कर देते हैं और पूरी जिन्दगी कुछ न कुछ मांगते हुए भीखमंगों को भी लज्जित करते रहते हैं।
खूब बड़े-बड़े देखे हैं जो पद और कद के मद, अलक्ष्मी से प्राप्त संचित आसुरी वैभव के अहंकारों भरे कूड़े के ढेर पर बैठकर खुद के लोकप्रिय और लोकमान्य अधीश्वर होने का भ्रम पाले हुए खुमारी में जी रहे हैं। दिन-रात रौब झाड़ते रहते हैं। लेकिन अपने आकाओं के सामने पूँछ भीतर दबाये हुए पालतु कुत्तों और भयातुर चूहों-कबूतरों की तरह व्यवहार करते दिखते हैं।
ये घासलेटी घासफूसिया एक न एक दिन कूड़े के ढेर में समाते हुए अपना अस्तित्व इस तरह खो देते हैं कि कुछ समय बाद कोई नामलेवा नहीं रहता। और गलती से कोई नाम ले भी ले तो आगे-पीछे जाने कितनी बद् दुआओं और गालियों के सम्पुट लगाने पड़ते हैं, तब जाकर उनका स्मरण होता है।
स्वाभिमान की रीढ़ से हीन इन परजीवी केंचुओं को अपनी मौत मरने दें। उनके बारे में चिन्तन कभी न करें, इनका खात्मा अपने आप होना ही होना है, इन मूर्ख-भौन्दुओं और पराश्रित परजीवियों के बारे में सोचकर अपनी बौद्धिक ऊर्जा और समय नष्ट न करें।

